जन समर्थन के बावजूद क्यों वोट नहीं जुटा पाते जन संगठन?

  • 23 नवंबर 2013
विधानसभा चुनाव

जनता के मसलों पर आवाज उठाने वाले जन संगठनों की राजनीतिक ताकत बनने की हसरत पूरी नहीं हो पाती. रैलियों में लाखों की भीड़ जुटाने का सामर्थ्‍य रखने वाले ये जन संगठन चुनाव में न तो खुद के लिए वोट खींच पाते हैं और न किसी उम्‍मीदवार के खाते में वोट बढ़वा पाते हैं.

स्‍वामी अग्निवेश जन आंदोलन से निकले ऐसे ही एक नाम हैं. 1991 के लोकसभा चुनाव में वे भोपाल सीट से चुनाव लड़े. उन्‍हें विश्‍वनाथ प्रताप सिंह ने जनता दल से टिकट दिया. भोपाल इसलिए क्‍योंकि यहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्‍या अच्‍छी खासी है और दूसरा यहां गैस पीड़ितो की तादाद भी ज्‍यादा है.

कांग्रेस के आखिरी मोहरे

चूंकि उस समय के जनता दल का स्‍वरूप भी कुछ कुछ जन संगठन जैसा ही था इसलिए देश के कई जन संगठन प्रत्‍यक्ष और परोक्ष रूप से वीपी सिंह से जुडे थे. इसके बावजूद स्‍वामी अपनी जमानत नहीं बचा पाए. उस समय नौ लाख 37 हजार से ज्‍यादा मतदाताओं में से उन्‍हें महज 26 हजार 716 मत ही मिले थे.

गैस पीड़ितों के बीच में वर्षो से काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अब्‍दुल जब्‍बार कहते हैं, "जन संगठनों की अपनी लक्ष्‍मण रेखा होती है. वे राजनीतिक दलो जैसे झूठे वादे नहीं कर पाते. मसलन स्‍वामी के चुनाव के समय कांग्रेस और भाजपा के उम्‍मीदवार तो गैस पीड़ितों को मिलने वाली अंतरिम राहत हमेशा जारी रखने का वादा कर रहे थे पर हम ऐसा कोई वादा नहीं कर सकते थे."

"जन संगठनों की एक दिक्‍कत कैडर और संसाधनो की कमी भी है. वे राजनीतिक दलों की भांति न तो पैसा लुटा पाते हैं और न अपने कैडर का राजनीतिक उपयोग कर पाते हैं."

राजनीति में पैसा

सामाजिक कार्यकर्ता सुनील श्रमिक आदिवासी संगठन से जुडे हैं. वे पिछले चुनावो से समाजवादी जन परिषद नामक संगठन को मैदान में उतारते चले आ रहे हैं. इस चुनाव में भी उनकी पार्टी के चार उम्‍मीदवार चुनाव मैदान में उतरे हैं.

सुनील कहते हैं, "राजनीति में पैसा, जाति धर्म का बोलबाला है. जन संगठनों के पास ना तो पैसा होता है और न वे जाति या धर्म के आधार पर काम करते हैं. हमारे निर्वाचन क्षेत्र काफी बड़े होते हैं. इतने बड़े क्षेत्रों में जनता को संगठित करना और अपने पक्ष मे माहौल बनाना मुश्किल काम हैं."

'महराज मत कहो'

सुनील बताते हैं कि इस बार उनके संगठन से चार उम्‍मीदवार मैदान में हैं. इनमें एक नाम शमीम मोदी का है जिनकी अपनी पहचान है. शमीम ने पिछली बार भी हरदा से विधानसभा का चुनाव लड़ा था जिसमें उन्‍हें 3849 वोट हासिल हो पाए. चुनाव के बाद भी वे इस क्षेत्र में सक्रिय रहीं.

एक अन्‍य उम्‍मीदवार है फागराम. फागराम सिवनी मालवा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा और कांग्रेस के दो दिग्‍गज नेताओं से मुकाबला कर रहे हैं. ये हैं सरकार के वन मंत्री सरताज सिंह और कांग्रेस सरकार में गृह मंत्री से लगाकर तमाम विभागो के मंत्री रहे हजारी लाल रघुवंशी.

83 वर्षीय रघुवंशी और 72 वर्षीय सरताज सिह के मुकाबले समाजवादी जन परिषद के 40 वर्षीय फागसिंह एक मोटर साइकल पर लटवाने वाले माइक् के साथ प्रचार कर रहे हैं. फागराम वर्तमान मे जिला पंचायत में सदस्‍य है.

सुनील बताते हैं, "फागराम के लिए आदिवासियों ने खुद से चंदा इकटठा किया और वे ही उसका प्रचार भी कर रहे हैं."

बड़ा फलक

मध्‍य प्रदेश में जन संगठनों से विधानसभा की देहरी चढ़ने वाले एक कार्यकर्ता थे डॉक्टर सुनीलम जो मुलताई किसान आंदोलन के बाद सुर्खियों में आए थे. जनवरी 1998 में हुए इस आदोलन में पुलिस फायरिंग के दौरान 24 किसानों की जान चली गई थी और 150 किसान घायल हुए थे. इसके बाद वे दो बार विधायक बने.

सुनीलम के अलावा किसी और को चुनावी सफलता इसलिए नहीं मिल पाई क्‍योंकि कोई भी जन आंदोलन अपनी ताकत का राजनीतिक रूपांतरण नहीं कर पाया.

पाँच राज्यों के चुनाव

समाजवादी जन संगठन के सुनीलम की माने तो ज्‍यादातर जन आंदोलन राजनीति से दूर ही रहते हैं. वे राजनीति को अछूत मानते हैं. चूंकि जन आंदोलन बेहद स्‍थानीय मुददो पर केंद्रित होते हैं इसलिए इन्‍होंने कभी भी अपने आंदोलनों को बड़ा रूप देने की कोशिश नहीं की.

वे कहते हैं, "जब तक हम अपने आंदोलनों को बड़ा फलक नहीं देंगे तब तक राजनीतिक ताकत नहीं बन पाऐंगे."

विकास संवाद से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता सचिन जैन कहते हैं, "राजनीति में रणनीतिक पहल और बेहतर प्रबंधन की जरूरत होती है जो जन आंदोलनों के लिए संभव नहीं है. राजनीतिक दल स्‍वार्थ के आधार अपना कैडर खडा करते हैं जबकि जन संगठन कैडर को तैयार करने में स्‍वार्थ का लेनदेन कभी नहीं कर पाते."

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