पॉज़िटिव: तो शादी की बात चलाएं

  • 2 दिसंबर 2013
पॉज़िटिव साथी डॉट कॉम

महाराष्ट्र में अपने परिवार के साथ एक आम जीवन गुज़ार रही निशा जब प्रेगनेंट हुईं और जांच के लिए अस्पताल गईं, तब उन्हें पता चला कि वो एचआईवी संक्रमित है.

महाराष्ट्र के परभानी के एक अस्पताल में ब्लड टेस्ट के दौरान इस बात की पुष्टि हुई. उन्हें लगा कि उनकी दुनिया ही ख़त्म सी हो गई.

उनके पति का भी टेस्ट हुआ और नतीजों में पाया गया कि वो भी एचआईवी संक्रमित है. नतीजों ने निशा के इस शक को पुख़्ता कर दिया कि उन्हें ये वायरस उनके पति से ही मिला है.

लेकिन फिर भी निशा को ही दोनों की इस हालत के लिए ज़िम्मेदार माना गया और घर से बाहर निकाल दिया गया. निशा के सबसे बुरा सपना उस समय सच हो गया जब उनका जन्म लेने वाला बेटा भी एड्स पीड़ित निकला.

पति के तलाक देने के बाद निशा के लिए जीवन की तमाम उम्मीदें ख़त्म सी हो गई थीं.

वह कहती हैं, "मैं खुद को और अपने बेटे को ख़त्म कर देना चाहती थी. मैं दोबारा शादी भी करना चाहती थी लेकिन नहीं जानती थी कि एक एचआईवी पॉजिटिव साथी की तलाश कैसे करूँ."

एचआईवी संक्रमित से शादी

परेशानी के कुछ साल गुज़र जाने के बाद निशा को एचआईवी संक्रिमित लोगों के लिए संचालित मुफ़्त वैवाहिक वेबसाइट पॉजिटिव साथी डॉट कॉम के बारे में पता चला.

बयालिस साल की निशा अब सामान्य जीवन बिता रही हैं. उन्होंने कोल्हापुर के एक एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति से शादी की है.

उनके पति 11 साल के बेटे के लालन-पालन में मदद करते हैं. वे कहती हैं, "मेरी ज़िंदगी के सबसे काले वक़्त में यह वेबसाइट उम्मीद की किरण की तरह आई."

इस वेबसाइट पर पंजीकृत पाँच हज़ार एचआईवी संक्रमित लोग भी निशा की तरह ही सोचते हैं. सभी वेबसाइट के संस्थापक और महाराष्ट्र के अधिकारी अनिल वलिव का शुक्रिया अदा करते हैं.

43 वर्षीय अनिल वलिव ने साल 2006 में पॉजिटिव साथी डॉट कॉम की शुरुआत की थी.

यातायात विभाग में अपनी मुश्किल नौकरी के बावजूद भी वे इस ख़तरनाक वायरस के कारण अकेले हुए लोगों के जीवन में खुशहाली लाने के लिए वक़्त निकाल ही लेते हैं.

'ट्रक ड्राइवरों में संक्रमण ज़्यादा'

लातूर में अपनी नौकरी के दौरान वलिव ने ट्रक ड्राइवरों के एचआईवी टेस्ट करवाने शुरू किए. भारत में ट्रक ड्राइवरों को ही सबसे ज़्यादा एचआईवी संक्रमित होने का ख़तरा रहता है.

वलिव बताते हैं कि एक बार एक डॉक्टर ने उन्हें एक एचआईवी संक्रमित मरीज़ के बारे में बताया था जो शादी करना चाहता था.

उस मरीज़ ने डॉक्टर से कहा था कि यदि उसे जल्द ही कोई एचआईवी संक्रमित महिला शादी करने के लिए नहीं मिली तो वह अपनी पहचान छुपाकर किसी स्वस्थ महिला से शादी कर लेगा.

डॉक्टर यह जानकर परेशानी में पड़ गया. उस वक्त वलिव को अहसास हुआ कि एचआईवी संक्रमित लोगों के लिए अपने लिए साथी तलाशना कितना मुश्किल होता है.

90 के दशक में अनिल वलिव के एक मित्र को एड्स हुआ था. वलिव ने उन्हें पीड़ा, अकेलेपन और कष्ट में बर्बाद होते देखा था.

वलिव याद करते हैं, "उसके परिवार ने ही उसका तिरस्कार कर दिया था. मैं उसकी अपना परिवार और बच्चे होने की चाह को नहीं भूल सकता. इस बीमारी को इतना कलंकित माना जाता है कि साल 2006 में जब उसकी मौत हुई तो उसके पिता अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए थे."

एचआईवी संक्रमित लोगों को बहिष्कृत कर दिया जाता है और उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है जबकि उन्हें असल में मदद और समर्थन की ज़रूरत होती है.

वलिव कहते हैं, "यदि इन लोगों की शारीरिक और भावनात्मक ज़रूरतों को पूरा न किया जाए तो ये मजबूर होकर संक्रमण को और फ़ैला सकते हैं."

कितनी शादियां?

अनिल वलिव की वेबसाइट पर पंजीकृत लगभग एक तिहाई लोग ग्रामीण इलाक़ों के हैं.

भारत के ग्रामीण इलाक़ों में ख़राब इंटरनेट सेवाओं को देखते हुए यह उल्लेखनीय है.

कुल पंजीकृत लोगों में से करीब 250 लोग विदेशों में रह रहे भारतीय हैं.

एचआईवी संक्रमित लोगों को क़रीब लाने के लिए वलिव दर्ज़नों बार वैवाहिक मिलन कार्यक्रमों का आयोजन भी कर चुके हैं.

पुणे के रिक्शा चालक रमेश ढोंगड़े उन सैंकड़ों एचआईवी संक्रमित लोगों में शामिल हैं जो साथी पाने की उम्मीद में इस मिलन समारोह में शामिल हुए हैं.

ग्यारह साल पहले ढोंगड़े को पता चला था कि उन्हें अपनी पत्नी से एचआईवी का संक्रमण हो गया है तब उन्हें भी यही लगा था कि उनका जीवन समाप्त हो गया है. ढोंगड़े की पत्नी का निधन हो गया है.

दो साल पहले वलिव द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में उनकी मुलाकात अपनी मौजूदा पत्नी से हुई. उनकी 33 वर्षीय पत्नी एक महिला सहकारी विभाग में कार्य करती हैं.

वे कहते हैं, "दोबारा सामान्य शादीशुदा जीवन शुरू करने से इस बीमारी से लड़ने के लिए मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया है."

अपने इन आयोजनों के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए वलिव अपने पैसे से पोस्टर प्रिंट करवाकर सार्वजनिक स्थानों पर लगवाते हैं.

वलिव कहते हैं, "सोलापुर के एक अस्पताल में हुए ऐसे ही एक कार्यक्रम के लिए मैंने 300 लोगों के आने की उम्मीद की थी. मैंने उनके लिए नाश्ते और भोजन की व्यवस्था की थी. लेकिन सिर्फ 40 लोग ही पहुँचे. मुझे भोजन अस्पताल के ग़रीब मरीज़ों में बाँटना पड़ा."

हालाँकि बाद में गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से इन आयोजनों में शामिल होने वाले की संख्या में वृद्धि हुई.

जब वलिव ने देखा कि उनके आयोजनों में पुरुषों की संख्या महिलाओं से काफ़ी ज़्यादा है तो उन्होंने महिलाओं को आने-जाने का ख़र्च देना शुरू किया.

वलिव अब तक अपनी जेब से लाखों रुपये खर्च कर चुके हैं. लेकिन वे अपनी कोशिशों के ज़रिए एचआईवी संक्रमित लोगों के जीवन में आए बदलाव से संतुष्ट हैं.

वे कहते हैं कि ज़्यादातर मरीज़ हीन भावना, अपराध बोध और निराशा से ग्रस्त होते हैं इसलिए उन्हें खुलकर अपनी बात कहने में वक़्त लगता है.

अपनी जाती की एड्स पीडित से शादी

एक और समस्या यह है कि एचआईवी संक्रमित होने के बाजवूद लोग अपनी जाति के साथी से ही विवाह करना चाहते हैं.

वलिव बताते हैं कि सजातीय विवाह करने का एक कारण यह भी है कि ज़्यादतर लोग अपने एचआईवी संक्रमित होने की बात अपने परिवारों से भी छिपाकर रखते हैं.

उन पर शादी करने के लिए पारिवारिक दवाब बढ़ता जाता है.

पहले से बच्चों वाली महिलाओं को प्राथमिकता नहीं दी जाती, ख़ासकर उन्हें जिनकी बेटियाँ हैं.

वलिव कहते हैं कि मैं सिर्फ़ लोगों को मिलाने का काम करता हूँ. लोग वेबसाइट या फिर वैवाहिक मिलन कार्यक्रम में मिलते हैं और इसके बाद एक दूसरे के सीधे संपर्क में रहते हैं.

यही कारण है कि वलिव को नहीं पता कि उन्होंने अब तक कितनी शादियाँ करवाई हैं.

लेकिन धन्यवाद संदेशों और वेबसाइट पर आए अपडेट्स के आधार पर वे कहते हैं कि उन्होंने कुल 200 से 400 शादियाँ करवाई होंगी. इनमें सिंगापुर, ब्रिटेन और जर्मनी में रहने वाले भारतीय भी शामिल हैं.

वलिव के लिए सबसे बड़ी कामयाबी 2010 में आई जब पुणे में हुए एक कार्यक्रम में 22 लोगों ने एक ही दिन में शादी की.

इनमें स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी हुई लता भी शामिल थीं.

लता के पति की 2002 में एचआईवी संक्रमण के कारण मौत हो गई थी. पति की मौत ने उनका जीवन बर्बाद कर दिया था. उस वक़्त लता सिर्फ 26 साल की थी.

उस समय उनके एक साल के बेटे रवि को एचआईवी संक्रमण नहीं हआ था. लेकिन पति की मौत ने उन्हें तोड़ दिया था.

सेहतमंद बच्चे

लता अपने साथ रवि को लेकर ही समारोह में आई थी. यहाँ उनकी मुलाक़ात विजय से हुई. लता से एक साल बड़े विजय की पत्नी की मौत भी एचआईवी संक्रमण से ही हुई थी. वे स्वंय 12 साल से इस वायरस के साथ जी रहे थे.

अब लता और विजय का एक दो साल का बेटा है जिसका नाम उन्होंने ऋषि रखा है. उसे भी एचआईवी संक्रमण नहीं है.

लता कहती हैं, हमारे बेटे ने हमारे जीवन को सार्थक कर दिया है.

वलिव कहते हैं कि उनकी मदद से शादी करने वाले लगभग दो दर्ज़न दंपतियों के बच्चे सेहतमंद हैं.

वेबसाइट के चर्चित होने के बाद वलिव के मित्रों, शुभचिंतकों और संस्थाओं ने भी मदद की पेशकश की हैं.

वलिव अपनी वेबसाइट के ज़रिए दानदाताओं और एचआईवी संक्रमित बच्चों को भी क़रीब ला रहे हैं.

वे कहते हैं, "एचआईवी किसी के सपने देखने के अधिकार के रास्ते में नहीं आना चाहिए."

(रिपोर्ट में एचआईवी संक्रमित मरीज़ों के नाम बदल दिए गए हैं.)

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