सपा-बसपा: पैर जमाने की कोशिश या भाजपा-कांग्रेस का सिरदर्द

बीएसपी मध्य प्रदेश

भारतीय राजनीति पर नज़र रखने वालों में शायद कम ही लोग हैं जिन्हें याद होगा कि उत्तर प्रदेश के दलितों की पार्टी समझे जाने वाली बहुजन समाज पार्टी ने लोकसभा में अपना खाता साल 1991 में मध्यप्रदेश की एक जनरल सीट से खोला था.

बसपा के भीम सिंह ने मध्यप्रदेश के रीवा से कांग्रेस और भाजपा उम्मीदवारों को हराकर लोकसभा में दाख़िला लिया था.

इस प्रदर्शन में इज़ाफ़ा करते हुए साल 1996 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने मध्यप्रदेश से दो सीटें जीत ली थीं. रीवा से बुद्धसेन पटेल ने चुनाव जीता जबकि पास की सतना सीट से बसपा के सुखलाल कुशवाहा ने बाज़ी मारी.

पढ़ेंः पाँच राज्यों के चुनाव

सुखलाल कुशवाहा के प्रदर्शन को इसलिए भी याद किया जाता है क्योंकि हारने वालों में प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्री कांग्रेस के क़द्दावर नेता अर्जुन सिंह और भाजपा के वीरेंद्र कुमार सकलेचा शामिल थे.

इस बार भी मूलत: उत्तरप्रदेश की पार्टी माने जाने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में ज़ोर-आज़मा रही हैं.

समाजवादी पार्टी ने अपने 50 उम्मीदवार खड़े किए हैं, जबकि बहुजन समाज पार्टी ने सभी 230 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं.

मुक़ाबला दिलचस्प

मौजूदा विधानसभा में बसपा के सात और सपा के एक विधायक हैं. दिल्ली के मीडिया के ज़्यादातर सर्वेक्षणों के उलट मध्यप्रदेश की जनता का मानना है कि इस बार बीजेपी और कांग्रेस में कांटे की टक्कर है.

ऐसे में सबकी निगाहें इस ओर भी लगीं हैं कि इस बार बसपा और सपा का प्रदर्शन कैसा होगा?

पढ़ेंः आँकड़ों का आईना

टीकमगढ़ में पेशे से वकील और मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड और विंध्य प्रदेश की राजनीति पर ख़ास नज़र रखने वाले एडवोकेट मानवेंद्र सिंह चौहान कहते हैं, "सीमावर्ती प्रदेश उत्तरप्रदेश में जिस पार्टी की सरकार होती है वो पार्टी अपने संसाधनों का और अपने प्रभाव का प्रयोग करके यूपी-एमपी सीमावर्ती क्षेत्रों में अपना प्रभाव जमाने का प्रयास करती है."

वो आगे कहते हैं, "अच्छे लोगों के ज़रिए या दूसरी पार्टियों के असंतुष्ट लोगों को अपना उम्मीदवार बनाकर अच्छे वोट लेकर आते हैं. लेकिन सपा या बसपा कोई प्रभावी प्रदर्शन कर पाएगी, ये बेमानी बात है."

तो आख़िर बसपा-सपा कितनी सीटें जीत सकेंगी? इस सवाल के जवाब में मानवेंद्र सिंह कहते हैं कि बसपा इस बार उतनी सीटें (सात) नहीं जीत पाएगी लेकिन हो सकता है कि सपा की सीटें बढ़ जाए क्योंकि पिछली बार यूपी में बसपा की सरकार थी और इस बार वहां सपा की सरकार है.

दिलचस्प मुकाबला?

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र अधवर्यु कहते हैं कि बसपा की अपने पारंपरिक वोटरों पर पकड़ पहले की तरह बरक़रार है.

अधवर्यु कहते हैं, "बीएसपी की सीटें सात से बढ़कर आठ-नौ-दस भी हो सकती हैं, वो सात से घटेंगी नहीं. समाजवादी पार्टी की सीटें भी एक से बढ़कर दो-तीन हो सकती हैं."

पढ़ेंः बुंदेलखंड के आदिवासी

अगर सपा-बसपा की सीटें बढ़ती हैं तो क्या इसका अर्थ ये लगाया जा सकता कि ये पार्टियां मध्यप्रदेश में अपने लिए ज़मीन तलाश रही हैं?

इस तरह की किसी भी संभावना को नकारते हुए एडवोकेट मानवेंद्र सिंह चौहान कहते हैं, "मध्यप्रदेश की राजनीति में तीसरे मोर्चे की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है. पिछले 20 सालों में कोई भी ग़ैर कांग्रेस-ग़ैर भाजपा समूह मिलकर भी कभी 20 से ज़्यादा सीटें नहीं ला पाया."

तो आख़िर बसपा-सपा का असर क्या होगा इस चुनाव पर?

प्रदेश के अलग-अलग इलाक़ों पर नज़र डालने पर यही लगता है कि बुंदेलखंड, ग्वालियर संभाग और विंध्य प्रदेश की कुछ सीटों पर सपा-बसपा के उम्मीदवारों ने मुक़ाबले को दिलचस्प बना दिया है.

कुछ सीटों पर तो इनके उम्मीदवार साफ़ जीतने की स्थिति में दिखाई दे रहे हैं लेकिन इनकी मौजूदगी से कहीं भाजपा को नुक़सान हो रहा है तो कहीं कांग्रेस को.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार