हाँ, मुझे यौनकर्मी बनना पड़ा: ट्रांसजेंडर सुरों की दास्तां

कांता

कांता हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित एक गायिका हैं. उनकी प्रतिभा का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि अपने राज्य की प्रतियोगिता में उन्होंने 2003 से 2007 तक लगातार चार बार सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार जीता है.

आज मणिपुर में उनका नाम है, लेकिन उनकी राह मुश्किलों भरी रही है और उसकी वजह यह है कि वे ट्रांसजेंडर हैं. उनके परिवार और समाज को यह बात कभी रास नहीं आई कि वो महिला की तरह रहें और महिला आवाज़ में गाना गाएँ.

कांता जैसे कलाकारों की आवाज़ से सजी संगीत एल्बम भारत में शायद पहली बार रिलीज़ हो रही है, जिसमें सभी कलाकार ट्रांसजेंडर समुदाय के हैं- नाम है सॉन्ग्स ऑफ कारवां जिसमें मुख्य भूमिका निभाई जीवन ट्रस्ट के अनुभव गुप्ता ने.

संगीत एल्बम की इस कहानी के बहाने हमें ट्रांसजेंडर समुदाय के इन लोगों की दास्तां, प्रताड़ना और हिम्मत की कहानी जानने का भी मौका मिला.

जगदीश से अक्कई तक

कर्नाटक के जगदीश पुरुष पैदा हुए, लेकिन वे ख़ुद को ट्रांसजेंडर मानते थे और महिलाओं की तरह रहना उन्हें पसंद था. इसी वजह से उन्हें घर छोड़ने को मजबूर होना पड़ा. अपनी टूटी-फूटी हिंदी में वो बताती हैं कि जब कोई आसरा न रहा तो वे यौनकर्मी बन गईं. अब उन्होंने अपना नाम अक्कई रख लिया है.

अक्कई बताती हैं, "समाज ने मुझे स्वीकार नहीं किया, परिवार ने तिरस्कार किया, कौन मुझे नौकरी देता. मैने यौनकर्मी का काम करना शुरू कर दिया- चार साल तक. रोज़ पुलिस वालों से किचकिच होती. वो कोई न कोई केस कर देते."

अक्कई को कर्नाटक संगीत का शौक था, एक शिक्षक सिखाने को तैयार भी हुई लेकिन बाकी छात्रों के माता-पिता को एक ट्रांसजेंडर छात्र से ऐतराज़ था. पर इस संगीत एल्बम ने उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया है.

भजनगायक रानी

दिल्ली की रहने वाली रानी को बचपन से ही गाने का शौक था और आज वो दिल्ली में लोकप्रिय भजन गायक हैं. हम जब उनके घर गए तो उन्होंने अपने भजन और गायकी की झलक हमें भी सुनाई.

अपने जीवन के बारे में रानी बताती हैं,"कुछ लोग कभी कभी मेरे माता-पिता को टोकते थे कि तुम्हारा लड़का लड़कियों की तरह रहता है. फिर मैंने उनसे खुलकर बात की और समझाया कि मैं ऐसी ही हूँ. मैने उन्हें बताया कि मैं भजन गायक बन गई हूँ. मैं कोई ग़लत काम नहीं कर रही. इसलिए मुझे मेरे हिसाब से जीने दें.

रानी ने बताया, "जब मैं सार्वजनिक मंच पर भजन गाती हूँ तो कई बार लोग छींटाकशी करते हैं लेकिन मैं जब गाती हूँ तो सब भूल जाती हूँ और अपनी गायकी से उन लोगों का भी मन जीत लेती हूँ जो मेरे बारे में ग़लत सोचते हैं. मेरे परिवारवाले मेरा पूरा साथ देते हैं."

एल्बम में भले ही नौ लोगों ने आवाज़ दी है लेकिन सभी कलाकार खुलकर सामने आने को तैयार नहीं-समाज के बंधनों ने उन्हें जकड़ा हुआ है.

सामने नहीं आ सकते

संगीत एल्बम के कलाकारों से बातचीत के दौरान हमारी मुलाकात मुंबई के हंसा से. वो ट्रांसजेंडर हैं लेकिन कभी परिवार या समाज को बताया तक नहीं.

उन्होंने बड़ी साफ़गोई से बताया, "मेरी शादी हो चुकी है और दो बच्चे भी हैं. मुझे कभी अपने बारे में बताने की इच्छा नहीं हुई और डर भी लगता है. हम राजस्थान से हैं और वहाँ ट्रांसजेंडर होने को इज़्ज़त से जोड़कर देखा जाता है. हमारे यहाँ यह सब नहीं चलता. हाँ थोड़ा-बहुत बातचीत से लोगों को आभास हो जाता है."

इन कलाकारों का जीवन भले थोड़ा बेरंग हो, लेकिन इनके गीतों में रंग ही रंग है. हंसा ने ट्रांसजेंडर एल्बम में भाभी-देवर की छेड़छाड़ के रंगों वाला गाना गाया है तो कांता ने एक प्रेमिका के भाव को आवाज़ दी है.

इस एल्बम की परिकल्पना की है जीवन ट्रस्ट के अनुभव गुप्ता ने. वे बताते हैं, "मैंने देखा कि अकसर ट्रांसजेंडर समुदाय हाशिए पर रहता है. इनमें कई लोग प्रतिभावान होते हैं. इसलिए मैने सोचा क्यों न ऐसा एल्बम निकाला जाए, जिसमें कलाकार ट्रांसजेंडर हों."

हालांकि इसमें पैसा लगाने को कोई तैयार नहीं था और अंतत नीदरलैंड्स की एक संस्था ने पैसा दिया, तो एल्बम बनकर तैयार हुई. पलेनेट रोमियो फाउंडेशन के मार्क वैन बताते हैं कि भारत समेत ज़्यादातर देशों में ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ भेदभाव होता है.

लावणी गायिका कल्याणी

एल्बम में कल्याणी ने मराठी में लावणी को बख़ूबी गाया है. कल्याणी उनका असल नाम नहीं है. पारिवारिक कारणों से वे असल नाम बता भी नहीं सकते. समाज की उपेक्षा के बाद उन्हें माता-पिता को छोड़कर हिजड़ों के बीच रहना पड़ा.

कल्याणी ने बताया, "मैं जब छोटा था तो मेरे पिताजी मुझसे कहते थे कि चलकर दिखाओ. उन्हें लगता था कि मेरी चाल में लचक है. लचक हटाने के लिए कमर पर बेल्ट मारी जाती थी. मैं क्या जानूँ यह लचक क्यों है. भगवान ने मुझे ऐसे ही बनाया है. आप बताइए कि सात-आठ साल के बच्चे को अपनी सेक्शुलिएटी के बारे में कुछ पता होता है? मुझे तो नहीं लगता. लेकिन मैं जब बच्चा था तो दुनिया ने ताने मार-मारकर मुझे मेरी सेक्शुएलिटी का अहसास दिलाया. लोगों से सवाल है कि अगर आपको पता चल ही गया था कि मैं क्या हूँ तो मुझे स्वीकार क्यों नहीं किया."

इस संगीत एल्बम के बहाने कल्याणी समाज से कई सवाल पूछना चाहती हैं.

कल्याणी कहती हैं, "आप कहते हो कि हिजड़े अनपढ़ होते हैं पर उन्हें माँ-बाप के साथ रहकर पढ़ने का मौका ही कहाँ देता है समाज. इसके बाद हमारा उग्र रूप समाज को देखना पड़ता है जब हम आपके मुँह पर तालियाँ ठोकर आपसे 500 या हज़ार रुपए ऐंठ लेते हैं. तब आप कहते हैं कि हिजड़े ज़बर्दस्ती करते हैं. लेकिन आपने हमारे लिए समाज में रोज़ी-रोटी का और कौन सा ज़रिया छोड़ा है. मगर पैसे देकर शारीरिक रूप से हमारा इस्तेमाल करना लोगों को ग़लत नहीं लगता."

पुराने ज़माने से तुलना करते हुए उन्होंने बताया, "आप मुग़लों के ज़माने में और राजा रजवाड़ों के ज़माने में जाइए, तो हमें बहुत इज़्ज़त मिलती थी. हम राजाओं के महलों में रहा करते थे, उनके जनानखानों में रहते थे. राजा लोग युद्ध पर जाते तो हिजड़ों की टोली साथ में रहती थी. अपनी बेग़मों के साथ हमें रखते थे. आज के ज़माने में बाकी लोगों की प्रगति हो गई, लेकिन हिजड़ों की प्रगति के बारे में किसी ने नहीं सोचा."

स्कूल में झेला अपमान

वडोदरा की ट्रांसजेंडर कलाकार अंकुरा की भी कुछ ऐसी ही कहानी है. उन्होंने बताया, "मैं पुरुष पैदा हुई लेकिन मुझे महिलाओं की तरह रहना पसंद था. स्कूल में बच्चे एक बेंच पर मेरे साथ नहीं बैठते थे. सब चिढ़ाकर बोलते थे-हमारी क्लास में 'ऐसा' कोई है..और सब मेरी तरफ़ देखते थे. मुझे आकर पूछते थे -क्यों तुम्हें महावारी होती है. मैं प्रिंसिपल के पास शिकायत करने जाती थी. लेकिन दरवाज़े पर जाकर सोचती कि उनसे क्या कहूँगी. घर में अंतत: जब पता चला कि मैं ट्रांसजेंडर हूँ तो माँ ने कई दिनों तक बात नहीं की थी."

लेकिन इन सब ट्रांसजेंडर कलाकारों ने मुश्किल हालात के बावजूद आज अपने लिए थोड़ी सी ज़मीन ढूँढ ली है. कभी सेक्स वर्क करने वाली अक्कई को एक संस्था का सहारा मिला, पढ़ाई की और आज वो मानवाधिकार कार्यकर्ता बन गई हैं. पूर्व मुख्य न्यायाधीश के शपथ ग्रहण में उन्हें विशेष न्यौता मिला.

बिज़नेसवीमेन कल्कि

एल्बम में अंग्रेज़ी गाना गाने वाली कल्कि बैम्बू उत्पादों का बिज़नेस चलाती हैं. पोस्टग्रेजुएशन की है और दूसरे ट्रांसजेंडर लोगों को सिटीज़न जर्नलिस्ट बनाने में मदद करती हैं. अपने दिल की बात सुनाते हुए कल्कि ने सर्जरी करवा ली है और अब वो पूरी तरह से औरत बन गई हैं.

एल्बम बनाने वाले अनुभव गुप्ता चाहते थे कि देश के हर कोने से वे ट्रांसजेंडर कलाकार लें, लेकिन ढूँढने के बाद भी उन्हें पंजाब और कश्मीर से ऐसे ट्रांसजेंडर नहीं मिले जो खुलकर सामने आने को तैयार हों.

इन सब कलाकारों का मानना है कि समाज हमेशा उन्हें दरकिनार करते आया है और ये एल्बम ट्रांसजेंडर समुदाय की ओर ध्यान खींचने में छोटा लेकिन अहम क़दम हो सकता है.

बंगाल की ट्रांसजेंडर गायिका अमितावा सरकार की मानें, तो अगर दुनिया साथ न भी दे तो भी उनके जैसे लोगों को अकेले ही अपने पथ पर संघर्ष करते हुए चलते रहना चाहिए. यही बात इस अमितावा ने एल्बम में रबींद्रनाथ टैगौर के गाने के ज़रिए कहने की कोशिश की है- एकला चलो रे.

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