2014 में सरकार इन 5 रास्तों से रख सकती है आप पर नज़र

  • 11 दिसंबर 2013
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एनएसए, प्रिज़्म, स्नोडेन, गुजरात और अमित शाह के टैप, भारत का सेंट्रल मॉनिटरिंग सिस्टम ख़बरों में रहे हैं. इस साल पूरी दुनिया में सरकारी-जासूसी का मामला छाया रहा.

जासूसी के मामले में भारत अभी अमरीका से काफी पीछे है लेकिन उसकी कोशिश है कि साल 2014 तक वो अमरीका की बराबरी कर सके.

भारत में आने वाले साल में इन पाँच इलेक्ट्रॉनिक तरीकों से आप की जासूसी की जा सकती है.

कॉल डाटा रिकॉर्ड

यह सबसे आसान तरीका है जिससे सरकार आपकी जासूसी कर सकती है. सरकार आपको सेवा देने वाली टेलीकॉम कंपनी से आपकी कॉल रिकॉर्ड का ब्यौरा मांग सकती है.

इस रिकॉर्ड में इस बात का विवरण होगा कि आपने किससे बात की, कितनी बार बात की और कितनी देर तक बात की. इसके अलावा बात करने वाले बातचीत के वक़्त किस जगह पर मौजूद थे.

आयकर विभाग और पुलिस विभाग जैसी भारत की दर्जनों संस्थाएँ इस तरह के डाटा प्राप्त कर सकती हैं.

हो सकता है कि आपको इससे कोई दिक्कत न हो क्योंकि आपके पास "छिपाने के लिए कुछ है नहीं." आखिरकार वे आपकी बातचीत तो नहीं सुन रहे. लेकिन याद रखें कि बहुत से ऐसे लोग हैं जो ग़ैर-कानूनी कामों में लिप्त नहीं होते इसके बावजूद उनके कुछ ऐसे मामले होते हैं जिन्हें वो छिपाकर रखना चाहते हैं.

एक सरकारी अधिकारी ने कर चोरी के मामले की जाँच के लिए एक व्य़क्ति फोन रिकॉर्ड का डाटा निकलवाया लेकिन उसने उस डाटा का प्रयोग शादीशुदा महिला को फ़ोन करने और ब्लैकमेल करने के लिए किया.

मान लीजिए कि आप भारत में रहते हैं और फ़ेसबुक पर किसी पाकिस्तानी से आपकी दोस्ती हो जाती है. आप उसे एकाध बार फोन भी करते हैं. हो सकता है कि आपने उससे रोजमर्रा की बातें ही की हों लेकिन सरकारी डाटा में आपकी बात कुछ इस तरह दर्ज होगी कि, 'पाकिस्तानी नंबर पर नियमित कॉल.' अगर वो आपकी बातचीत को सुन रहे होते तो समझ जाते कि आपकी बातें हानिकारक नहीं है लेकिन चूँकि वो सुन नहीं रहे इसलिए वो सबसे बुरे परिणाम का अनुमान लगाएँगे.

ऐसे में आप क्या कर सकते हैं ? आईएसडी बातचीत के लिए स्काइप जैसी इंटरनेट सेवा का प्रयोग करें. इसकी निगरानी करना काफी मुश्किल है और यह सस्ती भी पड़ती है.

सोशल मीडिया प्रोफाइल की जासूसी

किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाना हो तो यह करना तुलनात्मक रूप से आसान है. लेकिन इसमें एक दिक्कत है कि इसके लिए बहुत बड़ी संख्या में लोगों की प्रोफाइल तैयार करनी होगी.

इस मामले में आम नागरिकों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उनकी प्रोफाइल पर दी गई जानकारी न केवल सरकारी संस्थाओं के लिए बल्कि किसी के लिए उपलब्ध होती है.

आप सोशल मीडिया पर जो कहते या करते हैं उससे आपकी एक स्पष्ट छवि पता चलती है. पासवर्ड तोड़ने वाले अक्सर आपके सोशल मीडिया पर दी गई हर जानकारी, जैसे आपकी बिल्ली का नाम, आपके बेटे का नाम, आपका पसंदीदा गाना या कवि से ही आपके पासवर्ड का अंदाज लगाते हैं.

ज़्यादातर लोग अपने रुचि की चीजों या विषयों के आधार पर ही अपना पासवर्ड बनाते हैं और आपकी रुचि आपके सोशल मीडिया से साफ झलकती है. सबसे ख़ास बात यह है कि ज़्यादातर लोग इंटरनेट सेवाओं के लिए अक्सर एक ही पासवर्ड का प्रयोग करते हैं.

ट्विटर, फेसबुक या इंटरनेट पर लगातार पोस्ट करने के लिए आईटी एक्ट के कुख्यात सेक्शन 66ए के तहत आपकी गिरफ़्तारी भी हो सकती है.

ऐसे में आप क्या करेंगे? निजी सूचनाओं को सोशल मीडिया पर साझा करने से बचें. अपनी फेसबुक या ऐसी ही दूसरी सेवाओं पर अपनी प्राइवेसी सेटिंग को इस प्रकार रखें कि हर कोई आपकी पोस्ट न देख सके. और ईमेल या बैंकिंग पासवर्ड के लिए अपनी करीबियों, जैसे कि बेटी या पालतू बिल्ली का नाम, रखने से बचें.

ईमेल इंटरसेप्शन

Image caption ज़्यादातर लोकप्रिय ईमेल सेवाओं के सर्वर अमरीका में हैं.

लोग इसे लेकर काफी परेशान होते हैं लेकिन भारत सरकार के लिए यह करना आसान नहीं है.

ज़्यादातर लोकप्रिय ईमेल सेवाएँ अमरीकी हैं और उनके सर्वर भारत से बाहर हैं. इसलिए ये भारत के कानून के प्रभाव के दायरे में नहीं आते.

जीमेल के माध्यम से भेजे गए आपकी किसी ईमेल को इंटरसेप्ट करना आसान नहीं है. (हालाँकि अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा संस्था एनएसए की निगरानी कार्यक्रम प्रिज़्म के तहत इन सर्वर में सीधी पहुँच है.)

इसका यह मतलब नही है कि आपके ईमेल सुरक्षित हैं. "फिशिंग"(लॉग इन, पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड एवं दूसरी जानकारियाँ प्राप्त करना) की समस्या इतनी बढ़ गई है कि ज़्यादातर भारतीय कभी न कभी अपना ईमेल, बैंकिंग या दूसरी सूचनाओं के मामले में हैकरों के शिकार बन सकते हैं.

मान लीजिए कि आपको जीमेल के ज़रिए अपने बैंक की तरफ से एक मेल मिलता है कि आपको अपने अकाउंट को प्रमाणित करने की ज़रूरत है. आप अपना लॉग इन और पासवर्ड डालते हैं और कोई इसे चुरा लेता है.

"फिशिंग" के सर्वाधिक होने के मामले में भारत का दुनिया में चौथा स्थान है. तकनीकी संस्था ईएमसी के एक सर्वेक्षण के अनुसार "फिशिंग" घोटालों के चलते भारतीय संस्थाओं को जुलाई-सितंबर, 2013 में पाँच करोड़ तीस लाख की चपत लगी है. इस दौरान पूरी दुनिया में कुल 125,212 "फिशिंग" हमलों में एक अरब सत्तर करोड़ का नुकसान हुआ है.

तो क्या सरकार इस तरीके से भी आपके ईमेल की जानकारी ले सकती है? कानूनी रूप से तो नहीं लेकिन कोई शरारती आदमी बहुत आसानी से आपके डाटा को "फिश" कर सकता है और आपके ईमेल की जानकारी ले सकता है.

सरकारी जासूसी से सबसे सुरक्षित ईमेल चरमपंथियों के होते हैं. वो अपने ईमेल के लिए इनक्रिप्शन का प्रयोग करते हैं जिसके कारण उनके ईमेल संदेश को भेद पाना आसान नहीं होता. साल 2014 में ज़्यादा से ज़्यादा लोग इस तरह के कामों में लिप्त होंगे.

फिशिंग के सबसे ज़्यादा संभावित शिकार भारत सरकार के अधिकारी हो सकते हैं. उनमें से ज़्यादातर जीमेल या हॉटमेल का प्रयोग करते हैं और उन्हें इंटरनेट सुरक्षा का प्रशिक्षण भी नहीं मिला होता.

ऑनलाइन तस्वीरें

Image caption किसी तस्वीर को ऑनलाइन पोस्ट करते समय सावधानी बरतें.

फेसबुक जैसी सोशल मीडिया साइट पर आप जो तस्वीरें अपलोड करते हैं वो सूचना का एक कीमती भंडार हैं.

बहुत से मोबाइल फोन और कैमरा तस्वीरों से जगहों के नाम टैग (लोकेशन टैगिंग) करते हैं. इसका मतलब है कि आप जो तस्वीर अपलोड करते हैं उसमें जीपीएस डाटा की बदौलत यह सूचना मौजूद रहती है कि आपने वह तस्वीर कहाँ ली है.

यह जानकारी किसी बाहरी व्यक्ति के लिए आपके या आपके बच्चे की दिन-भर की स्थिति का पता लगाने का तरीका हो सकती है.

इससे बचने के लिए सेटिंग में जाकर अपनी तस्वीरों से लोकेशन टैगिंग की सुविधा हटा देना एक अच्छा विकल्प हो सकता है.

लेकिन लोकेशन टैगिंग को हटा देने के बाद भी आपकी तस्वीर में आपसे जुड़ी बहुत सी जानकारी होती है. आपकी तस्वीरों से आपके जानने वालों की पहचान, आप जहाँ आते-जाते हैं और जो करते हैं उसका पता चलता है.

इसलिए ऑनलाइन अपनी तस्वीरें को संभलकर शेयर करें और उनके देखने के अधिकार को सीमित रखें.

फोन टैपिंग

Image caption टेलीफोन टैप करने के लिए पहले से अनुमति लेना अनिवार्य है.

लोगों के जहन में और फ़िल्मों में यह जासूसी का सबसे आसान लोकप्रिय तरीका है.

यह सबसे मुश्किल भी है. जिन संस्थाओं के पास फोन टैपिंग का अधिकार है उन्हें इसके पहले अपने प्रमुख से इसकी अनुमति लेनी होती है और बताना होता है कि वो किसका फोन टैप करना चाहते हैं और ऐसा करना क्यों ज़रूरी है. इसके बाद संस्था प्रमुख इंडियन टेलीग्राफ़ एक्ट के तहत गृह सचिव से इसके लिए अनुमति लेते हैं.

कॉल डाटा रिकॉर्ड के उलट किसी का फोन टैप करने के लिए पहले से अनुमति लेना अनिवार्य है. फोन टैप करने के बाद अनुमति नहीं ली जा सकती. इसके लिए पूर्व-तैयारी और समय की ज़रूरत होती है. फोन सुनने के लिए अतिरिक्त आदमियों की भी ज़रूरत होती है.

अमरीका में एनएसए फोन कॉल की निगरानी करने के लिए तकनीक का व्यापक प्रयोग करती है. ख़बरों के अनुसार एनएसए हर फोन कॉल को रिकॉर्ड करती है और फिर बातचीत के विषय और ख़ास शब्दों के मद्देनज़र इन फोन कॉल में से नमूने के तौर पर या कुछ ख़ास कॉल को चुनकर उन्हें स्कैन करती है. फोन कॉल को रिकॉर्ड करने से भविष्य में भी उसकी पड़ताल करने में सुविधा रहती है.

भारत ने भी एक भारी तकनीकी निगरानी कार्यक्रम सीएमएस (सेंट्रलाइज़्ड मानिटरिंग सिस्टम) शुरू किया है. इसके तहत हर नागरिक के फोन और इंटरनेट का डाटा एकत्रित किया जाना है.

यह कैसे काम करेगा यह स्पष्ट नहीं है लेकिन यह तो साफ़ है कि इसके माध्यम से चरमपंथियों और अपराधियों से ज़्यादा आम नागरिकों से जुड़ा डाटा एकत्रित किया जाएगा.

और अगर आप संवाद के लिए किसी भी तरह के इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से संवाद कर रहे हैं तो आप इस तरह की जासूसी का निशाना बन सकते हैं.

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