मध्य प्रदेशः सियासी ज़मीन की तलाश में ब्राह्मण नेतृत्व

  • 29 नवंबर 2013
श्यामा चरण शुक्ल
Image caption श्यामा चरण शुक्ल पहली बार वर्ष 1969 में मुख्यमंत्री बने थे.

मध्य प्रदेश की राजनीति में एक समय था जब ब्राह्मणों का वर्चस्व हुआ करता था लेकिन आज उनकी संख्या और रसूख़ दोनों में काफ़ी कमी आ गई है. नवंबर 1956 में मध्य प्रदेश राज्य के गठन के बाद साल 1990 तक पांच ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों ने लगभग 20 वर्षों तक शासन किया.

लेकिन आज हालत ये है कि पिछले दो दशकों से भी ज़्यादा से कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बन सका है और शिवराज सिंह की मौजूदा कैबिनेट में केवल पांच मंत्री ब्राह्मण समाज से आते हैं. राज्य के पहले मुख्यमंत्री कांग्रेस के पंडित रविशंकर शुक्ल थे जबकि कांग्रेस के ही श्यामा चरण शुक्ल वर्ष 1990 में ब्राह्मण समाज से आने वाले प्रदेश के आख़िरी मुख्यमंत्री थे.

इस बीच में कांग्रेस के कैलाश नाथ काटजु और द्वारका प्रसाद मिश्र मुख्यमंत्री रहे जबकि 1977 में पहली बार ग़ैर-कांग्रेसी सरकार का नेतृत्व किया उस समय जनसंघ के नेता कैलाश चंद्र जोशी ने.

ग्वालियर स्थित जीवाजी राव विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र के अध्यापक प्रोफ़ेसर एपीएस चौहान कहते हैं, "शुरुआती दौर में प्रदेश की राजनीति पर ब्राह्मणों के वर्चस्व का सबसे बड़ा कारण स्वतंत्रता की लड़ाई में ब्राह्मणों की भूमिका रही है."

वे कहते हैं, "स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल ज़्यादातर लोग गांव के स्तर पर शिक्षक थे और उस समय केवल ब्राह्मण ही पढ़े लिखे होते थे. जब आज़ादी आई तो उन लोगों को नेतृत्व मिलना स्वाभाविक था."

साल 1957 से 1967 तक कांग्रेस के आधे से ज़्यादा विधायक उच्च जाति के होते थे और उनमें से भी 25 फ़ीसदी से ज़्यादा अकेले ब्राह्मण थे. वर्ष 1967 में 33 फ़ीसदी विधायक ब्राह्मण समाज से थे. कहा जाता है कि श्यामा चरण शुक्ल जब 1969 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो उनके 40 मंत्रियों में से 23 ब्राह्मण थे.

जातिगत राजनीति

परशुराम की जन्मस्थली समझे जाने वाले इंदौर के जानापाव ट्रस्ट और भोपाल स्थित परशुराम मंदिर से जुड़े रमेश शर्मा कहते हैं, "ब्राह्मणों के नेतृत्व का एक प्रमुख कारण समाज के दूसरे वर्गों में शिक्षा और जागृति का अभाव रहा है. समाज के दूसरे वर्गों में जैसे-जैसे चेतना आने लगी वैसे-वैसे ब्राह्मणों का एकक्षत्र राज कमज़ोर पड़ने लगा."

टीकमगढ़ स्थित वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र अधवर्यु कहते हैं, "शुरू के ब्राह्मण नेताओं ने सभी वर्गों को साथ लेकर समाज के सर्वांगीण विकास की बात की. इसलिए उनके नेतृत्व को किसी ने चुनौती नहीं दी. अटल बिहारी वाजपेयी केवल मध्य प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे भारत में ब्राह्मणों के सबसे बड़े नेता हुए लेकिन उन्होंने कभी भी जाति के आधार पर ब्राह्मणों को आगे नहीं बढ़ाया."

लेकिन 1980 के दशक के बाद जातिगत राजनीति का बोलबाला हो गया और सामंतशाही ने ब्राह्मण नेतृत्व को आगे नहीं बढ़ने दिया.

प्रोफ़ेसर चौहान बताते हैं, "ब्राह्मणों के ख़िलाफ़ तमिलनाडु में शुरू हुआ आंदोलन दूसरे प्रदेशों में भी पहुंचा और फिर आरक्षण और अन्य कारणों से ब्राह्मणों की स्थिति कमज़ोर होती गई. इसका असर मध्य प्रदेश में भी दिखा और ज़ाहिर है संख्या के आधार पर होने वाली राजनीति में ब्राह्मणों के लिए जीतना या नेतृत्व करना मुश्किल है."

संख्याबल

Image caption मोतीलाल वोरा को अर्जुन सिंह के बाद मुख्यमंत्री बनाया गया.

मध्य प्रदेश में ब्राह्मणों की संख्या कितनी है ये ठीक-ठीक बताना तो मुश्किल है लेकिन अलग-अलग लोगों की राय के आधार पर कहा जा सकता है कि ये पांच से छह फ़ीसदी है. रमेश शर्मा कहते हैं, "समाज के हर क्षेत्र में ब्राह्मणों के वर्चस्व में कमी आई है. इसका सीधा असर राजनीति पर भी पड़ा है."

रीवा स्थित एपीएस विश्वविद्यालय में इतिहास के अध्यापक रह चुके प्रोफ़ेसर सरकार कहते हैं, "80 के दशक में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने श्यामा चरण शुक्ल के क़द को छोटा करने के लिए मोतीलाल वोरा और सुरेश पचौरी जैसे ब्राह्मण नेताओं को आगे बढ़ाने की कोशिश की. 1985 में जब अर्जुन सिंह पंजाब के राज्यपाल बनाए गए तो वोरा को मुख्यमंत्री बना दिया गया."

उन्होंने बताया, "वोरा एक राजस्थानी ब्राह्मण थे जिनका मध्य प्रदेश में कोई बड़ा जनाधार नहीं था. अर्जुन सिंह ने ब्राह्मणों के राजनीतिक वर्चस्व को कम करने के लिए एक तरफ़ तो नए ब्राह्मण नेताओं को बढ़ावा दिया दूसरी तरफ़ ठाकुरों और आदिवासी तथा पिछड़े वर्गों का राजनीतिक गठजोड़ बनाया. अर्जुन सिंह के इस क़दम को मुख्यमंत्री बनने के बाद दिग्विजय सिंह ने भी आगे बढ़ाया और इस तरह प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण पिछड़ते चले गए."

साल 2000 में छत्तीसगढ़ के मध्यप्रदेश से अलग राज्य बन जाने के कारण मोतीलाल वोरा और शुक्ल बंधु छत्तीसगढ़ चले गए जिसके कारण मध्यप्रदेश में ब्राह्मण नेताओं के दबदबे में और कमी आ गई.

अर्जुन सिंह ने सुरेश पचौरी को ज़रूर आगे बढ़ाया लेकिन वो हमेशा राज्य सभा के रास्ते केंद्र की राजनीति करते रहे. सांसद और मंत्री तो बन गए लेकिन पचौरी कभी भी अपने आप को प्रदेश की राजनीति में स्थापित नहीं कर सके.

इस बार के विधान सभा चुनाव में वो एक बार फिर अपनी क़िस्मत आज़मा रहे हैं और उनकी भोजपूर सीट पर भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के भतीजे उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं.

लेकिन रमेश शर्मा इसे आंशिक रूप से सच मानते हैं. उनके अनुसार, "रीवा-ग्वालियर संभाग में ठाकुरों और ब्राह्मणों का जातिगत टकराव बहुत पुराना है. रीवा पूरे देश में अकेली ऐसी सीट है जहां ब्राह्मण मतदाता दूसरे किसी भी समाज के मतदाता से अधिक संख्या में हैं. कुछ लोग तो रीवा संसदीय क्षेत्र को ब्राह्मण बहुसंख्यक सीट कहते हैं लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की जा सकती है."

राजनीतिक हैसियत

रमेश शर्मा के अनुसार अर्जुन सिंह ने श्यामा चरण शुक्ल के समर्थकों की अनदेखी करते हुए प्रदेश की राजनीति में नए लोगों पर आधारित अपना अलग गुट बनाया.

वो कहते हैं, "श्यामा चरण शुक्ल के ज़्यादातर समर्थक चूंकि ब्राह्मण थे इसलिए उनके गुट की अनदेखी का सीधा असर ये हुआ कि ब्राह्मणों का वर्चस्व कम होता गया."

अर्जुन सिंह पर ब्राह्मणों की अनदेखी करने के आरोप कितने सहीं हैं ये बहस का मुद्दा ज़रूर हो सकता है लेकिन ये भी एक विडंबना है कि 1980 में अर्जुन सिंह जब मुख्यमंत्री बने तो उस समय 320 की विधान सभा में 50 ब्राह्मण एमएलए थे जो कि अब तक की सबसे बड़ी संख्या है.

इस समय कांग्रेस की तरफ़ से विधान सभा के पूर्व अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी प्रदेश के सबसे बड़े ब्राह्मण नेता कहे जा सकते हैं. इस बार वो ख़ुद तो चुनाव नहीं लड़ रहे हैं लेकिन उनके पुत्र सुंदरलाल तिवारी और उनके नाती विवेक तिवारी कांग्रेस की टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं.

उनके अलावा सत्यव्रत चतुर्वेदी और सुरेश पचौरी कांग्रेस के बड़े ब्राह्मण नेताओं में शुमार किए जाते हैं. भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से कैलाश चंद्र जोशी, नरोत्तम मिश्र, अनूप मिश्र, राजेंद्र शुक्ल, और गोपाल भार्गव सरीखे ब्राह्मण नेता मौजूद हैं. लेकिन इनमें से कोई ऐसा नहीं जिनका प्रभाव पूरे प्रदेश में हो.

सबके अपने विचार हो सकते हैं लेकिन सच्चाई ये है कि मौजूदा विधान सभा में 23 ब्रह्माण विधायक हैं जिनमें कांग्रेस के पांच और भाजपा के 18 विधायक हैं. मौजूदा कैबिनेट में पांच ब्राह्मण मंत्री हैं.

इस बार के चुनावों में कांग्रेस ने 28 और भारतीय जनता पार्टी ने 31 ब्राह्मणों को टिकट दिया है, उनमें से कितने जीत कर आते हैं ये तो आठ दिसंबर को ही पता चलेगा. लेकिन इतना ज़रूर है कि समाज के बदलते समीकरण में ब्राह्मणों के लिए पहले जैसी राजनीतिक हैसियत हासिल करना शायद इतना आसान नहीं होगा.

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