ज़किया जाफ़री की याचिका पर फैसला 26 तक टला

नरेन्द्र मोदी

अहमदाबाद की एक अदालत गुजरात दंगों में मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफ़री की विधवा ज़किया जाफ़री की याचिका पर फ़ैसला 26 दिसंबर को सुनाएगी.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित विशेष जाँच टीम (एसआईटी) ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट देते हुए क्लोज़र रिपोर्ट सौंपी थी.

ज़किया जाफ़री ने इसे अदालत में चुनौती दी थी.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट बीजे गणत्र की अदालत में पाँच महीने तक दोनों पक्षों के बीच चली बहस के बाद अदालत ने 28 अक्टूबर को इस मामले पर फ़ैसला दो दिसंबर तक के लिए टाल दिया था.

याचिका

Image caption ज़किया जाफ़री कई सालों से इस मामले में क़ानूनी लड़ाई लड़ रही हैं.

आठ फरवरी 2012 को एसआईटी ने क्लोज़र रिपोर्ट सौंपी थी जिसके ख़िलाफ़ ज़किया जाफ़री ने इस साल 15 अप्रैल में याचिका दायर की थी.

इस याचिका में उन्होंने एसआईटी की रिपोर्ट ख़ारिज करने और मोदी और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाख़िल करने की मांग की थी.

एसआईटी के वकील आरएस जमुआर ने अपनी दलील में क्लोज़र रिपोर्ट का बचाव और ज़किया जाफ़री की याचिका को ख़ारिज किए जाने की मांग करते हुए कहा था कि जाँच के दौरान ज़किया जाफ़री के आरोपों के पक्ष में कोई प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य सबूत नहीं मिला.

इस नरसंहार की जाँच एसआईटी अलग से कर ही रही थी लेकिन ज़किया जाफ़री ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर अनुरोध किया था कि इस हत्याकांड के लिए मोदी सहित 62 लोगों के ख़िलाफ़ नामजद रिपोर्ट दर्ज की जाए और उनकी भूमिका की जाँच की जाए.

क्या है मामला?

गुलबर्ग सोसाइटी दंगों में मारे गए एहसान जाफ़री की पत्नी ज़किया जाफ़री ने आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और 62 अन्य लोगों ने गुजरात में हुई हिंसा को बढ़ावा दिया.

गुजरात में साल 2002 के दंगों में 1,000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग में हिंदुओं के मारे जाने के बाद गुजरात में दंगे भड़के थे.

इन दंगों पर एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दी गई थी और कहा गया था कि उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं थे.

हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट पर एक स्वतंत्र राय लेने के लिए वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन को अदालत की सहायता के लिए नियुक्त किया था.

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