धारा 370 पर नरेंद्र मोदी के 'नरम' होने के मायने?

  • 3 दिसंबर 2013
कश्मीर

भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने जम्मू में एक बड़ी सभा में ये कहकर एक नई बहस छेड़ दी है कि भारतीय संविधान की धारा 370 पर बहस होनी चाहिए.

यह धारा भारतीय संघ के भीतर जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देती है. मोदी ने ये कहकर अपनी पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह का समर्थन किया है.

राजनाथ ने कहा था कि संसद में इस बात पर बहस होनी चाहिए कि क्या इस धारा से भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर को फ़ायदा हुआ है और लोगों का राजनीतिक सशक्तिकरण हुआ है या नहीं.

राजनाथ ने कहा था कि अगर ऐसा नहीं हुआ है तो इस धारा को रद्द कर देना चाहिए.

रवैये में नरमी

हालांकि भाजपा हमेशा धारा 370 को पूरी तरह से हटाए जाने की वकालत करती रही है. इस संदर्भ में नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह के ताज़ा बयानों को भाजपा के कठोर रुख से हटने के तौर पर देखा जा रहा है.

Image caption कश्मीर में रैली को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी

लेकिन मोदी का ज़ोर देकर ये कहना कि संविधान के इस प्रावधान ने 'समुचित विकास और सशक्तिकरण' से जम्मू कश्मीर को वंचित रखा है, इस बात की ओर संकेत करता है कि असल में पार्टी के रवैये में ज़्यादा नरमी नहीं आई है.

नरेंद्र मोदी का कहना है कि इस धारा का इस्तेमाल सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने और नागरिक के रूप में महिलाओं को उनके हक से महरूम रखने में ढाल के तौर पर हो रहा है. इससे लगता है कि भाजपा अब भी इस धारा को लेकर सहज नहीं है.

मोदी की इस सलाह पर सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस और मुख्य विपक्षी दल पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने तीखी प्रतिक्रियाएं ज़ाहिर की हैं.

महिलाओं की नागरिकता खत्म

पीडीपी संरक्षक और पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कहा कि राज्य की संविधान सभा की मंज़ूरी के बाद धारा 370 को स्थायी दर्जा हासिल हो चुका है.

मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने मोदी को याद दिलाया, “यहां तक कि भारतीय संविधान की धारा 1, जो भारत के क्षेत्र को तय करती है, केवल धारा 370 के कारण ही जम्मू कश्मीर पर लागू होती है. बाकी देश से इस संबंध को हटा दीजिए और कश्मीर के भारत में शामिल होने और उससे जुड़े कई पहलू हमारे सामने आ खड़े होंगे."

Image caption नरेंद्र मोदी ने धारा 370 पर अपने बयान से पार्टी के नरम रुख के संकेत दिए हैं.

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी मोदी के उस बयान को अजीबोगरीब कहते हुए खिल्ली उड़ाई है जिसमें उन्होंने कहा कि धारा 370 के कारण ही जम्मू कश्मीर की वे महिलाएं अपना मूल निवासी होने का अधिकार खो देती हैं, जो राज्य से बाहर के लोगों से शादी करती हैं.

अब्दुल्ला ने मोदी की जम्मू में रैली के ठीक बाद ट्विटर पर प्रतिक्रिया में लिखा कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार 'या तो जान-बूझकर झूठ बोल रहे हैं या उन्हें कुछ भी नहीं पता.'

उन्होंने आगे ट्वीट किया, "इस मुद्दे पर प्रचार चाहे जो हो लेकिन जम्मू कश्मीर की औरतों के राज्य के बाहर के लोगों से शादी करने पर उनके मूल निवासी होने के अधिकार पर किसी तरह की आंच नहीं आती."

पूर्ण एकीकरण में बाधा

जम्मू-कश्मीर की सीपीएम इकाई के महासचिव और राज्य की विधानसभा के सदस्य एमवाई तरीगमामी ने कहा, "इस बारे में हमारी राय अटल है कि संविधान की धारा 370 को संघ और राज्य के बीच एक पुल का काम करना चाहिए और राज्य से संबंधित वे प्रावधान जो समय-समय पर ख़त्म कर दिए गए, उन्हें बिना किसी देरी के बहाल किया जाए."

अब 'धारा 370 पर बहस' को लेकर मोदी के सुझाव पर प्रतिक्रियाएं जो भी हों, तथ्य तो ये है कि भाजपा इस प्रावधान को रद्द करने के लिए आवाज़ उठाती रही है क्योंकि भाजपा जम्मू कश्मीर के पूर्ण एकीकरण में इसे एक बड़ी बाधा के रूप में देखती है.

यदि इतिहास के पन्ने पलटे जाएं तो हम पाएंगे कि भाजपा का यह रुख 50 के दशक की शुरुआत से ही रहा है. तब भाजपा 'भारतीय जन संघ' के नाम से जानी जाती थी.

विरोध का इतिहास

'भारतीय जन संघ' के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 के खिलाफ लड़ाई लड़ने का बीड़ा उठाया था. मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जन संघ की स्थापना की थी, जिसका नाम 1980 में बदल कर भारतीय जनता पार्टी रख दिया गया था.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस संवैधानिक प्रावधान के पूरी तरह ख़िलाफ़ थे. उन्होंने कहा था कि इससे भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट रहा है. यही नहीं, मुखर्जी का ये भी मानना था कि यह धारा शेख अब्दुल्ला के 'तीन राष्ट्रों के सिद्धांत' को लागू करने की एक योजना है.

मुखर्जी 1953 में भारत प्रशासित कश्मीर के दौरे पर गए थे. वहां तब ये क़ानून लागू था कि भारतीय नागरिक जम्मू कश्मीर में नहीं बस सकते और वहां उन्हें अपने साथ पहचान पत्र रखना ज़रूरी था.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तब इस क़ानून के खिलाफ भूख हड़ताल की थी. वे जम्मू-कश्मीर जाकर अपनी लड़ाई जारी रखना चाहते थे लेकिन उन्हें जम्मू-कश्मीर के भीतर घुसने नहीं दिया गया. वे गिरफ्तार कर लिए गए थे.

23 जून 1953 को हिरासत के दौरान उनकी मौत हो गई. पहचान पत्र के प्रावधान को बाद में रद्द कर दिया गया.

अलगाववादी मानसिकता

Image caption भारतीय संविधान की धारा 370 भारत प्रशासित जम्मू और कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देती है.

तब से अब तक भाजपा ने धारा 370 का लगातार विरोध किया है और इसको निरस्त किए जाने की मांग पर अटल रही है.

भाजपा का मानना है कि भारतीय संविधान के इस प्रावधान ने घाटी के लोगों के बीच अलगाववादी मानसिकता को मज़बूत किया है.

हालांकि यह बेहद दिलचस्प है कि एक ओर तो भाजपा अलग-अलग अवसरों पर इस मसले को उछालती रही है, ख़ासकर चुनाव के दौरान.

दूसरी ओर उसने इस मुद्दे पर साल 1998 से 1999 और फिर 1999 से 2004 के बीच अपने शासन के दौरान चुप्पी साधे रखी.

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