'नैहर में शौचालय नहीं था, ससुराल में भी नहीं है'

  • 28 नवंबर 2013
झारखंड, स्वच्छता, शौचालय

करमी देवी को पता नहीं, शौचालय क्या होता है? ठेठ गंवई अंदाज में वो कहती हैं, "जनाना, लड़कियां तो अहले भोर ही गांव से दूर जंगलों की ओर चली जाती हैं."

उनके पति जुगनू भोक्ता शौचालय की जरूरत को यह कहते हुए दरकिनार कर जाते हैं, "पहले पेट तो भरे."

झारखंड की राजधानी रांची से 40 किलोमीटर दूर मैनछापर गांव के किसी भी घर में शौचालय नहीं है.

इसी गांव के चरका मुंडा और बंधनी देवी की मानें तो अधिकतर गांवों का यही हाल है.

'कागज तैयार'

सोसोजारा 18 आदिवासी परिवारों का गांव है. रीना मुंडा साल भर पहले ब्याह करके इस गांव में आई हैं. शौचालय के बिना दिक्कतें नहीं होती, इस सवाल पर वो झेंप जाती हैं.

रीना आठवीं तक पढ़ी हैं. वो कहती हैं, "नैहर में भी शौचालय नहीं था. ससुराल में भी नहीं है. बुज़ुर्गों के साथ बहुएं, लड़कियां खेतों की ओर चली जाती हैं."

गांव के मुखिया भुवनेश्वर बेदिया भी आदिवासी हैं. वो कहते हैं, "गांव के गांव ऐसे हैं जहां एक भी शौचालय नहीं है. अधिकारी बताते हैं कि शौचालय निर्माण के लिए कागज तैयार हो रहा है. लेकिन ये काग़ज़ कहां जाते हैं कहां आते हैं, पता नहीं चलता. गांव की महिलाएं जब सवाल करती हैं तो नज़रें चुरानी पड़ती हैं."

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आंकड़ों पर गौर करें तो गांव वालों की बताई हकीकत को बल मिलता है. आंकड़े बताते हैं कि झारखंड के ग्रामीण इलाकों में 92.4 फ़ीसदी लोग खुले में शौच करते हैं. 96.3 फ़ीसदी आदिवासी घरों में शौचालय नहीं हैं. ये रिपोर्ट भारत की 2011 की जनगणना की है.

शहरी और ग्रामीण इलाकों को मिलाकर झारखंड में 78 फ़ीसदी घरों में शौचालय नहीं हैं. राज्य के आदिवासी बहुल ज़िलों में चाईबासा के ग्रामीण इलाकों में 96.30 फ़ीसदी, सिमडेगा के 95.1, खूंटी के 96, जामताड़ा के 95.6 फ़ीसदी घरों के लोग खुले में शौच करते हैं.

बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है. झारखंड के स्कूलों में भी लड़कियों के लिए अलग शौचालय की उचित व्यवस्था नहीं है. उच्चतम न्यायालय ने साल 2011 में अपने एक फैसले में कहा था कि प्रत्येक स्कूल में लड़कियों के लिए अलग से एक शौचालय होना चाहिए, लेकिन झारखंड में आज भी 6,000 से ज़्यादा स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय ही नहीं है.

सरकारी एजेंसी डिस्ट्रिक्ट इनफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (डीआईएसई) की ओर से जारी की गई साल 2011-12 की एक रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में आठवीं कक्षा वाले 32 फ़ीसदी स्कूलों और पाँचवीं तक के 36.4 फ़ीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय नहीं हैं.

झारखंड हाइकोर्ट ने राज्य के सरकारी स्कूलों में शौचालय की मुकम्मल व्यवस्था नहीं होने पर स्वत: संज्ञान लिया है.

गुरुवार को मुख्य जस्टिस आर बानुमथि और जस्टिस डीएन पटेल की पीठ ने सरकार से इस मामले में जवाब देने को कहा है. अधिवक्ता अनुभा रावत चौधरी इस मामले में 'अमेकस क्यूरी' बनी हैं.

मैनछापर गांव के लोगों का कहना है कि उनके गांव में छह साल पहले तीन-चार घरों में सरकारी स्तर पर शौचालय बनाने का काम शुरू हुआ था लेकिन गड्ढे खुदाई करने के बाद छोड़ दिए गए.

हाईकोर्ट की नज़र

बच्चों के अधिकारों के लिए काम कर रही अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ के झारखंड प्रमुख जॉब जकरिया कहते हैं, "जनगणना रिपोर्ट बताती है कि खुले में शौच करने के मामले में झारखंड पूरे देश में अंतिम पायदान पर है."

जकरिया कहते हैं कि खुले में शौच की वजह से राज्य को बड़ा नुकसान हो रहा है. स्वच्छता की दयनीय हालत बीमारी, मृत्यु और बच्चों में कुपोषण के पीछे प्रमुख कारण है.

डायरिया से मरने वाले 88 फ़ीसदी बच्चों की मौत खुले में शौच और पीने के गंदे पानी के कारण होती हैं. इससे आर्थिक नुकसान के तौर पर 6.4 फ़ीसदी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का नुकसान होता है.

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बकौल जकरिया, खुले में शौच करने के जो आंकड़े सामने हैं, उससे ये भी जाहिर होता है कि महिलाओं और बच्चों के अधिकार सुनिश्चित करने में हम पीछे छूट रहे हैं.

उनके मुताबिक, तस्वीर बदलने के लिए सामुदायिक तौर पर जन-जागरूकता अभियान चलाते हुए व्यापक पैमाने पर काम करने होंगे, साथ ही पंचायत प्रतिनिधियों को भी ज़िम्मेदारी देनी होगी.

शर्मिंदगी

Image caption स्कूलों में शौचालय की समस्या केवल झारखंड ही नहीं बल्कि पूरे भारत में है.

झारखंड की इस तस्वीर पर राज्य के पेयजल स्वच्छता मंत्री जयप्रकाश भाई पटेल साफगोई से स्वीकार करते हैं कि ग्रामीण इलाकों में स्थिति अच्छी नहीं है.

निर्मल भारत अभियान और मनरेगा से शौचालय निर्माण के लिए 9,000 रुपए का प्रावधान है जो काफी कम राशि है.

मंत्री के मुताबिक, वे खुद भी गांव से आते हैं इसलिए सच से वाकिफ हैं. वे इसके लिए जिम्मेदारीपूर्ण अभियान चलाने की बात कहते हैं.

चाईबासा ज़िले की नीमडीह पंचायत की मुखिया ललिता बालमुचू आदिवासी गांवों का प्रतिनिधित्व करती हैं.

वे कहती हैं, "वाकई शर्मिंदगी महसूस होती है. सरकारी आदेश आया है कि गांव में पांच-पांच बीपीएल परिवारों के लिए शौचालय का निर्माण कराया जाना है. अब ये कब तक बनेंगे, पता नहीं"

जामताड़ा सदर प्रखंड की प्रमुख नीलमणि मरांडी कहती हैं कि उनके ज़िले के गांवों में शौचालय ढूंढने पर भी नहीं मिलते.

सुदूर इलाकों में चिंताजनक स्थिति है. सरकारी स्तर पर कहीं-कहीं काम ज़रूर हो रहे हैं. करमी देवी बंधनी देवी और जुगनू इस मूलभूत सुविधा की कमी की शिकायत नहीं करना चाहते. वे कहते हैं, ''इंतज़ाम तो पेट भरने का भी करते हैं, इसका भी कर लेंगे.''

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