छत्तीसगढ़ः जिन्होनें रेल नहीं देखी उनके लिए हवाई अड्डा

दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित दंतेवाड़ा में हवाई अड्डा बनाने की योजना को लेकर सवाल शुरु हो गए हैं. ये हवाई अड्डा दंतेवाड़ा शहर से लगे हुये बालूद गांव के पास बनाने की तैयारी चल रही है.

लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस हवाई अड्डे के लिए वन विभाग की लगभग 58 हेक्टेयर ज़मीन का अधिग्रहण किया जाना है. वन विभाग की इस ज़मीन पर छोटे-बड़े झाड़ के जंगल हैं जिसमें पेड़ों की गणना का काम किया जाना है.

इसके अलावा बालूद गांव के दर्जन भर लोगों की लगभग 14 हेक्टेयर कृषि भूमि के भी अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरु की गई है. लेकिन गांव के लोग इस ज़मीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं.

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विरोध में आए सामाजिक कार्यकर्ता

दंतेवाड़ा में हवाई अड्डा बनाने की ख़बर सबसे पहले दंतेवाड़ा के बालूद गांव के निवासी ललित सोरी ने सीजी नेट स्वर में साझा की थी. इसके संस्थापक पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी के अनुसार सीजीनेट स्वर पर कोई भी नागरिक मोबाइल के जरिए अपना दुख-सुख और खबरें साझा कर सकता है.

सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्ष का आरोप है कि जिस दंतेवाड़ा ज़िले की एक बड़ी आबादी ने आज तक रेलगाड़ी नहीं देखी हो वहां हवाई अड्डा मूलतः खनन कंपनियों और अर्धसैनिक बलों के लिए बनाया जा रहा है. विधानसभा चुनाव में व्यस्त राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी को इस एयरपोर्ट निर्माण की ख़बर नहीं है.

लेकिन वे छूटते ही कहते हैं कि दंतेवाड़ा में नक्सलियों की समस्या है इसलिए वहां हवाई अड्डा सुरक्षा बल के लिए बन रहा होगा. दूसरी ओर स्थानीय जनप्रतिनिधियों का दावा है कि दंतेवाड़ा के आदिवासी हवाई सेवा का इस्तेमाल करेंगे.

हालांकि ज़िले के कलेक्टर सी देवसेनापति इन दोनों ही आरोप और दावे से अलग साफ़गोई से कहते हैं कि हमारे पास राज्य सरकार का बजट आया है इसलिए हम हवाई अड्डा बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं.

हथियारबंद संघर्ष

छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा ज़िला माओवादी गतिविधियों के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील माना जाता है. पुलिस और माओवादियों के बीच पिछले कई सालों से यहां हथियारबंद संघर्ष जारी है.

माओवादियों के ख़िलाफ़ सलवा जुड़ूम अभियान के अलावा दंतेवाड़ा की चर्चा यहां के लौह अयस्क के खदानों के लिए भी होती रहती है जिसे पाने के लिए एस्सार जैसी कई राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय कंपनियां कतार में हैं. इस इलाके में हज़ारों की संख्या में अर्धसैनिक बल के जवान पिछले कई सालों से तैनात हैं.

दंतेवाड़ा के ओरछा में सेना के जवानों की ट्रेनिंग होती रहती है और सेना के बेसकैंप बनाने का काम भी जारी है. बीच-बीच में राज्य के गृहमंत्री ननकीराम कंवर दुहराते रहते हैं कि इलाके को सेना के हवाले कर देने से नक्सलियों पर काबू पाया जा सकता है.

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ऐसे में सामाजिक कार्यकर्ताओं की यह आशंका निर्मूल नहीं है कि दंतेवाड़ा में हवाई अड्डा सेना की ज़रुरत के लिए बनाया जा रहा है.

डेढ़ दशक से भी अधिक समय तक दंतेवाड़ा में रह कर वनवासी चेतना आश्रम चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार की राय है कि बड़े पैमाने पर विकास के नाम पर विभिन्न परियोजनाओं में किसानों की ज़मीन छीन कर किसानों को ग़रीबी और विस्थापन के अंधेरे कुएँ में धकेल दिया जा रहा है.

वे कहते हैं, "ये ग़लतफ़हमी न तो हमें है ना वहां के लोगों को है. ये हवाई अड्डा कोई बस्तर के आदिवासियों के लिए तो बन नहीं रही है. ये तो उन लोगों के लिए बन रहा है जो बस्तर की प्राकृतिक संसाधनों को लूटेंगे, उनसे बड़े-बड़े मुनाफ़े कमाएंगे और विदेशों में उड़ जाएंगे."

रणनीतिक इस्तेमाल

हिमांशु बताते हैं, "ये तो कारोबारी लोगों के लिए है या फिर इसका रणनीतिक इस्तेमाल है, हथियारों को, सिपाहियों को लाने-ले जाने में, जैसा कि हर जगह हो रहा है. जहां-जहां औद्योगिकरण हो रहा है, वहां-वहां अर्धसैनिक बलों की टुकड़ियां पहुंच रही हैं. हम बंदूक के दम पर अपना विकास कर रहे हैं."

"तो इसका इस्तेमाल भी हथियार और सिपाहियों के लाने-ले जाने और उद्योगपतियों के लिए किया जाएगा. ये तो बिल्कुल स्पष्ट है. बस्तर के लोगों के लिए ये हवाई अड्डा नहीं बनाया जा रहा है, ये बात बिल्कुल सच है."

बालूद गांव के ललित सोरी का आरोप है कि किसानों की ज़मीन देने के लिए उन पर दबाव बनाया जा रहा है. उनका कहना है कि गांव के लोगों के पास तो मोटरसाइकिल भी नहीं है. वे भला इस एयरपोर्ट का क्या करेंगे?

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हालांकि दंतेवाड़ा के भाजपा विधायक भीमा मंडावी हवाई अड्डा बनाए जाने के सवाल पर पलट कर पूछते हैं, "दंतेवाड़ा को दुनिया से अलग रखेंगे क्या? जनता के लिए बन रहा है, देश के लिए बन रहा है, प्रदेश के लिए बन रहा है, दंतेवाड़ा के लोग भी एयरपोर्ट से, एयरलाइफ़ से जुड़ना चाहते हैं."

भीमा मंडावी का कहना है कि आज दुनिया में हर कोई दुनिया से जुड़ना चाहता है. बस्तर की अनदेखी के कारण ही बस्तर पीछे रह गया. वे भारत सरकार की बैलाडीला खदान का उदाहरण देते हुये समझाने की कोशिश करते हैं कि इस खदान में काम करने वाले अफ़सर भी इस हवाई अड्डे का इस्तेमाल करेंगे.

'क्लियरेंस'

भीमा मंडावी कहते हैं कि आने वाले समय पर हमारे बच्चे भी इसका इस्तेमाल करेंगे.

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वे अपना उदाहरण देते हुये कहते हैं, "89-90 में जब मैं पांचवीं में पढ़ता था तब मैंने खुद कभी रेलगाड़ी नहीं देखी थी. हमारे शिक्षक पढ़ाते थे कि दस चक्के की गाड़ी है, रेलगाड़ी है तो हम लोग कल्पना में ही रहते थे. उस समय देख के पढ़े होते तो बात अलग होती. मेरी भी इच्छा थी कि मैं कलेक्टर बनूं लेकिन मौका नहीं मिला."

भीमा कहते हैं, "हमारे क्षेत्र के जो बच्चे एजुकेशन हब में पढ़ रहे हैं, वो बच्चे नहीं चाहते कि हम दुनिया से अलग कट कर रहे. हम भी हवाई जहाज़ में बैठेंगे, हम भी एयर होस्टेस बनेंगे. हम भी बैलाडीला के खदान के जीएम बनेंगे. ऐसी सोच हमारे बच्चों की है. हमारे बच्चे इस हवाई अड्डे का इस्तेमाल करेंगे."

दूसरी ओर दंतेवाड़ा के कलेक्टर के सी देवसेनापति का कहना है कि वन विभाग के 'क्लियरेंस' के कारण एयरपोर्ट के काम में विलंब हो रहा है. वे इस बात से भी इंकार करते हैं कि एयरपोर्ट बनाने के लिए किसानों की ज़मीन उनके विरोध के बाद भी अधिग्रहित की जा रही है.

दंतेवाड़ा में एयरपोर्ट की ज़रुरत पर वे कहते हैं, "ये बजट से आया है, इसलिए हम प्लान कर रहे हैं."

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