सांप्रदायिक हिंसा विधेयक पर बढ़ी तकरार

मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी

गुरुवार को संसद के शीतकालीन सत्र के शुरू होते ही राजनीतिक घमासान भी शुरू हो गया. केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा है कि सरकार इसी सत्र में सांप्रदायिक हिंसा विधेयक संसद में लाएगी. लेकिन अभी से विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसका विरोध करना शुरु कर दिया है.

भारतीय जनता पार्टी, भाजपा, के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को ख़त लिख कर इस विधेयक का विरोध किया है.

मोदी ने ट्विटर पर प्रधान मंत्री को लिखे पत्र के बारे में लिखा है और कहा कि प्रस्तावित सांप्रदायिक हिंसा विधेयक 'तबाही का नुस्खा' है.

'तबाही का नुस्खा'

मोदी ने लिखा है, "सांप्रदायिक हिंसा विधेयक (संसद में पेश करने) का समय संदिग्ध है. इसे असली चिंताओं की बजाय राजनीतिक कारणों और वोटबैंक की राजनीति की वजह से लाया जा रहा है. ये विधेयक भारत के संघीय ढांचे का उल्लंघन करता है. केंद्र उन मुद्दों पर क़ानून बना रहा है जो राज्य सूची में हैं."

मोदी ने आगे ट्वीट किया है, "अगर ये क़ानून बना तो इससे समाज में दरार आ जाएगी और हिंसा बढ़ेगी. मैंने प्रधान मंत्री से कहा है कि वे इस विधेयक पर आगे बढ़ने से पहले राज्यों और विभिन्न संबंधित लोगों और संस्थाओं से व्यापक विचार विमर्श करें."

जवाब में प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने शीतकालीन सत्र की शुरुआत में कहा कि सरकार की कोशिश वैधानिक महत्व वाले सभी मुद्दों पर व्यापक सहमति बनाने की होगी. उन्होंने कहा कि संसद में विधेयकों को पारित करवाने में सरकार सभी वर्गों का सहयोग चाहती है.

विरोध

सिर्फ़ भाजपा ही नहीं बल्कि कई और राजनीतिक दल भी इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक तमिलनाडु की मुख्य मंत्री जे जयललिता ने कहा है कि विधेयक के कई प्रावधान राज्यों के मुद्दों में दखल देते हैं.

वहीं समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने इस विधेयक पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा, "इस समय ऐसे विधेयक के आने की कोई संभावना नहीं है. इस वक्त कोई विवादित बिल नहीं आएगा." पार्टी ने चेतावनी दी है कि अगर संसद में महिला आरक्षण जैसे विवादित विधेयक लाए गए, तो वो संसद की कार्यवाही में खलल डालेगी.

उधर बहुजन समाज पार्टी और बीजू जनता दल ने विधेयक पर सहमति बनाने की बात कही है.

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य मंत्री मायावती ने कहा है कि ये विधेयक केंद्र को बहुत ज़्यादा नियंत्रण देता है.

मायावती ने कहा, "पहले सांप्रदायिक हिंसा विधेयक पर सहमति बनाई जाए और फिर इसे संसद में लाया जाना चाहिए."

बीजू जनता दल के बैजयंत पांडा का कहना था, "ऐसे विधेयक को संसद में लाने से पहले इन मुद्दों पर सहमति बनाने के लिए बहुत कोशिशें करनी चाहिए."

सहमति की ज़रूरत

लेकिन सीपीआई और जनता दल यूनाइटेड ने विधेयक का समर्थन किया है.

सीपीआई ने गुरुदास दासगुप्ता ने कहा, "हम सांप्रदायिक हिंसा विधेयक का ज़रूर समर्थन करेंगे. लेकिन हम इसमें कुछ बदलावों की मांग भी करेंगे."

विधेयक को इसी सत्र में लाने की हिमायती जनता दल यूनाइटेड ने नरेंद्र मोदी के इस विधेयक के विरोध पर तीखी टिप्पणी की है.

जदयू के नेता केसी त्यागी ने कहा, "मोदी के इस विधेयक का विरोध करने के साफ़ कारण हैं. गुजरात सरकार गोधरा में हुए नरसंहार के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार है. तो मोदी का (विधेयक) का विरोध करना स्वाभाविक है."

केसी त्यागी ने ये भी कहा कि उनकी पार्टी चाहती है कि , "इस विधेयक पर बहस होनी चाहिए लेकिन हम उन लोगों को किसी भी तरह रियायत देने के पक्ष में नहीं हैं जो दंगों के लिए ज़िम्मेदार हैं. हमारी पार्टी चाहती है कि विधेयक इसी सत्र में आए और दंगों को रोकने के लिए कदम उठाए जाएं."

प्रस्तावित विधेयक

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक सांप्रदायिक हिंसा विधेयक का मकसद केंद्र और राज्य सरकारों और उनके अधिकारियों को सांप्रदायिक हिंसा को निष्पक्षता के साथ रोकने के लिए जिम्मेदार बनाना है.

इसमें हिंसा वाले राज्य के मुकदमे दूसरे राज्य में ट्रांसफर करने और गवाहों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने का भी प्रस्ताव है.

विधेयक के प्रस्ताव के मुताबिक धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को निशाना बनाकर की गई हिंसा को रोकने और नियंत्रित करने के लिए निष्पक्ष और भेदभावरहित ढंग से अधिकारों का इस्तेमाल करना केंद्र, राज्य सरकारों और उनके अधिकारियों की ड्यूटी का अनिवार्य हिस्सा होगा.

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