दिल्ली में 'जीत' भाजपा की, पर लहर झाडू की!

  • 8 दिसंबर 2013

दिल्ली विधान सभा चुनावों के रुझानों को देखते हुए कुछ चीज़ें एक दम साफ़ हो चुकी हैं.

पहली ये कि दिल्ली के मतदाता ने पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से सत्ता में बनी हुई कांग्रेस पार्टी से मुँह मोड़ लिया.

दूसरी ये कि भारतीय जनता पार्टी ने इस मौके को बख़ूबी भुनाते हुए अपनी दावेदारी तेज़ कर दी और उसे सकारात्मक परिणाम भी मिलते दिख रहे हैं.

तीसरी और सबसे अहम बात रही है अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की एकाएक बढ़ी लोकप्रियता.

शायद ये एक ऐसा अवसर है जिसे भारतीय राजनीति में लंबे समय तक याद रखा जाएगा.

आगाज़

तक़रीबन दो वर्ष पहले दिल्ली से एक जन आंदोलन की शुरुआत हुई थी.

ये आंदोलन था भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़, जिसे नेतृत्व दिया था गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे ने.

अन्ना का आंदोलन एक जन लोकपाल विधेयक लाने के लक्ष्य का था और उनका समर्थन देने वाले लोगों में प्रमुख भूमिका निभाई थी अरविन्द केजरीवाल नाम के एक पूर्व आईआरएस अधिकारी ने.

ठीक दो साल बाद इसी केजरीवाल ने दिल्ली की राजनीति की तस्वीर बदल कर रख दी है.

ख़ुद मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को उनके चुनाव क्षेत्र में पछाड़ते हुए केजरीवाल की पार्टी दूसरी सबसे पार्टी के तौर पर उभर रही है.

हुआ क्या?

जिस प्रकार से केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की झोली में वोट गिरते दिख रहे हैं उससे कल्पना की जा सकती है कि किस तरह उम्र और मुद्दों से ऊपर उठ कर दिल्ली की जनता ने ऐसे उम्मीदवारों को वोट दिए है जिनका एक-दो वर्ष पहले तक उन्होंने नाम भी नहीं सुना था.

चुनाव के ठीक पहले दिल्ली के तमाम इलाकों का दौरा करने पर मुझे भी हैरानी हुई लोगों की शिकायतें सुन कर.

किसी को प्याज़-टमाटर के बढ़ते दामों की फ़िक्र थी और किसी को पेट्रोल-डीज़ल के दामों में हो रहे इज़ाफ़े की.

झुग्गी वाले इलाकों में गया तो कई लोगों ने पूछने की कोशिश भी की कि आपके हिसाब से 'आप' पार्टी को कितनी सीटें आएंगी?

तो मेरा भी अनुमान उभरती हुई असल तस्वीर से कम था और कई सहयोगियों का भी.

क्योंकि मौजूदा हालत तो यही लग रहे हैं कि 'आप' की झोली में कम से कम 20 सीटें तो आएंगी ही!

इन्हें देख कर साफ़ लगता है कि केजरीवाल की 'भ्रष्टाचार हटाओ' मुहिम में सिर्फ़ युवा ही नहीं हर तबके ने अपना योगदान वोट की शक्ल में दिया है.

वो अलग बात है कि भाजपा सबसे ज्यादा सीट पाने वाली पार्टी बन कर उभरे.

ताज्जुब इसलिए नहीं है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनावों में कुल मतों में भाजपा के पास 36 प्रतिशत का योगदान था.

लेकिन गौर करने वाली बात यही है कि उस समय न तो किसी जन लोकपाल बिल लाओ आंदोलन की शुरुआत हुई थी और न ही लोग अरविन्द केजरीवाल को जानते थे.

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