दिल्ली में सरकार बनने के 'तीन विकल्प'

  • 9 दिसंबर 2013
दिल्ली

दिल्ली विधानसभा की कुल 70 सीटों में भाजपा को 31, 'आप' को 28 और कांग्रेस को आठ सीटें मिली हैं. अन्य के खाते में तीन सीटें आईं हैं.

दिल्ली में सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत किसी भी दल के पास नहीं है. ऐसे में सवाल है कि संविधान में सरकार बनाने के कौन-कौन से विकल्प हो सकते हैं? बीबीसी ने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप से बात की.

दिल्ली में सरकार बनाने के लिए सबसे पहला क़दम ये हो सकता है कि सबसे बड़ी पार्टी की सरकार बनाने की कवायद हो.

इसके लिए दिल्ली के उपराज्यपाल सबसे बड़े दल के नेता को बुलाएं और उन्हें अपना बहुमत साबित कर सरकार बनाने के लिए कहें.

सबसे ज़्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी भाजपा यदि यह कहती है कि वह सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं, तो फिर उपराज्यपाल, जो दूसरा सबसे बड़ा दल है, यानी 'आप' के नेता को बुला सकते हैं.

यदि 'आप' भी यह कह दे कि वह सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं तो दो विकल्प हो सकते हैं.

विकल्प

पहला विकल्प यह हो सकता है कि उपराज्यपाल राष्ट्रपति को सिफ़ारिश करें कि दिल्ली में सरकार नहीं बन सकती इसलिए राष्ट्रपति शासन ज़रूरी हो गया है.

संविधान के अंतर्गत दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि उपराज्यपाल विधानसभा को कहें कि आप अपना नेता चुन लें. सदन जो नेता चुनेगा वो ज़रूरी नहीं कि सबसे बड़ी पार्टी से हो बल्कि वो किसी भी पार्टी से हो सकता है.

सदन उसे नेता चुन सकता है जिसे सदन का बहुमत मिल जाए. वह नेता सदन के बाहर का भी हो सकता है. जो नेता चुना जाएगा उसे सदन का बहुमत प्राप्त होगा. इसलिए वो सरकार बनाएगा.

इस तरह दिल्ली में सरकार कई तरह से बन सकती है. वह सरकार दो दलीय, दल विहीन या सर्वदलीय हो सकती है.

हालांकि ये अस्वाभाविक लगता है मगर ये संविधान के अंतर्गत संभव है.

अल्पमत सरकार

अगर कोई दल बहुमत साबित नहीं कर पाता तो गठबंधन की सरकार बन सकती है.

दोनों बड़ी पार्टियां यह तय कर लें कि हम समर्थन तो नहीं करेंगे मगर हम विरोध भी नहीं करेंगे. बल्कि मुद्दा आधारित राजनीति होगी.

संसदीय लोकतंत्र में ये ज़रूरी नहीं कि बहुमत का समर्थन प्राप्त हो. ज़रूरी यह है कि सरकार के विरोध में बहुमत न हो. इस तरह अल्पसंख्यक सरकार बनने की एक संभावना है.

संविधान के तहत एक विकल्प यह भी है कि सदन एक ऐसे नेता को चुन ले जो बहुमत को स्वीकार्य हो. वह नेता सरकार बनाए.

दल विहीन सरकार

अब यह उस नेता पर निर्भर होगा कि वह अपनी सरकार में एक दल के लोगों को रखे या दो दल के लोगों को.

हालांकि इस तरह सरकार बनाने की बात पहले कभी नहीं उठी है. हां, जब अंतरिम सरकार बनी थी. इसमें मुस्लिम लीग भी थी और कांग्रेस भी थी.

जनसंघ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी उसके सदस्य थे.

तो इस तरह से तीन विकल्प हैं. पहला कि कोई दल अपना बहुमत साबित कर सके, चाहे भाजपा हो या 'आप'. दूसरा विकल्प कि अल्पमत सरकार बने.

और तीसरा विकल्प यह है कि एक नेता चुना जाए और बिना दल की सरकार बने.

सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत किसी दल के पास नहीं है.

'दल बदल विरोधी कानून'

मौजूदा संख्या में एक स्थिति अगर यह बनती है कि दोनों दल, अगर दूसरे दल से चाहे भाजपा हो, आप या कांग्रेस के, किसी विधायक को जोड़ती है तो इन पर 'दल-बदल विरोधी कानून' लागू होगा.

जब तक विलय न हो इस क़ानून के लागू होने का ख़तरा है.

इसमें बस एक अपवाद यही हो सकता है कि अगर दो तिहाई सदस्य दूसरी पार्टी से जुड़ जाएं तब ये स्थिति नहीं आएगी. लेकिन इस स्थिति के आने की संभावना भी नहीं लगती.

अगर सरकार नहीं बनती है तो छह महीने के अंदर दोबारा चुनाव कराने होंगे.

मौजूदा परिस्थितियों में इस बात की संभावना ज़्यादा लगती है कि ये चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ ही कराए जाएं. मगर अंतिम निर्णय चुनाव आयोग का ही होगा. इस दौरान दिल्ली में उपराज्यपाल का शासन रहेगा.

(बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से बातचीत पर आधारित)

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