छत्तीसगढ़: रमन सिंह के नेतृत्व में टूटे कई मिथक

छत्तीसगढ़

चार राज्यों में विधानसभा चुनाव के परिणाम आ चुके हैं. इनमें से हर राज्य में- चाहे वो दिल्ली हो, राजस्थान, मध्य प्रदेश हो इनमें कई मिथक गढ़े गए और कई ढह गए.

छत्तीसगढ़ में भी कई मिथक टूटे और बने.

चुनावी गणित के खेल में कुछ आंकड़े अब भी ऐसे उलझे हैं, जिनका ठीक-ठीक जवाब न तो जीतने वालों के पास है और न ही हारने वालों के पास.

लेकिन इस बात से इनकार किसी को भी नहीं है कि राज्य में रमन सिंह का लोकप्रिय चेहरा और सरकार की छोटी-बड़ी योजनाएं कांग्रेस पर भारी पड़ गईं. चुनाव प्रचार के दौरान कई अवसर ऐसे थे, जब रमन सिंह ने सार्वजनिक सभाओं में कहा कि उम्मीदवार को नहीं, उनके चेहरे को वोट दें. मतदाताओं ने रमन सिंह की बात मान ली.

इस बार छत्तीसगढ़ में भाजपा को 53.4 लाख वोट मिले, जो कुल वैध मतों का 41.4 प्रतिशत था. कांग्रेस को 40.29 प्रतिशत यानि 52.44 लाख वोट मिले. यानी दोनों पार्टियों के बीच का अंतर एक प्रतिशत से भी कम रहा.

साल 2008 के चुनावी आंकड़ों को देखें तो भाजपा उस समय 43.33 लाख वोट पाकर 40.33 प्रतिशत पर थी और कांग्रेस को जनता ने 41.50 लाख वोट यानी 38.63 प्रतिशत के आंकड़े पर रोक दिया था.

ताज़ा चुनाव में भाजपा को 0.7 प्रतिशत की बढ़त मिली और कांग्रेस को 1.6 प्रतिशत की. भाजपा 2008 के 50 सीटों के बजाए इस बार एक सीट हार कर 49 सीट पर उतर गई और कांग्रेस ने एक सीट पर बढ़त बनाते हुए 38 से 39 सीट पर जा पहुंची. लेकिन कांग्रेस की कोई भी बढ़त काम नहीं आई.

बस्तर का मिथक

छत्तीसगढ़ में सत्ता की चाबी बस्तर से निकलती है, यह मिथक इस बार ग़लत साबित हो गया. बस्तर की 12 में 11 सीटें पिछली बार भाजपा के पास थी. इस बार इनमें से आठ सीटें कांग्रेस को मिली.

लेकिन रायपुर, जशपुर और कोरिया के मैदानी इलाक़ों में जहां कांग्रेस को बढ़त की उम्मीद थी, वहां पार्टी हार गई.

नेता प्रतिपक्ष रवींद्र चौबे भी हार गए और कद्दावर आदिवासी नेता बोधराम कंवर और रामपुकार सिंह भी. कांग्रेस के 27 विधायक इस बार विधानसभा नहीं पहुंच पाए.

लेकिन रमन सिंह के एक दर्जन मंत्रियों में से पांच मंत्री भी बुरी तरह से हारे. गृहमंत्री ननकीराम कंवर, कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू के साथ-साथ हेमचंद यादव, लता उसेंडी और रामविचार नेताम को जनता ने नकार दिया. विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक को भी जनता ने नकार दिया.

चुनाव मैदान में इस बार जनता ने नए चेहरों को ज़्यादा महत्व दिया. भाजपा के 37 में से 24 और कांग्रेस के 36 में से 17 नए चेहरों के सिर पर जीत का सेहरा बंधा.

पहली बार चुनाव लड़ रहे पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी ने 46,250 मतों के अंतर से जीतकर राज्य में नया रिकॉर्ड बनाया.

भाजपा ने 90 में से 11 सीटों पर महिला उम्मीदवारों को उतारा था. इनमें से छह जीत गईं. कांग्रेस ने 14 महिला उम्मीदवारों को टिकट दी थी, जिनमें से तीन पर ही मतदाताओं ने भरोसा जताया.

मोदी का लाल क़िला

चार राज्यों के चुनाव में नरेंद्र मोदी के जादू पर बहस हो सकती है लेकिन छत्तीसगढ़ में अंबिकापुर के जिस नकली लाल क़िले से नरेंद्र मोदी भाषण दे कर गए थे, उस पूरे इलाक़े में भाजपा बुरी तरह से हार गई.

लाल क़िले वाले शहर अंबिकापुर में 2008 के चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार टी एस सिंहदेव मुश्किल से 965 वोटों से जीत पाए थे.

ताज़ा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार की जीत का अंतर बढ़ गया और वह 19558 वोटों से चुनाव जीत गए.

राज्य में पहली बार चुनाव में ‘इनमें से कोई नहीं’ यानी नोटा का इस्तेमाल मतदाताओं ने जिस तरीक़े से किया है, वह एक नई पड़ताल की मांग करता है.

90 में से 35 सीटों पर कांग्रेस और भाजपा के बाद जनता ने नोटा को अपने लिये चुना. बस्तर की सभी 12 सीटों पर नोटा का जम कर इस्तेमाल हुआ.

कांकेर में कांग्रेस के शंकर ध्रुवा की जीत का अंतर 4625 था, जबकि नोटा का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 5208 थी. दंतेवाड़ा में कांग्रेस की देवती कर्मा कुल 5987 वोटों से जीतीं लेकिन वहां 9677 लोगों ने नोटा में वोट डाले.

इसी तरह कोंडागांव में कांग्रेस के ही मोहन मरकाम 5135 वोटों से जीते, वहां 6773 लोगों ने नोटा में वोट डालना पसंद किया. बस्तर की हरेक सीट पर चार हज़ार से अधिक नोटा वोट पड़े. चित्रकोट में कांग्रेस के दीपक बैज को कुल 50303 वोट मिले और जनता ने 10848 वोट नोटा में डाले.

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