हिंदी साहित्य को 'पिद्दी फाइटरों' का नहीं जवानों का भरोसा

पटना पुस्तक मेला

किताबों के मेले में बढ़ती युवाओं की भीड़ देखकर अच्छा लगता है. छोटे-बड़े शहरों में जैसे-जैसे किताबों से मोहब्बत की कहानी कम सुनाई देती है, मेले में लोगों और खासकर नौजवानों के उबलते झुंड को देखकर भरोसा होता है कि हिंदी साहित्य ज़िंदा रहेगा. इसे लिखने और पढ़ने वाले कम नहीं बल्कि बढ़ते जाएंगे.

मैं ये मानता हूं कि आज का भारत, नए युवाओं का भारत है. ऐसा भारत जिसमें 65 फीसदी संख्या युवाओं की है. इस भारत को बहुत सकारात्मक तरीके से देखे जाने की कोशिश की जानी चाहिए.

कई लोग ये समझते हैं कि ये किताबें नहीं पढ़ते. कुछ समझते हैं कि ये दिनभर कम्प्यूटर के पास रहते हैं. कुछ ये भी समझते हैं कि इंटरनेट ही इनका घर है. इंटरनेट में ही बस गए हैं ये लोग. मैं इनको इस तरह नहीं देखता. मैं काले और सफेद में इनको नहीं देखता.

मैं मानता हूं कि हमारा जो युवा वर्ग है और उनमें जो शिक्षित वर्ग है उसकी रुचि किताबों को पढ़ने में है. और तमाम पुस्तक मेलों की एक दिलचस्प बात ये है कि ये अलग-अलग तरह के विमर्श का मंच तैयार करते हैं. यहां लगातार बहसें होती हैं. ख़ास बात ये है कि आज की समस्याओं पर बहसें हो रही हैं.

स्तर और मौलिकता का सवाल

बहसों के स्तर को लेकर विभेद हो सकता है. जो स्तर है वो हर जमाने में थोड़ा बढ़ता-घटता है. और यह केवल साहित्य और उससे जुड़ी बहसों के लिए सही नहीं है, यह हर किसी के लिए सही है चाहे वो साहित्य हो या राजनीति.

स्तर के साथ-साथ मौलिकता का भी सवाल है. क्या हिंदी में मौलिक काम हो रहा है. सवाल जायज़ है. ये बात 20वीं सदी में भी उठी थी. क्या चीज है मौलिकता? आधुनिकता से उसका कितना संबंध है? जिसको बिल्कुल ही मौलिक कहा जाता है, उस तरह का तत्व नहीं है अब.

पर क्या पाठक वर्ग छोटा होता जा रहा है...ये सवाल हिंदी के संदर्भ में जायज़ है.

एक बड़ा महान कवि अपनी कविताओं के ज़रिए एक नया पाठक वर्ग तैयार करता है जैसे निराला ने तैयार किया, जो नागार्जुन ने तैयार किया. यशपाल ने किया, अमृत लाल नागर ने किया, फणीश्वरनाथ रेणु ने किया. लेकिन आज जो नए कवि हैं, आज के जो बड़े लेखक हैं, वे उनकी तरह बड़े लेखक नहीं हैं, वे उतने प्रतिभाशाली नहीं है.

घटती गहराई बढ़ती बेचैनी

ऐसे में पाठकों का जो स्तर है वो भी अलग तरह का हो गया है. जो नए लेखक आ रहे हैं वे ज्यादा नहीं पढ़ना चाहते. उनके अंदर बौद्धिक गहराई कम है, लेकिन बौद्धिक गहराई उतनी चिंता की बात नहीं है. वो तो उनकी जीवन यात्रा से बढ़ती जाएगी. सबसे बड़ी चिंता की बात है कि उनकी जिज्ञासा कम हो गई. उनमें और ज्यादा जानने की, समस्या के तह तक जाने की बेचैनी घट गई है.

बेचैनी का कम होना भूमंडलीय स्तर पर हुआ है. इसमें कोई शक नहीं कि अभी का जो युवा है उसमें एक तरह का उपभोक्तावाद आया है. जो बिल्कुल नए लेखक हैं, जो नए कवि हैं, उसमें सिर्फ कवियों की बात नहीं, जो नया वर्ग आया है, कहीं न कहीं उसमें एक उपभोक्तावाद की संस्कृति आई है. बाजारवाद हावी हुआ है.

पर इन सब के बीच क्या हिंदी में क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी लेखन हो रहा है. मुझे लगता है हो रहा है.

जब हमारे यहां अज्ञेय लिख रहे थे या जब हमारे यहां निराला लिख रहे थे. हजारी प्रसाद द्विवेदी लिख रहे थे, हजारी प्रसाद जब कबीर को लेकर आए तो उन्होंने एक तरह की क्रांति लाई. कबीर के माध्यम से लोगों को एक नए चिंतन का परिचय मिला, लोगों को एक नई भूमि मिली.

चिंता और पीड़ा का सबब

मेरी चिंता और मेरी पीड़ा का विषय है कि आज विर्मश और साहित्य दुनिया के सरोकार से हटकर निजी हो गया है. मेरी उम्र बढ़ रही है. मैं 60 पार कर गया हूं, जब मैं अपने से बहुत छोटी उम्र के लेखकों को देख रहा हूं तो देखता हूं कि वे आपाधापी कर रहे हैं, तो मुझे पीड़ा पहुंचती है.

एक उथलापन आया है. कहना चाहिए कि एक पिद्दी फ़ाइट है, उसमें कुछ रखा नहीं है, वो कहीं न कहीं व्यक्तिवाद की लड़ाई है या कम जानने की लड़ाई है. अज्ञान की लड़ाई है वो.

दो ज्ञानी जिस तरह से लड़ते हैं उसमें सीखने का मौका मिलता है, जब अज्ञेय और नामवर सिंह एक-दूसरे से असहमत होते थे तो उस असहमति से भी हम शिक्षित होते थे. रामविलास शर्मा और अज्ञेय या फिर राम विलास शर्मा और नामवर सिंह असहमत होते थे तो हमें सीखने का मौका मिलता था.

आज के जो नए कवि असहमत होते हैं तो बहुत ही सतही कारणों से, किसका क्या छप गया. किसकी किताब कितनी ज्यादा बिक सकती है, कौन विदेश जाएगा, किसको कौन सा पुरस्कार मिलेगा, इसका मतलब यह है कि आज के जो नए कवि हैं उनके सामाजिक सरोकारों एवं सामाजिक प्रतिबद्धता में बेहद कमी आई है.

मैं उन पर ये आरोप नहीं लगा रहा हूं, मैं ये मानता हूं कि सामाजिक सरोकार की समझ कम होती जा रही है.

फिर भी मुझे लगता है कि मुझे भरोसा है. उम्मीद है, भारत के युवा लेखकों से, यहां पनप रहे बाज़ारवाद से भी और किताबों के बढ़े मेले से भी. मैं भारत और इसकी संस्कृति को जानता हूं इसीलिए निराश नहीं हूं.

(रूपा झा से बातचीत पर आधारित)

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