महिला सशक्तिकरण से नई हिंसा: अरुंधति रॉय

तहलका के संस्थापक संपादक तरुण तेजपाल पर उनकी एक युवा महिला सहयोगी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया. इसके बाद गोवा पुलिस ने तरुण तेजपाल के ख़िलाफ़ बलात्कार का मामला दर्ज करके जांच शुरु कर दी है.

तरुण तेजपाल फ़िलहाल गोवा पुलिस की हिरासत में हैं और उनसे पूछताछ का सिलसिला जारी है. आरोप लगते रहे हैं कि तेजपाल मामले में मीडिया ट्रायल भी शुरू हो गया.

इस पूरे मामले पर तरुण तेजपाल की क़रीबी और जानी-मानी लेखिका अरुंधति रॉय ने बीबीसी संवाददाता संजॉय मजूमदार से ख़ास बातचीत की. उस बातचीत के अहम अंश-

सवाल- आप तरूण तेजपाल को जानती हैं, तहलका से परिचित हैं. तरूण पर अपने ही सहकर्मी के यौन उत्पीड़न का आरोप के बारे में सुनने के बाद आपकी प्रतिक्रिया क्या रही?

अरुंधति रॉय- बहुत बड़ा झटका लगा. मेरे ख्याल से इस मामले में जिस तरह का मीडिया उन्माद दिखा रहा है, उससे किसी को भी ना तो सोचने की जगह मिली है और ना ही वक्त. हकीकत यही है कि तरुण के ख़िलाफ़ जो आरोप हैं, वो बेहद गंभीर अपराध के आरोप हैं. आपको उस युवा महिला की हिम्मत और साहस की तारीफ़ करनी होगी जिसने अपने साथ हुई घटना का विरोध किया और उसे सामने लेकर आई, अमूमन ऐसा नहीं होता है.

(तरुण, स्टिंग, तहलका और सेक्स)

Image caption अरूंधति की पहली किताब द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स को तरुण तेजपाल ने प्रकाशित किया था.

पिछले साल दिसंबर में दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद आम लोग इन मामलों में कानून के फ़ैसले का इंतज़ार नहीं करते. मेरे ख्याल से ऐसे में मूल समस्या की ओर ध्यान ही नहीं जाता. एक ओर हम लोग यौन उत्पीड़न, शोषण और बलात्कार की बात करते हुए कहते हैं कि अब ये घटना आम हो चुकी है और कई महिलाओं को इससे गुजरना पड़ रहा है. क्या मीडिया अपने उन्मादी स्वरूप में मूल समस्या को संबोधित कर रहा है?

सवाल- महिलाओं को जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है, उस हकीकत को जिस तरह से बताया जा रहा है, उससे आप चकित हैं?

अरुंधति रॉय- एक ओर हमारा देश ऐसा है, जहां लोग सामंती, पितृसत्तात्मक अतीत में रह रहे हैं, जहां दलित महिलाओं का बलात्कार, उच्च जाति के पुरुष अपना अधिकार समझकर करते रहे. उसके बाद ये बदलाव आया कि पुरुषों के मुक़ाबलों महिलाओं की स्थिति में तेज़ी से बदलाव आया. वे कामकाजी जगहों पर अब ज़्यादा नज़र आने लगी हैं. वे सशक्त हो रही हैं, उनका पहनावा, उनका नजरिया, उनकी सोच और चाहत, उनके हाव भाव और अंदाज़ सब बदल रहे हैं. इन सबने महिलाओं के प्रति एक नई तरह की हिंसा को जन्म दिया. इसके बाद आप देखते हैं कि मणिपुर, कश्मीर और छत्तीसगढ़ जैसे सैन्य इलाकों में महिलाओं के साथ हिंसा की घटनाएं होती है.

लेकिन हम देखते हैं तरुण तेजपाल और उनकी युवा महिला सहकर्मी वाले मामले में जो लोग काफ़ी आक्रोश दिखा रहे हैं वह महिलाओं के ख़िलाफ़ व्यवस्थित ढंग से चले रहे अत्याचार पर अपना आक्रोश नहीं दिखाते.

(तरुण तेजपाल के सामने कानूनी चुनौती)

महिलाएं बलात्कार की कानूनी परिभाषा के दायरे को बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रही हैं और मेरे ख़्याल से ये संघर्ष अभी जारी है.

इसमें बारीकियां शामिल हैं- कुछ बातें बहुत अच्छी हैं तो कुछ बेहद कठोर भी हैं. कानून को विस्तार देने और सज़ा को सनक की हद तक बढ़ाने से कुछ हार्ई प्रोफ़ाइल मामलों में फांसी पर लटकाने की मांग करने वाली भीड़ सामने आ जाएगी, लेकिन इससे मूल समस्या का हल नहीं होगा.

सवाल- आप उस ओर इशारा कर रही हैं कि कानून पूरी तरह से अपना काम नहीं करता?

अरूंधति रॉय- कुछ हद तक. इस समस्या के हल का तरीका संस्थागत हो सकता है, वह क्रूर और अश्लील नहीं हो सकता. हर किसी को फ़ांसी की सजा नहीं दी जा सकती, हर किसी को उम्र कैद नहीं दी जा सकती और ना इस बात की इजाज़त दी जा सकती है कि लोगों की नजरें हर पल किसी का पीछा करती रहे. हमें अपनी प्रतिक्रिया को जांचने की ज़रूरत है, थोड़े संयम के साथ इस पर सोचने की जरूरत है.

(अब क्या होगा तरुण तेजपाल की तहलका का?)

सवाल- आपको क्या लगता है कि पीड़िता को न्याय दिलाते हुए यह संभव है?

अरुंधति रॉय- अगर हम इन व्यवस्थाओं को सही ढंग से लागू कर पाए तो पीड़िता को अपने फ़ैसले लेने में काफी मदद मिलेगी, मसलन वह अदालत का रास्ता चुने या कोई दूसरा रास्ता. समाज में व्यवस्थाएं मौजूद हैं, बस उन्हें कहीं ज्यादा सभ्य और तर्कसंगत बनाने की जरूरत है.

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