क्या वाकई दिल्ली से तय होगा देश?

  • 4 दिसंबर 2013
दिल्ली
Image caption दिल्ली के विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नज़रें हैं.

दिल्ली की सड़कों पर आज ट्रैफिक बहुत कम है और पुलिस के जांच नाके बहुत सारे. वोट डालने की छुट्टी है जबकि पूरा मुल्क़़ देख रहा है कि दिल्ली का ऊंट किस तरफ करवट बैठता है क्योंकि करवट इस बार तीन तरफ ली जा सकती हैं.

कई ऐसे कयास हैं कि दिल्ली आगामी आम चुनावों का एक बड़ा इंडीकेटर साबित होगा.

अब जब दिल्ली के विधानसभा चुनाव पर देश दांव पर लगा हुआ है तो क्या दिल्ली की जनता वैसे ही वोट डालने निकलेगी जैसा कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुआ.

स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा अपनी एक कविता में कहते हैं, “तीसरा रास्ता भी है - मगर वह/ मगध, / अवंती/ कोसल/ या / विदर्भ/ होकर नहीं/ जाता”. हम यहां दिल्ली को भी जोड़ सकते हैं. क्योंकि लोकतंत्र देश के रास्ते राजधानी पंहुचता है. राजधानियों के ज़रिए देश नहीं.

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दिल्ली देश नहीं है. राजधानियां सत्ता की केंद्र होती हैं और इसलिए देश का प्रतीक भी. दिल्ली के पास ऐसे बहुत साधन नहीं हैं कि वह देश के दूसरे शहरों और इलाकों के लोगों का सच देख सकें. वे शहर, वे इलाके, वे लोग राजधानी की सरकारी इमारतों की फाइलों में बंद हैं.

Image caption दिल्ली में कभी भी मतदान बहुत ज़्यादा नहीं होता.

दिल्ली के बाशिंदे देश को दिल्ली हाट या अपने बेडरूम में लगे टीवी पर गणतंत्र दिवस की परेड पर देखते हैं, जो खुश और उत्सवधर्मी लगता है. सोशल मीडिया में जो शोर, जो अलार्म, जो अहमियत, जो सरोकार दिल्ली के चुनावों को लेकर है, वह शायद छत्तीसगढ़ और मिज़ोरम को लेकर नहीं. और क्योंकि सियासत दिल्ली के जरिए देश को जीतने की हो रही है, भले ही प्रतीकात्मक तौर पर, विमर्श भी वैसा ही हो रहा है, जो इस शोर में हुंकारा भरता हो.

सियासी चौपड़ पर सब के दांव

इस बार एक ऐसी पार्टी मुकाबले में है, जो संसदीय प्रणाली पर ही प्रश्नचिन्ह लगाकर मुख्यधारा में आई थी. कालांतर में वे चुनावी राजनीति का हिस्सा बन गए. और जिन बुज़ुर्गवार के अभ्यस्त अनशनों की बदौलत पिछले एक साल में वह सियासी चौपड़ पर आ पसरी है, वे अन्ना हजारे इस वक़्त दिल्ली से बहुत दूर रालेगणसिद्धी मेंबहुत उदासीन मुद्रा में बैठे हैं. दिल्ली में इस पार्टी के आने से देश का भ्रष्टाचार कैसे कम होगा, इस बारे में भी कोई साफ़ जवाब नहीं है. हालांकि उनका अपना सर्वेक्षण उन्हें ही सिकंदर बता रहा है.

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दूसरी पार्टी है जो अपना स्थानीय योगदान इस बात को लेकर भुनाने की कोशिश में है कि दिल्ली से पोलियो दूर करवा लिया. वह कह रही है कि जो ईंधन दिल्ली के लोगों के लिए पहले से सस्ता है, उसे और सस्ता करवा देंगे. वैलेंटाइन डे पर सार्वजनिक स्थानों से नौजवान जोड़ों को खदेड़ने वाले और उन्हें कान पकड़वाकर उट्ठक-बैठक करवाने वाले लोग कह रहे हैं कि वे दिल्ली की औरतों को सुरक्षा मुहैया करवाएंगे. दिल्ली सुन रही है कि अगर नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाना है, तो दिल्ली का नैतिक दायित्व है कि भारतीय जनता पार्टी के हाथों दिल्ली की विधानसभा सौंप दें.

तीसरी पार्टी पिछले तीन कार्यकालों में दिल्ली को जीतती रही है. पंद्रह साल बहुत होते हैं ख़ुद की काबिलियत या निकम्मापन साबित करने के लिए. पर वह जो श्रेय लेना चाहती है, वह न तो शोर में सुनाई पड़ रहा और न ही दिल्ली देख पा रही है कि उसका विकास गुजरात के विकास से कितना कम-ज़्यादा है.

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Image caption अन्ना हजारे ने 2011 में दिल्ली में लोकपाल बिल की मांग को लेकर अनशन किया था.

योजना आयोग के मुताबिक देश की 21.9 फीसदी आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे रहती है, जबकि दिल्ली में ऐसे लोगों की तादाद महज़ 9.91 फीसदी है. ग़रीबी के बारे में जिन 25 राज्यों की फ़ेहरिस्त योजना आयोग ने दी है, उनमें दिल्ली 11वां है. अगर हम भारत बनाम इंडिया के नज़रिये से देखें तो साफ दिखता है कि दिल्ली किस तरफ है.

मेरी तरह के लोग जो उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद से दिल्ली आते हैं, इस फर्क को रोज़ देखते हैं. चाहे ट्रैफिक लाइट्स पर भिखारियों की संख्या हो या फ्लाई ओवर और चौड़ी चमचमाती सड़कों की या फिर ट्रैफिक बंदोबस्त की. नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के मुताबिक 2010 में दिल्ली में हर एक लाख की आबादी के लिए 407 पुलिस कर्मी हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में सिर्फ 72. भले ही इनमें से बहुतेरे वीआईपी सिक्योरिटी की ड्यूटी बजा रहे होते हैं.

दिल्ली भारत के उस मध्य वर्ग की नुमाइंदगी करती है, जिसे वेलफ़ेयर स्टेट की तमाम सुविधाएं (दूध, ईंधन, छत, सब्जी, फल, पानी, बिजली) सबसे जल्दी, सबसे सुलभ और शायद सबसे सस्ती भी मिलती हैं. और दिल्लीवासी इस सबको तयशुदा मानते हैं. किसी दूसरे शहर के लोगों से यह पूछें तो वे तिलमिला सकते हैं. मुंबई से दिल्ली आने वाले कई लोग पूछते हैं कि एयरपोर्ट पर उतरते ही लगता है कि देश में सबसे ज़्यादा टैक्स तो मुंबई से आता है. फिर दिल्ली का एयरपोर्ट इतना आलीशान क्यों?

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