भाजपा तो जीत गई, लेकिन क्या मोदी भी जीते?

  • 9 दिसंबर 2013
नरेंद्र मोदी

चार राज्यों के चुनाव परिणाम पूरी तरह से कांग्रेस पार्टी के विरोध में और भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि इन नतीजों में कांग्रेस पार्टी को लेकर ग़ुस्सा साफ़ नज़र आ रहा है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि वो कौन सा प्रमुख कारण था जिसने इस ग़ुस्से को भाजपा के पक्ष में मोड़ दिया.

कई विश्लेषक इसे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की लहर से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि यह जनादेश पार्टी के क्षत्रपों के पक्ष में गया है. इन विश्लेषकों का मानना है कि मोदी इन चुनावों में कोई फैक्टर नहीं थे.

लेकिन कोई भी चुनाव परिणाम एकपक्षीय आकलन वाले नहीं होते. यहां तो चार अलग-अलग राज्यों की बात है. लिहाजा हमने कुछ वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकारों और विश्लेषकों से बात की और अलग-अलग राज्यों के चुनाव परिणाम को समझने की कोशिश की.

किन-किन राज्यों में कौन-कौन से पहलू टर्निंग प्वॉइंट साबित हुए और क्या इन टर्निंग प्वॉइंट को मोदी का जादू बदल पाया. शिवराज सिंह चौहान की जीत में मोदी की अहम भूमिका रही, तो फिर रमन सिंह को कांटे की चुनौती का सामना क्यों करना पड़ा?

एक सवाल ये भी है कि राजस्थान में वसुंधरा राजे की जीत की सबसे बड़ी वजह क्या रही? दिल्ली में अगर मोदी की लहर थी, तो अरविंद केजरीवाल की जीत के क्या मायने हैं? इन मुद्दों की ख़ास पड़ताल.

उर्मिलेश, वरिष्ठ पत्रकार

चार राज्यों के चुनाव परिणाम में मोदी की लहर नहीं हैं. ये उनका कोई दिग्विजय रथ भी नहीं है जिसके बारे में कहा जाए कि वह भारत में होने वाले हर चुनाव में जीत का परचम लहरा देंगे.

अगर मोदी या भाजपा की लहर होती तो राजधानी दिल्ली में पार्टी को 'थम्पिंग मेज्योरिटी' मिलती. उसी तरह भाजपा को छत्तीसगढ़ में भी प्रचंड बहुमत मिल गया होता.

इसके अलावा भी दो-तीन मुद्दे हैं जिन्हें मैं अहम समझता हूँ.

पहली बात ये कि इन चुनावों में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए-2 सरकार की ग़रीब और मध्य वर्ग विरोधी नीतियों और आर्थिक विकास के बारे में इनके नज़रिए को जनता ने नकार दिया है.

कांग्रेस के प्रति गुस्सा

महंगाई भी इन्हीं नीतियों का असर है और जनता का जनादेश इसकी नामंजूरी है. यूपीए-2 और कांग्रेस के प्रति लोगों ने अपने ग़ुस्से को प्रदर्शित किया है.

दूसरी बात ये है कि जिन प्रदेशों में भाजपा की सरकार बेहतर काम कर रही थी या जिसका 'सोशल इंजीनियरिंग' अपेक्षाकृत बेहतर काम कर रहा था.

जहाँ सामाजिक, जातिगत और सामुदायिक समीकरणों का ख्याल रखा गया, वहां मुख्यमंत्रियों को उसका फ़ायदा मिला, जिसका उदाहरण है मध्य प्रदेश.

मध्य प्रदेश में सरकार ने कृषि के क्षेत्र में आम लोगों के लिए काफ़ी कुछ किया. कृषि उत्पादन क्षेत्र में मध्य प्रदेश को देश का अव्वल राज्य बनाया. शिवराज सिंह की सोशल इंजिनीयरिंग कमाल की है.

दलितों की उपेक्षा

शिवराज सिंह चौहान एक आम साधारण परिवार का एक चेहरा है जो अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं जबकि कांग्रेस दलितों और अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों की राजनीति में उपेक्षा करती आई है.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा के नेता और नीतियों की स्थिति सामान है. इसलिए बराबरी की टक्कर रही.

आदिवासियों के मामले में दोनों पार्टियों की नीतियां एक हैं और इसका उदहारण है सलवा जुडूम में दोनों ही दल साथ रहे हैं.

दिल्ली में तो आम आदमी पार्टी ने भाजपा के गुब्बारे में सुई चुभो दी. आम आदमी पार्टी को मध्य वर्ग के अलावा दिल्ली के ग़रीब गुरबों ने भी समर्थन दिया है.

ये चमत्कार है. ये एक नया फेनोमेनन है उत्तर भारत की राजनीति में.

आकार पटेल, वरिष्ठ पत्रकार

उत्तर भारत के चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में मोदी की लहर का असर साफ़ तौर पर देखा जा सकता है. यह इसी लहर का नतीजा था कि चारों राज्यों में पांच फ़ीसदी वोटिंग ज़्यादा हुई है.

यह कांग्रेस के ख़िलाफ़ कोई नकारात्मक वोट नहीं है. चारों राज्यों में पिछली बार के मुक़ाबले वोटिंग ज़्यादा हुई है. मेरा मानना है कि यह मोदी के समर्थन में एक लहर है.

जहां तक छत्तीसगढ़ का सवाल है, तो दस साल में विपक्ष में बैठने के बाद भी आप जीत नहीं पाते हैं और एंटी इनकंबैंसी यानी सत्ता विरोधी भावना को पछाड़कर यदि भाजपा जीतती है तो उसका कोई कारण तो ज़रूर होगा.

छत्तीसगढ़ में भाजपा की वापसी के कारण हैं - एक, प्रशासन ने अच्छा काम किया है. दूसरा, भाजपा जातिवादी समीकरण को साधने में सफल रही है. तीसरा, भाजपा के साथ एक देशव्यापी लहर है जो मोदी की वजह से है.

रही दिल्ली की बात, तो मेरा मानना है कि लोकसभा में जो तस्वीर उभरेगी वो विधानसभा से एकदम अलग होगी. इस बार जो वोट आम आदमी पार्टी को मिले हैं, वे लोकसभा में नहीं मिलेंगे.

शिवराज को भी श्रेय

कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने इस बार आम आदमी पार्टी को वोट दिया है, लेकिन वो लोकसभा में भाजपा को वोट देंगे.

मध्य प्रदेश और राजस्थान की जीत का श्रेय शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे को दिया जाना चाहिए.

मध्य प्रदेश में भी अच्छा प्रशासन और जातियों के समीकरण को साधना भाजपा की सफलता का राज़ है. ये दो चीज़ें मिल जाएं तो फिर ऐसी पार्टी को हराना बहुत मुश्किल है.

निश्चित रूप से इस जीत का श्रेय मोदी से ज़्यादा शिवराज को जाता है. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पांच फ़ीसदी ज़्यादा वोटिंग चारों राज्यों में हुई है. यह लहर मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं हैं. बाहर से ऐसा कुछ हुआ है जिसने लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित किया है.

मोदी की चुनौतियाँ

मेरा मानना है कि लोगों ने मोदी के समर्थन में वोट दिया है. मध्य प्रदेश में जीत का 75 फ़ीसदी श्रेय शिवराज को और 25 फ़ीसदी मोदी को जाता है.

राजस्थान में राजपूत पहले से ही भाजपा के साथ थे. पिछली बार भाजपा भीतरघात का शिकार हुई थी. लेकिन इस बार ऐसा नहीं था.

हर राज्य में सत्तारूढ़ दल का किसी एक जाति से नाता होता है. उदाहरण के लिए गुजरात में पटेल भाजपा के साथ रहे हैं. मोदी के मंत्रिमंडल में सबसे ज़्यादा प्रतिनिधित्व पटेलों का है.

मोदी के सामने अब चुनौती कर्नाटक में लिंगायत वोट को फिर से पार्टी से जोड़ने की होगी. दूसरी चुनौती सहयोगी दलों को जोड़ने की है.

मोदी को अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियों को साथ लाना होगा. आज की स्थिति को देखकर लग रहा है कि भाजपा अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में 170 से 180 सीटें तक ला सकती है. अब मोदी को यह देखना होगा कि वो 272 के आंकड़े तक कैसे पहुंचेंगे.

सतीश मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक

चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली जीत में कांग्रेस विरोधी लहर का योगदान है. ख़ास तौर पर केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के ख़िलाफ़ जो लोगों में आक्रोश था, उसने बड़ा काम किया. स्थानीय मुद्दों ने भी अपना काम किया.

राजस्थान में जो भाजपा की अप्रत्याशित विजय हुई है उसका सबसे बड़ा कारण रहा है कि अशोक गहलोत की सरकार ने जो वायदे किए और जिन नीतियों की घोषणा की, उन्हें लागू नहीं किया.

राजस्थान में गहलोत ने मतदाताओं की नब्ज़ नहीं टटोली. अगर राजस्थान में मोदी नहीं भी प्रचार करते, तो भी गहलोत की इतनी ही करारी हार होती.

मोदी रहे बेअसर

इसके अलावा केंद्र में कांग्रेस के शासन के दौरान हुए घोटाले और भ्रष्टाचार के मामलों का असर भी पड़ा है. यह कहना कि भाजपा को मोदी की वजह से फ़ायदा हुआ है, इस पर बड़ा प्रश्न चिन्ह है.

मोदी का अगर इतना बड़ा फैक्टर होते तो छत्तीसगढ़ में कांटे की टक्कर नहीं होती. उसी तरह मध्य प्रदेश में जीत का सेहरा सिर्फ शिवराज सिंह चौहान के सर बंधना चाहिए न कि मोदी के.

दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी के परफॉर्मेंस को देखा जाए तो इससे शक होता है कि इन चुनावों में मोदी का किसी भी तरह का प्रभाव रहा है.

अगर मोदी की वजह से भाजपा को दिल्ली में वोट मिला होता तो उसे प्रचंड बहुमत मिलता. ऐसे में आम आदमी पार्टी को बहुत ही कम सीटें मिलनी चाहिए थीं. दिल्ली की कम से कम 45 सीटें भाजपा की झोली में आनी चाहिए थी.

(आकार पटेल की राय बीबीसी संवाददाता अनुराग शर्मा के साथ बातचीत पर आधारित)

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