क्या ये मोदी लहर का स्पष्ट असर है?

मोदी

उत्तर भारत के चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में मोदी की लहर का असर साफ़ तौर पर देखा जा सकता है. यह इसी लहर का नतीजा था कि चारों राज्यों में पांच फ़ीसदी वोटिंग ज़्यादा हुई है.

यह कांग्रेस के ख़िलाफ़ कोई नकारात्मक वोट नहीं है. चारों राज्यों में पिछली बार के मुक़ाबले वोटिंग ज़्यादा हुई है. मेरा मानना है कि यह मोदी के समर्थन में एक लहर है.

जहां तक छत्तीसगढ़ का सवाल है, तो 10 साल में विपक्ष में बैठने के बाद भी आप जीत नहीं पाते हैं और एंटी इनकंबैंसी यानी सत्ता विरोधी भावना को पछाड़कर यदि भाजपा जीतती है तो उसका कोई कारण तो ज़रूर होगा.

छत्तीसगढ़ में भाजपा की वापसी के कारण हैं - एक, प्रशासन ने अच्छा काम किया है. दूसरा, भाजपा जातिवादी समीकरण को साधने में सफल रही है. तीसरा, भाजपा के साथ एक देशव्यापी लहर है जो मोदी की वजह से है.

रही दिल्ली की बात, तो मेरा मानना है कि लोकसभा में जो तस्वीर उभरेगी वो विधानसभा से एकदम अलग होगी. इस बार जो वोट आम आदमी पार्टी को मिले हैं, वे लोकसभा में नहीं मिलेंगे.

कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने इस बार आम आदमी पार्टी को वोट दिया है, लेकिन वो लोकसभा में भाजपा को वोट देंगे.

शिवराज, वसुंधरा को भी श्रेय

मध्य प्रदेश और राजस्थान की जीत का श्रेय शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे को दिया जाना चाहिए.

मध्य प्रदेश में भी अच्छा प्रशासन और जातियों के समीकरण को साधना भाजपा की सफलता का राज़ है. ये दो चीज़ें मिल जाएं तो फिर ऐसी पार्टी को हराना बहुत मुश्किल है.

निश्चित रूप से इस जीत का श्रेय मोदी से ज़्यादा शिवराज को जाता है. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पांच फ़ीसदी ज़्यादा वोटिंग चारों राज्यों में हुई है. यह लहर मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं हैं. बाहर से ऐसा कुछ हुआ है जिसने लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित किया है.

मेरा मानना है कि लोगों ने मोदी के समर्थन में वोट दिया है. मध्य प्रदेश में जीत का 75 फ़ीसदी श्रेय शिवराज को और 25 फ़ीसदी मोदी को जाता है.

राजस्थान में राजपूत पहले से ही भाजपा के साथ थे. पिछली बार भाजपा भीतरघात का शिकार हुई थी. लेकिन इस बार ऐसा नहीं था.

इस राज्य में भी भाजपा ने जातिवादी समीकरण को अच्छी तरह साधा है और पार्टी जब भी हारी है तो उसका कारण भीतरघात रहा है.

मोदी की अगली चुनौती

हर राज्य में सत्तारूढ़ दल का किसी एक जाति से नाता होता है. उदाहरण के लिए गुजरात में पटेल भाजपा के साथ रहे हैं. मोदी के मंत्रिमंडल में सबसे ज़्यादा प्रतिनिधित्व पटेलों का है.

एक जाति के साथ बाकी जातियों के समीकरण को साधने का काम कांग्रेस से ज़्यादा भाजपा ने किया है.

चार राज्य तो भाजपा के खाते में आ चुके हैं. मध्य प्रदेश और राजस्थान में पार्टी जीत चुकी है और दिल्ली और छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने की स्थिति में है.

मोदी के सामने अब चुनौती कर्नाटक में लिंगायत वोट को फिर से पार्टी से जोड़ने की होगी. दूसरी चुनौती सहयोगी दलों को जोड़ने की है.

मोदी को अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियों को साथ लाना होगा. आज की स्थिति को देखकर लग रहा है कि भाजपा अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में 170 से 180 सीटें तक ला सकती है. अब मोदी को यह देखना होगा कि वो 272 के आंकड़े तक कैसे पहुंचेंगे.

(बीबीसी संवाददाता अनुराग शर्मा के साथ बातचीत पर आधारित)

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