'फौज तो बड़ी लेकिन जनरल ही गायब'

  • 8 दिसंबर 2013
नरेंद्र मोदी, राहुल गाँधी

रविवार की सुबह से भारत के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने शुरू हो जाएंगे. नतीजों के आने से एक दिन पहले राजधानी दिल्ली की आबोहवा में एक अजीब सी बेचैनी महसूस की जा रही थी.

जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए हैं उनमें छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भाजपा सत्ता में है जबकि मिज़ोरम, राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस की सरकारें हैं. चुनाव बाद हुए अलग अलग सर्वेक्षणों में पांच में से चार में भाजपा की जीत के अनुमान लगाए गए हैं.

अगर परिणाम इन्हीं अनुमानों के मुताबिक आए तो कांग्रेस को अपनी सरकार वाले तीन राज्यों में से दो राज्यों में सत्ता गंवानी पड़ेगी. भाजपा जिन दो राज्यों में सत्ता में है वहां उसकी जीत के आसार तो हैं लेकिन जीत का अंतर पहले से कम होने की संभावना है.

(...वोट देने की मजबूरी)

लेकिन कई सवालों के जवाब तो नतीजे आने के बाद ही खोजे जा सकेंगे लेकिन चूंकि प्रधानमंत्री पद के लिए दो उम्मीदवारों राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी ने चुनाव अभियान में अपनी पार्टियों का नेतृत्व किया था इसलिए चुनाव परिणाम इन दोनों नेताओं के प्रदर्शन से जोड़ा जाएगा.

चुनावी रणनीति

शुरुआती दिनों की सक्रिय चुनाव अभियान के बाद राहुल गांधी अचानक मैदान से हट गए और कांग्रेस के अभियान की ज़िम्मेदारी स्थानीय नेताओं पर छोड़ दी गई. राहुल गांधी कुछ दिनों से सार्वजनिक रूप से कहीं नज़र नहीं आए हैं.

दूसरी ओर भाजपा की संभावित जीत से पार्टी में खुशी तो जरूर है लेकिन चिंता है कि अगर यह जीत स्पष्ट जीत नहीं हुई तो नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी के बारे सवाल भी पैदा करेगी. दिल्ली का सियासी माहौल फ़िलहाल थोड़ा बोझिल सा है. राजनीतिक दलों से लेकर विश्लेषक और पर्यवेक्षकों सभी एक दुविधा की स्थिति में हैं.

लेकिन चुनाव से एक बात ज़रूर उभर कर सामने आई है कि राहुल गांधी अभी तक कांग्रेस के लिए उस नेतृत्व का प्रदर्शन नहीं कर सके हैं जो कि पार्टी को चुनाव जीतने के लिए चाहिए. वे जनता पर उस तरह से असर नहीं छोड़ पाए हैं जिसकी पार्टी को जरूरत है.

'वार रूम'

कांग्रेस को इस वक्त प्रभावशाली, निर्णायक और लोगों में अपील रखने वाले नेता की जरूरत है. गांधी परिवार पर पार्टी का पूरा दारोमदार उसके लिए सियासी तौर पर मुश्किलें खड़ी कर रहा है. कांग्रेस का हाल एक ऐसी बड़ी फौज़ की तरह हो गया है कि मोर्चे पर तो खड़ी है लेकिन जिसका कोई जनरल नहीं है.

(लोग प्यासे हैं, राजनीति नहीं)

संसदीय चुनाव में अब पांच महीने से भी कम बचे हैं. कांग्रेस ने चुनावी रणनीति तैयार करने के लिए एक 'वार रूम' बना रखा है. इसमें देश के बेहतरीन दिमाग दिन रात काम कर रहे हैं. इस रणनीति की धुरी राहुल गांधी ही हैं. पार्टी यह उम्मीद कर रही है कि आने वाले दिनों में वे और अधिक प्रभावी और बदले हुए रूप में नजर आएंगे.

उधर भाजपा ने भी इसी तर्ज एक 'वार रूम' बना रखा है. मोदी न केवल एक अच्छे वक्ता हैं बल्कि वे अपना प्रचार प्रसार करने और मीडिया में बने रहने का हुनर जाते हैं. चुनाव अभियान के दौरान उनकी कई कमियां भी उजागर हुई हैं और आने वाले दिनों में उन्हें पुराने दिनों की कई बातों का हिसाब देना है.

लेकिन लंबी चुनावी लड़ाई में पहला दौर उन्हीं के नाम है. बेचैनियों, अस्पष्टता और भ्रम के बावजूद भाजपा और मोदी को फिलहाल कांग्रेस पर बढ़त बनाई हुई दिखती है.

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