वकीलों की दुनिया बदलने की कोशिश

ज़िया मोदी

ज़िया मोदी लॉ फर्म एज़ेडबी एंड पार्टनर्स की संस्थापक और वरिष्ठ साझेदार हैं. पढ़िए ज़िया की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी.

मुझे अपने पहले जन्मदिन की पार्टी याद है. बच्चे इधर-उधर दौड़ रहे थे. मेरे पिता मुझे बांहों में लेकर ऊपर उछाल रहे थे. मेरी माँ बेहद खूबसूरत लग रहीं थीं. सभी लोगों ने हैप्पी बर्थडे वाला गाना गाया और केक काटा गया. मेरा बचपन खुशियों से भरा था.

मैं पांच बरस की थी जब मेरा दाखिला जे बी पाटिल स्कूल में करवाया गया. मुझे याद है कि मैं रोज़ सुबह छह बजे उठने को लेकर काफी तमाशा करती थी.

मैं हफ्ते में छह दिन घुड़सवारी के लिए जाती थी. घुड़सवारी में सबसे ऊंची बाधा को पार करने का कीर्तिमान बनाने के चक्कर में मैं दो बार अपनी टांग तुड़वा बैठी.

पड़ोस का लड़का

मेरे पति जयदेव से मेरी पहली मुलाक़ात तब हुई थी जब मैं सिर्फ़ 10 बरस की थी. उससे जुड़ी मेरी सबसे पहली याद है, जयदेव का बिल्डिंग के कम्पाउंड में दूसरे कई लड़कों के साथ खेलना.

किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते बहुत कुछ बदल गया था. मुझे याद है, जयदेव स्कूल से आने के बाद कम्पाउंड में घूमा करता था और मैं खिड़की से चिपकी उसे निहारा करती थी.

मेरी मां इस आकर्षण को लेकर खुश नहीं थीं. वो चाहती थीं कि मैं पढ़ाई पर ध्यान दूं. मैंने एल्फिंस्टन कॉलेज से मनोविज्ञान और राजनीति शास्त्र में स्नातक किया और उसके बाद घर में इंग्लैंड में मेरी आगे की पढ़ाई को लेकर बातचीत होनी शुरू हो गई.

मैं इंग्लैंड नहीं जाना चाहती थी लेकिन मेरी माँ का फ़ैसला अटल था. इससे पहले कि मैं देश छोड़ती एक ख़्याल ने हमेशा के लिए मेरे मन में घर बना लिया था कि 'मैं जयदेव से ही शादी करना चाहती हूँ.'

मैं लंदन के स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ के लिए रवाना हो गई और दूर देश से कॉल और ख़तों का सिलसिला शुरू हो गया.

स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ में एक साल गुज़ारने के बाद मैं कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी चली गई.

इंग्लैंड में पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने हॉवर्ड लॉ स्कूल में आवेदन किया और वहां मुझे दाखिला मिल गया.

हार्वर्ड में मुझे अमरीकी संविधान क़ानून विषय बेहद पसंद आता था. हॉवर्ड के बाद मैंने न्यूयॉर्क स्टेट बार की परीक्षा पास की और बेकर एंड मैकेंजी नाम की लॉ फर्म के साथ काम शुरू कर दिया.

मुझे याद है एक बार कुछ गुंडे मेरा पर्स छीन कर भाग रहे थे. मैंने फटाफट अपनी सैंडिल उतारी और नंगे पाँव उन गुंडों के पीछे भागी.

मैंने उन्हें दबोचा और उनसे पर्स छीनने लगी. उनके पास चाकू था. पास ही सादे कपड़ों में एक पुलिस अफ़सर मौजूद थे. मेरी चीख पुकार सुनकर वे मदद को आ गए. सारे गुंडे पकड़े गए और उन्हें जेल भेज दिया गया.

मैं उनके खिलाफ गवाही देने गई. मुझे पर्स वापस तो मिल गया लेकिन एक फटकार के बाद, 'मैडम, आप बड़ी बहादुर औरत हैं लेकिन आपने जो किया है वो दोबारा न करें. यह सरासर बेवकूफी थी'.

काम और निजी जीवन

बेकर एंड मैकेंजी में चार साल बिताने के बाद मैं मुंबई आ गई. साल 1984 में जयदेव और मेरी शादी हो गई. हमारी तीन बेटियाँ हैं और हर बेटी के जन्म के बाद मैंने वकील के तौर पर अपनी प्रैक्टिस से छुट्टी ली.

मेरा काम ऐसा नहीं था कि मैं रात के खाने तक घर लौट सकूं. मेरा काम बहुत गहन तैयारी मांगता था. अगर जयदेव और मेरी सास का साथ नहीं होता तो मैं इस तरह काम नहीं कर पाती.

मुझे याद है कि एक बार सुबह साढ़े सात बजे जब बेटियां स्कूल के लिए निकलने ही वाली थीं कि मैं घर में घुसी. मैं रात भर दफ्तर में काम करके घर पहुंची थी. मेरी सबसे बड़ी बेटी अंजलि ने मुझे देख कर ऐलान किया, 'मैं वकील नहीं बनने वाली.' और सच में वह वकील नहीं बनी. वह फर्नीचर डिज़ाइनर है.

मेरे पिता देश के अटॉर्नी जनरल रह चुके थे. ऐसे में मुझे करियर को लेकर ऊँचे मापदंड तय करने ही थे लेकिन कोई बाहरी दबाव नहीं था.

उन्होंने एक बार बड़ी शालीनता से कहा, "तुम्हारे नाम के साथ सोराबजी क्यों न लगाया जाए?" लेकिन उनकी सलाह काम नहीं आई. मैं ज़िया जे. मोदी ही रही.

मुश्किल काम

मैं जब हिंदुस्तान लौटी तो मुझे बेकर एंड मैकेंज़ी में परिश्रमी वकील होने के नाते सफलता की आदत लग चुकी थी.

मैंने मुंबई में भी कुछ वैसी सोच और नियम की उम्मीद की जिसकी मैं अमरीका में आदी थी लेकिन यहाँ मैं एक कम उम्र महिला वकील थी. कई बार न तो जज मुझे गंभीरता से लेते थे और न मेरे साथी वकील.

मैंने मेहनत से मुवक्किलों का दिल तो जीत लिया लेकिन दूसरी तरफ के वकील से बातचीत अक्सर मुश्किल होती थी.

मुझे याद है कि मैं कोर्ट में केस वाले दिन पूरी तैयारी के साथ सुनवाई के लिए जाती और फिर जज के चेंबर के बाहर घंटों अपनी बारी का इंतज़ार करती. कभी मेरे केस का नंबर एक घंटे में आ जाता कभी पांच घंटों में और कभी आता ही नहीं.

आखिरकार मैंने व्यक्तिगत क़ानूनी मामलों से हटकर कॉर्पोरेट मामलों की वकालत शुरू कर दी क्योंकि मुझे लगा कि मैं दीवानी और फौजदारी मामलों की वकालत में उन ऊँचाइयों को नहीं छू पाऊंगी जिन्हें मैं कॉर्पोरेट क़ानून की प्रैक्टिस में हासिल कर सकती हूँ.

चिंतन

वकीलों की दुनिया को विस्मय की नज़र से देखा जाता है. कोई भी व्यक्ति किसी कंप्यूटर प्रोग्रामर या फिर अकाउंटेंट की सेवाएं लेते हुए कभी नहीं घबराता लेकिन वकील की सेवाएं लेने में उसे डर लगता है.

अगर आपको वकील की ज़रूरत है तो आप मुसीबत में हैं. मुवक्किल अपने वकील के पास जाने में तब भी घबराते हैं जब उन्हें वाकई क़ानूनी मदद की ज़रूरत हो, क्योंकि उन्हें लगता है कि सदमे से बचना चाहिए.

हम इस सोच को बदलने की कोशिश में हैं लेकिन बदलाव में वक़्त लगता है. हमें ऐसी कानूनी प्रैक्टिस फ़र्म बनाने में तीन दशक लग गए जिसे साल 2011 में एशिया की सबसे विश्वसनीय लॉ फ़र्म होने का सम्मान मिला.

मेरे जीवन के शुरुआती दिनों में कुछ नया सीखने की चाहत सबसे बड़ी प्राथमिकता थी जो कि आज भी है. मैं एक वकील पहले हूँ और व्यवसायी बाद में.

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