'जो तुम्हें सही लगे वो करो'

Girish Batra by Anitha Balachandran, गिरीश बत्रा, अनीता बालचंद्रन

गिरीश बत्रा नेटएंबिट कंपनी के संस्थापक, चेयरमैन और प्रबंध निदेशक हैं. यह कंपनी भारत की एक अग्रणी वित्तीय उत्पाद और सेवाएं देने वाली कंपनी है.

पहली पीढ़ी की कारोबारी श्रृंखला में पढ़ाकू गिरीश के नौकरी छोड़कर सफल कारोबारी बनने की कहानी उन्हीं के शब्दों में.

'मैं ग़रीबी हूँ, मैं तुम्हें प्यार करती हूँ'

मेरा जन्म 1972 में महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ था. मेरे पिता दूरसंचार विभाग में बतौर वार्डन काम करते थे. मेरी माँ एक गृहिणी थी और वो एक व्यापारिक में जन्मी थीं. मेरे नाना और दादा दोनों पंजाबी थे जो बंटवारे के समय पाकिस्तान से हिंदुस्तान आए थे.

मेरे पिता के परिवार ने पाकिस्तान से आकर हरिद्वार का रुख किया क्योंकि हिंदुस्तान में यही एक जगह थी जिसके बारे में उन्हें पता था. वे यहाँ तीर्थ करने आया करते थे. वे हरिद्वार के पास रुड़की में बस गए.

बंटवारे के समय मेरे पिता पांच साल के थे. उन्होंने बंटवारे में अपनी माँ और बहन को खो दिया था. लेकिन पिताजी ने कभी भी इस बारे में हमसे खुलकर बात नहीं की.

पढ़ाई से समझौता नहीं

मेरे पिता पढ़ाई के मामले में कोई समझौता नहीं कर सकते थे. हर चीज़ पर छूट मिल सकती थी लेकिन पढ़ाई पर नहीं.

मुझे यह बात भी बड़ी शिद्दत से समझा दी गई थी कि पैसा बहुत सावधानी से खर्च किया जाना चाहिए.

बचपन में मैं थोड़ा सा मोटू था. चश्मा लगाता था. स्कूल में बच्चे मुझे चिढ़ाते रहते थे. ज़ाहिर था मेरे अंदर आत्मविश्वास बिल्कुल नहीं था.

स्कूल के प्रति मेरी नापसंदगी के अलावा मैं हर मायने में अच्छा बच्चा था.

लेकिन यदि मुझे अपने पढ़ाई वाले वो दिन दोबारा जीने के लिए कहा जाए तो मैं साफ़ तौर पर मना कर दूंगा.

स्कूल के बाद मेरा दाखिला इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पंतनगर के जीबी पंत यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड टेक्नॉलॉजी में हो गया. वहाँ हॉस्टल का जीवन मेरे लिए वाकई मुश्किल था.

कई दिनों तक मेरे मन में एक भावनात्मक खालीपन रहा. मुझे भयंकर रैगिंग भी झेलनी पड़ी. लेकिन कॉलेज में आ कर अब मैं एक साहसी लड़का बन गया था.

पहली नौकरी और पहली कार

आखिरकार मैंने इंजीनियरिंग पास कर ली और मुझे नौकरी भी मिल गई. लेकिन इस कंपनी का माहौल कुछ ऐसा था कि मैं अपने से सवाल करता था, 'तुम आखिर कहाँ किस चीज़ में फंस गए हो?'

मुझे अच्छी तरह मालूम था कि मुझे उस नौकरी से बाहर निकलना होगा. आखिरकार कैट की पढ़ाई के लिए मैंने नौकरी छोड़ दी. मैं अपने अंग्रेज़ी ज्ञान को लेकर भी हीनभावना का शिकार था. अपने प्रति मुझमें बहुत से संदेह थे और मैं हकलाता भी था.

लेकिन मेरी कैट परीक्षा बहुत अच्छी रही और मुझे आईआईएम, अहमदाबाद में दाखिला मिल गया. वहाँ का माहौल बहुत अलग था. मैंने अपने आप को हर छोटी सोच और नज़रिए से अलग करना शुरू कर दिया था. वहाँ मैंने तय किया कि मैं एक उद्यमी बनना चाहता हूँ.

आईआईएम के बाद मेरी नियुक्ति गोदरेज कंपनी में हो गई और मैंने उनके कृषि संबधी व्यापार विभाग के लिए काम शुरू कर दिया.

गोदरेज कंपनी में मेरी नौकरी ने मुझे उन परिस्थितियों का आदी बना दिया था जिनमें आप यह मान लेते हैं कि सब कुछ स्पष्ट और न्यायपूर्ण ढंग से होगा. यह मेरे लिए महत्वपूर्ण था कि इस माहौल को नेटएंबिट में स्थापित करने से पहले मैं खुद बतौर कर्मचारी देखूं और अनुभव करूँ जो कि मैंने गोदरेज में किया.

गोदरेज में काम शुरू करने के कुछ ही महीनों में मुझे गोदरेज रियल गुड चिकन नामक नया उत्पाद बाज़ार में उतारने का मौका मिला. मैं तीन लोगों की छोटी सी टीम के साथ मुंबई से बैंगलोर आ गया था.

मैंने गोदरेज में बहुत मेहनत की. उस दौरान मेरी सबसे बड़ी तमन्ना पूरी हो गई. गोदरेज ने नीति बनाई कि हर असिस्टेंट मैनेजर को एक मारुति 800 कार दी जाएगी. अपने दोस्तों में मैं अकेला था जिसके पास कार थी.

सरकारी नौकरी वाली बीवी

साल 1998 में मेरे माता-पिता ने मुझसे मेरी शादी के बारे में पूछना शुरू कर दिया. मैंने जवाब दिया, 'देखिए मैं उद्योगपति बनना चाहता हूँ इसलिए मुझे ऐसी लड़की चाहिए जो सरकारी नौकरी में हो ताकि हममें से किसी एक की तो स्थायी आमदनी हो.'

मैं कई लड़कियों से मिला. कई मुझे पसंद नहीं आईं और कई ने मुझे पसंद नहीं किया. तभी हमारी कॉलोनी की ही एक महिला ने मेरी माँ को दीप्ति के बारे में बताया. दीप्ति नैशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन में काम करती थीं. वो मेरे मापदंडों पर खरी उतर रही थीं.

हमारी सगाई हो गई और सगाई के बाद मैं बैंगलोर चला आया. दीप्ति को मैं हर रोज़ फ़ोन करता था. मैंने अपनी पूरी तनख्वाह एसटीडी कॉल पर ख़त्म कर दी थी.

हमारी शादी की तारीख तय हो गई और हम शादी की तैयारियों में जुट गए. एक शाम उसने फोन पर कहा, 'गिरीश एनटीपीसी के बैंगलोर दफ्तर में ह्यूमन रिसोर्स के लोगों के लिए कोई जगह नहीं है. मैं सोच रही हूँ कि शादी से पहले नौकरी छोड़ दूं'. उसकी यह बात सुन कर मैं घबरा गया लेकिन दीप्ति पर मेरी घबराहट का कोई असर नहीं था.

'आख़िर यह बिचार कब होबे?' से शुरू हुआ लम्बा सफ़र

अपने फ्लैट पर वापस लौट कर मैंने मेरे साथ रहने वाले दोस्त निखिल को बताया कि कैसे मेरी एक सरकारी नौकरी करने वाली बीवी के बूते पर बिजनेसमैन बनने की योजना पानी में जाने वाली थी.

निखिल ने कहा, 'तुम ऐसा क्यों नहीं करते कि नौकरी छोड़ कर दिल्ली शिफ्ट हो जाओ और वहाँ अपना काम शुरू कर लो.'

इस सुझाव को लेकर मेरी पहली प्रतिक्रिया थी, 'नहीं ऐसा नहीं हो सकता. मैं कैसे जा सकता हूँ? न मेरे पास कोई पूंजी है, न ही कोई बिज़नेस प्लान'

उस समय मैं इससे घबरा गया था. लेकिन अब मैंने खुद को इस बात के लिए प्रशिक्षित कर लिया है कि किसी भी नई संभावना के सामने आने पर पहले-पहल 'न' मत कहो. अब मैं सबसे पहले यह सोचता हूँ कि इसे कैसे किया जा सकता है.

माता-पिता और पत्नी का साथ

मैंने दिल्ली आकर कारोबार करने के बारे में अपनी माँ से बात की. उन्होंने सिर्फ इतना कहा, 'कर लो'. वो साथ में यह कहना नहीं भूलीं, 'पिताजी से भी एक बार बात कर लेना'.

मेरे पिता का कहना था, ' मुझे यकीन है कि तुमने यह फैसला अच्छी तरह सोच समझ कर लिया होगा. मैं तुम्हारे साथ हूँ.'

मैंने इस बारे में दीप्ति से भी पूछा और उसने भी यही कहा कि, 'जो तुम्हें सही लगे वो करो'.

मेरे पिता के पास पूरे जीवन की जोड़ी हुई पूँजी तेरह लाख रुपए थी. उन्होंने उसमें से एक लाख रुपए मुझे काम शुरू करने के लिए दिए.

अभावों में बड़े होने का एक फायदा यह होता है कि आपको बिना किसी पूँजी या बेहद कम पूँजी से काम की शुरुआत करनी होती है. ऐसे में बाद में भी चुनौतियों का सामना करने में दिक्कत नहीं आती. क्योंकि आपके पास कभी भी अथाह पैसा नहीं था इसलिए यदि अब भी नहीं है तो कोई मुश्किल नहीं.

कोई भी महान उद्यम अकेले एक व्यक्ति से नहीं बन सकता. हम जिन साझेदारों के साथ कारोबार शुरू करते हैं शुरुआत में तो उन्हें कम पैसा देते हैं लेकिन जब काम शुरू होकर मुनाफा मिलने लगता है तो उस मुनाफे का फायदा भी हमारे साझेदारों, साथियों को मिलने लगता है.

आप जोखिम भी साथ साथ उठाते हैं और मुनाफा भी साथ-साथ कमाते हैं.

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