'फिसलन भरी राह को है केजरीवाल का इंतज़ार'

आम आदमी पार्टी के सदस्य

दुनिया के कुछ अन्य देशों में आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियां बनती रही हैं, जैसे अमरीका में एक टी-पार्टी बनी थी. आम आदमी पार्टी शहरी मध्यवर्ग और युवाओं की अवधारणा है जो परंपरागत राजनीति से नाराज़ हैं या उससे ऊब गये हैं. कोई दूरगामी योजना या अच्छा राजनीतिक संगठन इसका आधार नहीं है.

इसका आधार ये धारणाएं हैं कि कुछ व्यवस्थाएं हैं जो मानव-विरोधी हैं या भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती हैं जो हमारी समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार हैं. ऐसे में आम आदमी पार्टी का उदय होना और उसे समर्थन मिलना बड़ा स्वाभाविक है.

ये बात चुनाव से पहले ही समझ में आने लगेगी कि आम आदमी पार्टी कुछ न कुछ तो करेगी. लेकिन ये पार्टी यदि देश की परंपरागत राजनीति नहीं सीखेगी तो उसका विफल होना बिल्कुल तय है.

भारतीय मध्यवर्ग अब अपेक्षाकृत जागरूक है. जाति और धर्म के जुमलों से उसे लंबे समय तक भरमाया जा चुका है. दिल्ली के मध्यवर्ग ने आम आदमी पार्टी पर भरोसा किया है, पार्टी भरोसे पर कितना खरा उतरती है, ये देखना बाकी है.

आम आदमी पार्टी पर इन लोगों के भरोसे का आधार ये है कि ये पार्टी दूसरी पार्टियों से अलग है और ये हमारे जैसे लोग हैं. ऐसे में इस पार्टी को समर्थन मिलना स्वाभाविक है. आगे क्या होगा, ये दूसरी बात है.

'आप' की आगे की राह

दिल्ली के यही लोग अगले लोकसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी को वोट देंगे, ये कहना अभी मुश्किल होगा. ये अन्ना आंदोलन से निकला राजनीतिक आंदोलन है, इस बात को मानने में हमें गुरेज़ नहीं होना चाहिये.

लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि तब अन्ना को मुंबई में दिल्ली जैसा समर्थन नहीं मिला था. दिल्ली की बात अलग है जहां मीडिया ने बड़ी भूमिका अदा की. कह सकते हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद आम आदमी पार्टी का विस्तार अन्य महानगरों में भी होगा.

आम आदमी पार्टी भी दिल्ली में अपनाए तौर-तरीकों को इन महानगरों में आज़माना चाहेगी. लेकिन ये कोई बड़ा आंदोलन बन पायेगा या नहीं, फिलहाल कहना मुश्किल है. अगले एक हफ्ते में इस पार्टी की कड़ी परीक्षा होगी कि दिल्ली में सरकार बनाने के बारे में वो क्या निर्णय करती है.

अगर वो किसी और पार्टी के समर्थन से सरकार बनाती है तो ये उसके लिये आत्मघाती होगा. ऐसे में आम आदमी पार्टी सरकार नहीं बनने देगी या जो सरकार बनती है, उसे गिराकर दोबारा चुनाव की मांग करती है, ये देखने वाली बात होगी.

'कांग्रेस की परेशानी'

बाकी राज्यों के विधानसभा चुनावों की बात करें तो कांग्रेस की हार तो हुई ही है. कांग्रेस के प्रति लोगों की नाराज़गी ज़ाहिर हुई है. ख़ानदानी या कहें पारिवारिक सत्ता को लेकर भी लोगों में नाराज़गी रही है. कांग्रेस को अपना मूल्यांकन करना पड़ेगा कि उसके जुमलों में कहां कमी रह गई.

कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व पर सवालिया निशान तो लग ही गया है. लेकिन कांग्रेस के पास राहुल गांधी के अलावा कोई विकल्प नहीं है. थोड़े बेहतर विकल्प के तौर पर आप प्रियंका गांधी का नाम ले सकते हैं. या फिर सोनिया गांधी नेतृत्व करेंगी. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, कांग्रेस पर जो परिवारवाद का ठप्पा लगाया गया है, वो तो लगा ही रहेगा.

कांग्रेस अपने भीतर से कोई नया नेता तैयार करेगी, ऐसा नहीं होगा, क्योंकि ऐसा होता है तो वो फिर कांग्रेस पार्टी नहीं रहेगी, कोई और पार्टी हो जायेगी.

किसी ने कहा कि तीसरे मोर्चे को मज़बूत बनाने के लिए भी कांग्रेस का ख़ात्मा होना ज़रूरी है. ऐसे में आप आम आदमी पार्टी को तीसरा मोर्चा मान लीजिए.

नई राजनीति के जन्म के लिये कांग्रेस को ख़त्म होना पड़ सकता है. भारतीय जनता पार्टी का जन्म भी कांग्रेस विरोधी पार्टी के तौर पर हुआ था. उसकी परीक्षा भी होना बाकी है, उसमें भी कई दोष हैं.

नरेंद्र मोदी का जादू?

नरेंद्र मोदी अपने साथ एक प्रकार की धारणा लेकर आ रहे हैं कि वो एक कड़क और निर्णय लेने वाले नेता हैं.

कांग्रेस ने मनमोहन सिंह को लाचार प्रधानमंत्री के तौर पर काम करने दिया, इससे देश में पार्टी के प्रति ख़राब संदेश गया है.

कांग्रेस के लिए अस्तित्व का संकट पैदा होगा तो नरेंद्र मोदी पर कई तरह के हमले भी होंगे. भारतीय जनता पार्टी को आम आदमी पार्टी की चुनौती से भी निपटना होगा. क्षेत्रीय पार्टियां भी अपनी ताकत दिखाएंगी.

लोकसभा चुनाव से पहले किसी तरह का गठबंधन नहीं होगा लेकिन चुनाव के बाद जरूर गठबंधन बन सकते हैं. आम आदमी पार्टी के अंतर्विरोध भी आने वाले दिनों में दिखाई देंगे.

कांग्रेस का लोप होगा या नहीं, अभी कहना मुश्किल है, लेकिन यदि ऐसा हुआ तो हमें एक नई राजनीतिक शक्ति का इंतज़ार करना पड़ेगा.

(बीबीसी के राजेश जोशी से बातचीत पर आधारित)

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