क्षेत्रीय क्षत्रपों के सामने कितने असरदार रहेंगे मोदी?

  • 8 दिसंबर 2013

नरेंद्र मोदी फ़ैक्टर

नरेंद्र मोदी

पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी का उम्मीदवार घोषित किया था.

इसलिए ये सवाल सियासी समझ रखने वाले बहुत से लोग पूछ रहे हैं कि विधानसभा चुनावों में अगर भाजपा बेहतर प्रदर्शन करती है तो इसका सेहरा किसके सिर पर बाँधा जाएगा.

क्या भाजपा के क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी जीत का श्रेय मोदी के साथ बाँट सकेंगे? विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मुद्दों के बीच मतदाताओं ने किसे तरजीह दी.

क्या सत्ता विरोधी रुझान जैसी कोई भी स्थिति थी और मतदाता विपक्ष के नेताओं के प्रति क्या सोचते थे.

छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में हुई विशाल जनसभाओं को लेकर जनता के बीच क्या रुझान रहा और क्या सचमुच इन चुनावों में नरेंद्र मोदी फैक्टर जैसी कोई चीज थी भी या नहीं.

बीबीसी ने इन सवालों से जुड़े कई पहलुओं की पड़ताल करने की कोशिश की है.

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छत्तीसगढ़

सलमान रावी, बीबीसी संवाददाता

विधानसभा चुनावों में अगर नरेंद्र मोदी का फैक्टर नहीं होता तो शायद भाजपा के लिए छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने की डगर बेहद कठिन होती.

हलांकि रमण सिंह की व्यक्तिगत छवि अच्छी मानी जाती रही है. उनके दो कार्यकालों में शुरू की गई योजनाओं को भी सराहा गया है.

लेकिन उनके मंत्रिमंडल के कुछ एक मंत्रियों, संसदीय सचिवों और कुछ विधायकों के खिलाफ 'एंटी-इनकम्बेंसी फैक्टर' या सत्ता विरोधी रुझान भी बहुत जोर पकड़ रहा था.

खास तौर पर बस्तर से आने वाले मंत्रियों पर आरोप रहे कि चुनाव जीतने के बाद से उन्होंने अपने विधान सभा क्षेत्र की तरफ ध्यान नहीं दिया.

बस्तर में 12 विधान सभा की सीटें हैं जिनमे से 11 भाजपा की झोली में थीं. सिर्फ एक कोंटा की सीट पर कांग्रेस का क़ब्ज़ा था.

इस बार बस्तर में भाजपा के पास पाने के लिए कुछ भी नहीं जबकि गंवाने के लिए बहुत कुछ है.

लेकिन इन सब के बावजूद रमण सिंह की व्यक्तिगत छवि ने भाजपा की जाती हुई शाख को बचाए रखने में मदद की.

अगर ऐसा नहीं होता तो भाजपा को इस बार चुनावी वैतरिणी पार लगाना वाकई मुश्किल हो जाता.

हलांकि कांग्रेस को उम्मीद थी कि दर्भा घाटी में हुए माओवादी हमले में उनके शीर्ष नेताओं की मौत से उन्हें सुहानुभूति मिलेगी और सरकार बनाने का रास्ता उनके लिए साफ़ हो जाएगा लेकिन पार्टी छत्तीसगढ़ में अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी घोषित नहीं कर पाई.

ये भी भाजपा के पक्ष में ही गया.

इतना जरूर है कि मोदी की 12 से 14 जनसभाओं के बावजूद भाजपा को उतना भी फायदा नहीं हो पाएगा जितना वो सोच रहे थे.

रुझान बताते हैं कि इस बार भाजपा का चुनाव प्रतिशत भी पहले के मुकाबले कम ही रहा.

मध्यप्रदेश

ऋषि पांडे, स्थानीय पत्रकार

शहरी इलाकों में नरेंद्र मोदी का फैक्टर ज़रूर रहा है मगर मुझे लगता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में नरेंद्र मोदी की बजाय शिवराज सिंह चौहान का ही फैक्टर अहम रहा.

शिवराज राज्य के ग्रामीण इलाकों में खासा असर रखते हैं लेकिन पूरे राज्य की अगर बात की जाए तो मोदी से ज्यादा प्रभाव निश्चित रूप से शिवराज का ही रहा.

हालांकि नरेंद्र मोदी ने 14 से ज्यादा जनसभाओं को संबोधित किया. मतदान के आठ दस दिन शेष रह गए थे तभी से नरेंद्र मोदी की जनसभाओं का तांता लगा रहा.

मोदी सागर, शहडोल जैसे छोटे शहरों के अलावा लगभग सभी बड़े शहरों में कई सभाओं को संबोधित किया. वे भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और इंदौर भी गए.

इन सभाओं में लोगों का भी अच्छा रुझान देखा गया.

एक बात और गौर करने वाली ये है कि शिवराज सिंह चौहान संसदीय राजनीति में नरेंद्र मोदी से भी वरिष्ठ हैं.

चौहान 1990 में विधायक बने और उसके बाद वो पांच बार लोक सभा के सदस्य रहे. इसके अलावा वो भाजपा के महासचिव और पार्टी के संसदीय दल के सदस्य भी रह चुके हैं.

शिवराज सिंह चौहान नरेंद्र मोदी से पहले से ही जनता के नेता के तौर पर अपनी पकड़ बना चुके थे.

साल 2008 का विधान सभा चुनाव भाजपा ने शिवराज सिंह चौहान के दम पर लड़ा था.

ये वो दौर था जब संगठन के कद्दावर नेता लाल कृष्ण आडवाणी की सभाएं मध्य प्रदेश में पूरी तरह फ्लॉप हो चुकी थीं.

अपने मुख्यमंत्री काल में शिवराज सिंह चौहान ने जिस तरह की योजनाएँ शुरू कीं उसे लोगों ने सराहा.

मुझे नहीं लगता कि शिवराज सिंह चौहान इस जीत का सेहरा किसी और के सिर पर बंधने देंगे.

दिल्ली

अदिति फडनिस, वरिष्ठ पत्रकार

नरेंद्र मोदी फैक्टर ने दिल्ली के विधानसभा चुनाव में थोड़ा बहुत रोल तो ज़रूर प्ले किया है.

लेकिन उनका असर उतना नहीं पड़ा जितना कि भाजपा को उम्मीद थी या जितना भाजपा दावा कर रही थी.

नरेंद्र मोदी की दिल्ली में कई जन सभाएं हुईं. उन्होंने दर्जन भर से ज्यादा रैलियों को संबोधित किया.

इन सब के बावजूद आम आदमी पार्टी ने दोनों पार्टियों के वोट खाए हैं. आम आदमी पार्टी ने दोनों दलों की मुश्किलें बढ़ा दीं.

दिल्ली में मोदी का असर देखने को तो मिला लेकिन वो उतना नहीं था जितना कि राजस्थान या दूसरे राज्यों में था.

राजस्थान में तो हर तरफ मोदी ही मोदी छाये हुए थे.

दिल्ली में अगर नरेंद्र मोदी का जादू चला होता तो फिर भारतीय जनता पार्टी को चुनाव में स्वीप कर जाना चाहिए.

लेकिन ऐसा होता नज़र नहीं आ रहा है क्योंकि यहाँ कांटे की टक्कर है. दिल्ली में अभी भी चीज़ें काफी अस्पष्ट हैं.

भाजपा भी बहुत ज्यादा आश्वस्त नज़र नहीं आई अपने परफार्मेंस से.

इसी लिए तो पार्टी ने कई बार अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारी है. आनन फानन में अपना मुख्यमंत्री का उम्मीदवार भी बदल डाला.

पार्टी ने इस दौरान कई ग़लतियाँ भी की हैं. ये बात है कि कांग्रेस के खिलाफ भी एंटी-इनकम्बेंसी का मुद्दा रहा है.

राजस्थान

त्रिभुवन, स्थानीय पत्रकार

राजस्थान में नरेंद्र मोदी का फैक्टर अच्छा खासा दिखाई दिया. इस बार राजस्थान के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जनसभाओं में काफी भीड़ उमड़ी.

जयपुर के पास एक जगह है डूडू जहाँ नरेंद्र मोदी की सभा में पांच हज़ार की भीड़ आई थी. इत्तेफाक से सिर्फ यही एक जगह है जहाँ इतनी कम भीड़ हुई.

मतदान से पहले के आखरी दिनों की मोदी की सभा अशोक गहलोत के सरदारपुरा के इलाके में थी और वहां भारी भीड़ उमड़ी थी.

इस सभा को लेकर ये स्पष्ट हो गया कि नरेंद्र मोदी का असर विधान सभा के चुनाव में होने वाला है.

दूसरा पहलू भाजपा के चुनाव प्रचार का तरीका भी था जो बेहद संगठित, सुनियोजित और बेहतर रहा.

वहीं कांग्रेस का चुनाव प्रचार बिखरा हुआ सा नज़र आया. कांग्रेस के सारे नेता एक साथ घूमते हुए नज़र आ रहे थे.

जब राहुल गांधी, सोनिया गांधी या प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह का दौरा रहा तो सारे कांग्रेस के नेता एक ही मंच पर नज़र आए.

जबकि वसुंधरा राजे सिंधिया और नरेंद्र मोदी अलग अलग होकर ही जनसभाओं को संबोधित कर रहे थे. भाजपा के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी अलग ही प्रचार किया.

अगर सीटवार आकलन किया जाए तो नरेंद्र मोदी को ऐसी जगहों पर भेजा गया जहाँ भाजपा चार या पांच हज़ार वोटों से कांग्रेस से हारी थी.

यानी जो हारने वाली सीटें थीं या जो कमज़ोर इलाके थे वहां पर नरेंद्र मोदी की सभाएं आयोजित की गईं.

ये भारतीय जनता पार्टी की रणनीतिक चतुराई थी जिसमे वो सफल दिखाई दे रही है.

वैसे भी राहुल गांधी की तुलना नरेंद्र मोदी ने ज्यादा जनसभाओं को संबोधित किया है. मोदी की कम से कम 15 से 20 जनसभाएं आयोजित की गईं.

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