भोपाल: अभी लड़ाई जारी है, सही लड़ाई जारी है

भोपाल गैस त्रासदी

एक शब्द है 'इंसाफ़' जो पिछले 29 बरस से भोपाल की फिज़ां में एक अनसुनी फ़रियाद की तरह लगातार गूंजता रहता है.

उखड़ती सांसों, लड़खड़ाते कदमों और थक चुकी ज़ुबानों वाली भीड़ में इंसाफ़ की यह गूंज थक-हारकर कुछ देर में गुम हो जाती है, अगले किसी दिन फिर जमा होकर इंसाफ़ मांगने के इरादे के साथ.

अगली बार जमा हुए भोपाल के गैस पीड़ितों की भीड़ में से 'इंसाफ़' मांगने वालों में कुछ चेहरे, कुछ आवाज़ें भी गुम हो जाती हैं. फिर भी आवाज़ें 'इंसाफ़' मांगती हैं– 'वी वॉन्ट जस्टिस.'

सोचता हूं तो लगता है कितना बेमतलब हो चुका है इन सारे शब्दों का मतलब. किसको फ़ुरसत है कि जो एक नज़र इन बदनसीब लोगों की हालत पर डाले और सोचे इनके साथ वाकई इंसाफ़ होना चाहिए. कोई नहीं सोचता.

ख़ासकर हुकमरान तो बिल्कुल ही नहीं सोचते. सोचते तो भोपाल में 1984 की त्रासदी नहीं होती. वो न होता जो 2 और 3 दिसंबर हो हुआ. गैस कांड नहीं होता. सुनील विश्वकर्मा और शहज़ाद नहीं मरते. रुख़्साना बी और राबिया बेगम नहीं मरते. कितने नाम लूं?

नाम लेते-लेते ख़ुद भी एक नाम भर रह जाऊंगा. आख़िर मुझमें भी कितनी जान बची है. मैं भी तो उन लाखों भोपालियों में से एक हूं, जो 'उस रात' मौत के शिकंजे में आकर भी भाग निकले थे.

चाहा तो बहुत था कि यह रात कभी न आए. पत्रकार हूं और बदनसीबी से जान चुका था कि किसी दिन ऐसी रात होगी.

'गिनती और शिनाख़्त'

अपने एक दोस्त मोहम्मद अशरफ़ को इसी कारख़ाने में मरते देख चुका था दिसंबर 1981 में. उसे भी इसी यूनियन कार्बाईड की ज़हरीली गैस खा गई थी. नौकरी जो करता था वहां.

दो साल तक लगातार लिखता रहा. चेताता रहा. 'बचाइए, हुज़ूर इस शहर को बचाइए', 'ज्वालामुखी के मुहाने बैठा भोपाल' और 'न समझोगे तो आख़िर मिट ही जाओगे.'

मिट ही गया आख़िर सब कुछ. अपनी आत्मा को अमरीकी मल्टीनेशनल के पास गिरवी रख चुकी सरकार यूनियन कार्बाईड के ख़ूबसूरत गेस्टहाउस में सोती रही और 2 और 3 दिसंबर की रात भोपाल पर वह कहर नाज़िल हुआ कि उसमें जितने मरे उनकी गिनती अब तक पूरी नहीं हो पा रही. जितने बचे उनकी शिनाख़्त नहीं हो पा रही.

बीसवीं सदी के इस कहर का इस इक्कीसवीं सदी तक कोई निपटारा नहीं हो पाया है. भोपाल के हज़ारों लोगों की हत्या के ज़िम्मेदार किसी एक इंसान को अब तक सज़ा नहीं मिली है.

26 बरस बाद

कोई 26 बरस बाद 7 जून 2010 को उम्मीद की एक किरण जागी थी इंसाफ़ की. उस दिन हज़ारों गैस पीड़ित आ जुटे थे भोपाल की ज़िला अदालत के बाहर.

उस दिन उनको देखकर लगा था कि आज आख़िरी बार पूरी ताकत से आवाज़ लगा रहे हैं ‘भोपाल के क़ातिलों को फांसी दो.’

मैं भी उस दिन ख़ुद को बहला-फ़ुसलाकर इसी उम्मीद के साथ अदालत तक खींच ले गया था. पिछले कई साल से पत्रकार के पेशे के साथ ही साथ एक सच्चे भोपाली की तरह इंसाफ़ के लिए अदालतों में लड़ रहा था.

सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार और यूनियन कार्बाईड के बीच हुए एक 'नापाक' समझौते को 1989 में चुनौती दी थी. इस समझौते के मुताबिक पांच लाख गैस पीड़ितों के लिए 47 करोड़ डॉलर के मामूली से मुवाअज़े के बदले में क्रिमिनल केस भी वापस ले लिया गया था.

मेरी उसी याचिका के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने मुआवज़े को बरक़रार रखते हुए बंद हो चुके ख़ूनी यूनियन कार्बाईड के ख़िलाफ क्रिमिनल केस को फिर से जीवित किया.

आज, मतलब उस 7 जून 2010 को, उसी कोशिश का नतीजा भोपाल की ज़िला अदालत में निकलना था. अदालत पहुंचा तो देखा वह सारी जगह पुलिस छावनी बनी हुई थी. नारे लगाते गैस पीड़ित बाहर और गुनहगार बाइज़्ज़त अंदर थे. अदालत का हुकुम था कि फ़ैसले के वक़्त सिर्फ ‘अभियुक्त’ अदालत के अंदर और फ़रियादी अदालत के बाहर रहेंगे.

दो साल की सज़ा

मुझे यह फ़ैसला मंज़ूर न था. मैंने बहुत कोशिश की कि मैं एक पत्रकार न सही, एक याचिकाकर्ता के नाते ही फ़ैसले के वक़्त अदालत में हाज़िर रह सकूं, मगर 'अभियुक्तों' के लिए ठंडे पानी की बोतलें अंदर तक पहुंचाने में व्यस्त पुलिस और ज़िला अधिकारियों ने कोई भी तर्क सुनने से इनकार कर दिया. बोले अदालत का ऐसा ही आदेश है.

जब बात ज़ब्त से बाहर हो गई तो ज़बरदस्ती अंदर जाने की कोशिश करने के सिवाय कोई चारा न बचा. कोशिश की, नाकाम रहा. पुलिस कामयाब हुई. मेरे हाथ-पैरों पर पुलिस की ताकत के निशान बाकी रह गए. उसी के साथ मैं भी बाहर ही रह गया.

बस दूर से देखा कि अदालत ने इतने हज़ारों लोगों की हत्या के अभियुक्तों को कुल जमा दो-दो साल की सज़ा सुनाई. सज़ा सुनाकर वहीं ज़मानत देकर बाइज़्ज़त छोड़ दिया. पुलिस उनको हताश गैस पीड़ितों के बीच से ज़ोर आज़माई करते हुए उनकी बड़ी-बड़ी चमकदार गाड़ियों में बिठाकर सलाम ठोक रही थी. हम सब, बस देख रहे थे.

चार बरस के ऊपर हुए जाते हैं. इन चार बरसों में 2010 के नाजायज़ फैसले से आंदोलित पूरे देश की जनता को ख़ामोश करने एक बार फिर सरकार ने तमाशा किया. एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय में कार्बाईड के ख़िलाफ़ नए सिरे से कार्यवाही का अधकचरा केस पेश किया.

नतीजा, बेनतीजा रहा. गैस पीड़ित न जाने क्यों मरते-मरते भी अब तक इंसाफ़ की आस में लड़ते जाते हैं. भोपाल की अदालत में फिर कुछ केस पेंडिंग हैं. अमरीका में फिर कुछ केस लगे हैं. फिर एक बार बरसी आ गई है. फिर मशाल जुलूस निकल रहे हैं.

अन्याय के इस दौर में भी न्याय की पुकार आज भी लग रही है. 'इंसाफ़-इंसाफ़'- 'वी वॉन्ट जस्टिस'.

कवि पहले ही कह चुका है, 'अभी लड़ाई जारी है, सही लड़ाई जारी है.'

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