आदिवासियों की रिहाई के मामले में खानापूर्ति कर रही सरकार

बीडी शर्मा और हरगोपाल के बीच डीएम एलेक्स पॉल.
Image caption बीडी शर्मा और हरगोपाल के बीच डीएम एलेक्स पॉल.

छत्तीसगढ़ की जेल में बंद नक्सली होने के आरोपी आदिवासियों की रिहाई का मामला अटक गया है. सरकार की हाई पावर कमेटी ने तय किया था कि वह राज्य की अलग-अलग जेलों में बंद आदिवासियों की ज़मानत याचिका का अदालत में विरोध नहीं करेगी.

लेकिन स्थानीय अदालतों के अलावा हाईकोर्ट में भी सरकार के हलफ़नामे महज खानापूर्ति साबित हो रहे हैं.

कम से कम 131 मामले ऐसे हैं, जो इस हाई पावर कमेटी की अनुशंसा और राज्य सरकार के हलफ़नामे के बाद भी अदालत में अटके हुए हैं. इसके अलावा इस हाई पावर कमेटी के कामकाज की रफ्तार भी अत्यंत धीमी है.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का दावा है कि छत्तीसगढ़की जेलों में तीन हज़ार से अधिक निर्दोष आदिवासी बंद हैं लेकिन डेढ़ साल में यह हाई पावर कमेटी दो सौ मामले भी नहीं पेश कर पाई है.

छत्तीसगढ़ सरकार की इस हाई पावर कमेटी की अध्यक्ष निर्मला बुच का कहना है कि उनका काम केवल अनुशंसा करना है और निर्णय लेना अदालतों का काम है.

लेकिन संवैधानिक मामलों के जानकार कहते हैं कि कानून व्यवस्था की जिम्मेवारी राज्य सरकार की होती है और अगर सरकार के हलफ़नामे पर अदालत ज़मानत नहीं दे सकती तो सरकार इस मामले में राज्यपाल को हस्तक्षेप करने के लिए कह सकती है और ऊपरी अदालतों में जा सकती है.

माओवादियों से समझौता

असल में पिछले साल 21 अप्रैल को माओवादियों ने सुकमा ज़िले के मांझीपारा गांव से कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण कर लिया था, जिसके बाद यह हाई पावर कमेटी बनाई गई थी.

कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन के मामले में माओवादियों ने सरकार से बातचीत के लिए डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा और प्रोफेसर हरगोपाल को अपना मध्यस्थ बनाया था. दूसरी ओर राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव निर्मला बुच और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्य सचिव एसके मिश्रा को इस मामले में बातचीत के लिए अधिकृत किया था.

Image caption पिछले साल 21 अप्रैल को माओवादियों ने सुकमा ज़िले के मांझीपारा गांव से कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण कर लिया था

सरकार और माओवादियों के मध्यस्थों के बीच लिखित समझौते के बाद तीन मई को कलेक्टर को रिहा किया गया था.

इस समझौते के अनुसार राज्य सरकार ने कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के तुरंत बाद मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव निर्मला बुच की अध्यक्षता में छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव एवं पुलिस महानिदेशक की एक उच्चाधिकार प्राप्त स्थायी समिति का गठन भी कर दिया.

यह समिति इस बात की समीक्षा करने के लिए गठित की गई थी कि राज्य की विभिन्न जेलों में बंद बंदियों के मामले सुलझाए जा सकें. माओवादियों के मध्यस्थों द्वारा इस समिति को जो सूची दी गई थी, उसे प्राथमिकता से समीक्षा करने की बात भी समझौते में दर्ज की गई थी.

नाराज़गी

ये और बात है कि माओवादियों के मध्यस्थ रहे प्रोफेसर जी हरगोपाल इस समिति के कामकाज से असंतुष्ट हैं.

वे कहते हैं- “मेरी नज़र में निर्मला बुच कमेटी पूरी तरह से निष्क्रिय है और हमारे साथ जो समझौता किया गया था, उसका लाभ छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को नहीं मिला.”

छत्तीसगढ़ सरकार के साथ समझौते में सक्रिय भूमिका निभाने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रवीण पटेल का आरोप है कि राज्य की जेलों में तीन हज़ार से अधिक निर्दोष आदिवासी कई सालों से बिना ट्रायल के बंद हैं. प्रवीण पटेल कहते हैं कि सरकार नक्सलियों के नाम आदिवासियों को जेलों में बंद कर देती है.

प्रवीण पटेल कहते हैं-“ 6 अप्रैल 2010 को देश के सबसे बड़े नक्सली हमले में 76 जवान मारे गये थे और जिन निर्दोष 10 आदिवासियों को पकड़ा गया, उन्हें इसी साल अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया. अगर निर्मला बुच कमेटी चाहती तो जेलों में बंद हज़ारों आदिवासियों के मामले कम से कम अदालत की चौखट तक तो पहुंच ही जाते.”

खानापूर्ति

हालांकि निर्मला बुच कमेटी की अनुशंसाएं भी महज खानापूर्ति ही नज़र आती हैं. हाईकोर्ट के अधिवक्ता सतीश वर्मा बताते हैं कि नक्सलियों के शहरी नेटवर्क चलाने के आरोप में गिरफ्तार मीना चौधरी की ज़मानत याचिका उन्होंने हाईकोर्ट में लगाई थी. सरकार ने इस ज़मानत का विरोध नहीं करने के लिये बकायदा हलफ़नामा भी दिया था लेकिन मीना चौधरी को अदालत ने ज़मानत देने से मना कर दिया.

Image caption हाई पावर कमेटी बैठक में निर्मला बुच.

छत्तीसगढ़ सरकार की हाई पावर कमेटी की अध्यक्ष निर्मला बुच का कहना है कि उनकी कमेटी का काम जेलों में बंद बेकसूर लोगों के मामलों की समीक्षा करना है और उसके बाद हम अपनी रिपोर्ट सरकार को देते हैं. सरकार यह तय करती है कि संबंधित मामले में जमानत का विरोध नहीं करना है.

निर्मला बुच कहती हैं- “ यह कोर्ट पर निर्भर करता है कि वह किसी को ज़मानत दे या नहीं दे. हम इसमें कैसे हस्तक्षेप कर सकते हैं?”

लेकिन जानकार निर्मला बुच की इस राय से सहमत नहीं हैं. संविधान विशेषज्ञ और राज्य के वरिष्ठ अधिवक्ता कनक तिवारी का कहना है कि राज्य सरकार अगर किसी आरोपी के चाल-चलन, उसका आपराधिक इतिहास और कानून व्यवस्था का आकलन करते हुये जमानत का विरोध नहीं करती है तो न्यायालय को सरकार पर भरोसा करना चाहिये.

कनक तिवारी कहते हैं- “सरकार ने अगर माओवादियों की मांग को स्वीकार करते हुये समझौता किया है तो उसे पूरा करने की भी जिम्मेवारी राज्य सरकार की है. सरकार अगर चाहे तो वह इस मामले में राज्यपाल से हस्तक्षेप करने के लिए कह सकती है. अपने समझौते का हवाला देते हुए इन ज़मानतों के लिए वह सुप्रीम कोर्ट भी जा सकती है. लेकिन सरकार इससे बच रही है.”

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