आम मतदाताओं को कैसे साध पाए मोदी और केजरीवाल?

मिज़ोरम के नतीजे को अगर छोड़ दें तो चार राज्यों के विधानसभाओं के नतीजे चौंकाने वाले रहे.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी उम्मीद से कहीं ज़्यादा सीटें मार ले गईं. दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी के सरकार बनाने के सपने में सेंध लगा दी.

चार राज्यों में कांग्रेस का तो सूपड़ा ही साफ़ हो गया.

संचार प्रबंधन की भूमिका

इन चुनाव परिणामों में विभिन्न राजनीतिक दलों की संचार प्रबंधन की रणनीति को मोटे तौर पर चार पैमानों पर देखने की जरूरत है- लक्षित जनसमूह की पहचान, संदेश और उसकी विश्वसनीयता, संदेश का मुख्य संवाहक और मुख्य संवाहक की संचार क्षमता.

(चमत्कार और सीत्कार के बीच चीत्कार)

लक्षित जनसमूह की पहचान पर बात शुरू करने से पहले यह देखना होगा कि इस बार सभी राज्यों में लगभग 70 फ़ीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जो अपने आप में रिकॉर्ड है.

यह मान लेने में कोई ग़लती नहीं होगी कि मतदान प्रतिशत बढ़ने की मुख्य वजह युवा मतदाताओं का मतदान में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेना रहा. नगरों और महानगरीय समाज में यह शिक्षित तबका था. इनकी आकांक्षाएं और अपेक्षाएं नौकरी और काम के अवसर से सीधे जुड़ी हुई हैं. यह तबका भ्रष्टाचार और शोषण का दंश भी झेलता रहा है.

पिछले कुछ समय में केंद्र के स्तर पर जो घोटाले उजागर हुए हैं और कमरतोड़ महंगाई बढ़ी है, उसकी जानकारी भी आम लोगों तक पहुंचती रही. इसके उलट केंद्र सरकार ने जो जन कल्याण योजनाएं पिछले कुछ सालों से चलाई या तो उनका क्रियान्वयन नहीं हुआ और यदि हुआ तो वह युवा मतदाताओं को लॉलीपॉप सा लगा.

लॉलीपॉप इसलिए क्योंकि उससे थोड़ी देर तक मुंह मीठा तो हो सकता है, लेकिन इससे बहुत देर तक भूख नहीं मिट सकती.

युवा चाहते थे बदलाव

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पहले से भारतीय जनता पार्टी की सरकारें थीं. वहां के आम लोग यह मानते रहे कि विकास का काम हुआ है, भले उसकी रफ्तार कम रही हो. यह संदेश दोनों राज्य के मुख्यमंत्री देते रहे.

दूसरी ओर इन राज्यों में कांग्रेस यह कहती रही कि इन राज्यों में विकास तो हुआ ही नहीं और बदलाव की आवश्यकता है. हालांकि कांग्रेस के जो नेता इन राज्यों में यह बात कह रहे थे उनकी अपनी विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा था, चाहे वह दिग्विजय सिंह हों या अजीत जोगी.

(आप पार्टी के सिकंदर)

कांग्रेस के लिए प्रचार की धुरी थे राहुल गाँधी. वे युवा नेता हैं, लेकिन उनकी संचार क्षमता पर भी प्रश्न चिन्ह लगा है. शारीरिक हाव-भाव से विश्वस्त होने और विश्वास जगाने की क्षमता कम है. अंग्रेजी संस्कृति में पले-बढ़े राहुल की हिंदी आम युवाओं के मन की गहराई को छूती नहीं.

पिछले कुछ महीनों में उन्होंने कागज़ फेंक कर या फाड़ कर या कठोर शब्द बोलकर अपनी छवि एंग्री यंग मैन वाली बनाने का प्रयास भी किया. उससे मन की टीस कम और धृष्टता अधिक टपकती थी. उन्होंने अपने पिता और दादी की कुर्बानी का वास्ता दिया और गुजरात के साल 2002 दंगों को फिर से अपने भाषणों में जिलाने की कोशिश की परंतु यह सब नाकाम से हो गया, क्योंकि आज का मतदाता कल की उम्मीदों से अधिक जुड़ा है.

राहुल की नाकामी

मध्य प्रदेश में युवा नेता ज्योतरादित्य सिंधिया को आगे लाया गया. उनके कुछ संदेश समझदारी भरे थे, परन्तु उनकी सामंती छवि और मध्यप्रदेश की राजनीति में दे से सक्रिय होना, कांग्रेस के पक्ष में बात नहीं बनने दी.

सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने भी चार राज्यों में जनसभाओं को संबोधित किया. लेकिन केंद्र में सरकार की पिछले लगभग एक साल में जिस तरह से खराब छवि और दाग़ी कार्यकलापों को मीडिया ने बढ़ा चढ़ाकर पेश किया, उसके चलते उनके भाषणों का विशेष प्रभाव नहीं हो पाया.

दरअसल कांग्रेस के सभी बड़े नेता ज़मीनी कार्यकर्ताओं को निरंतर प्रोत्साहित नहीं कर सके. ये उनके संचार क्षमता की बड़ी कमजोरी रही.

राहुल गांधी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से बहुत कम मिलते थे, जिस कारण कांग्रेस का साधारण कार्यकर्ता यह समझ नहीं पाया कि उसे मतदाता तक क्या संदेश पहुंचाना था. उन्होंने कभी राष्ट्रीय या स्थानीय समस्याओं का हल नहीं बताए.

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी को इस चुनाव में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं का सहयोग पूरी तरह से उपलब्ध था. नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने का लाभ भी भारतीय जनता पार्टी को मिला.

मोदी की कामयाबी

मोदी ने युवा मतदाताओं को ध्यान में रखकर एक ओर गुजरात के विकास मॉडल की भरपूर चर्चा की तो दूसरी ओर कांग्रेस के घोटालों, महंगाई और भ्रष्टाचार की कटाक्षपूर्ण बात करके आम मतदाता का ख़ूब मनोरंजन भी किया.

उन्होंने राहुल को शाहजादा और खुद को चाय बेचने वाला बताकर आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को अपने आप से जोड़ लिया.

वह मतदाताओं के बीच केंद्र सरकार के कुशासन तथा गतिहीन कार्यकलापों का संदेश पहुंचाने में सफल रहे. महंगाई को उन्होंने खूब भुनाया. राज्सथान में विकास और दिल्ली में महंगी बिजली और पानी को लेकर उन्होंने मतदाताओं के मन की बात कह डाली.

मोदी ने लगातार इस बात का ध्यान रखा कि उनकी जनसभा राहुल, सोनिया और मनमोहन सिंह की जनसभा के कुछ ही समय बाद हो, जिससे वह इन लोगों की आलोचनाओं का सिलसिलेवार पुरजोर जवाब दे सकें. यह उनकी रणनीति का महत्वपूर्ण भाग रहा.

राहुल चाहते तो अपने युवा होने का लाभ मतदाता के बीच उठा सकते थे, लेकिन मोदी के शारीरिक हाव-भाव तथा बात को कहने का ढंग राहुल से कहीं प्रभावी रहा.

(आप पार्टी बदल देगी भारत की राजनीति)

वर्ष 2002 के गुजरात दंगों को चाहकर भी कांग्रेस अल्पसंख्यकों के बीच नहीं भुना सकी जबकि भारतीय जनता पार्टी ने महमूद मदनी जैसे अल्पसंख्यक नेताओं को समय रहते अपने साथ जोड़ने में कामयाब हुई. कांग्रेस धर्म निरपेक्षता को युवा मतदाताओं के बीच भी नहीं भुना सकी जबकि सोच और करनी दोनों लिहाज से युवा मतदाता भरपूर धर्मनिरपेक्ष हैं.

केजरीवाल असली हीरो

शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह पिछले दस साल किए गए विकास कार्यों को मतदाता के मानस पटल पर ठीक से परोसने में कामयाब हुए.

राजस्थान में प्रत्येक पांच साल में सरकार बदलने की परंपरा रही है, इस बार भारतीय जनता पार्टी को ज़्यादा कामयाबी मिली है तो इसका श्रेय मोदी को भाषण ही हैं. वहां कोई तीसरा विकल्प भी नहीं था.

दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री पद के लिए डॉ. हर्षवर्धन का नाम देकर चुनाव से पहले मतदाताओं में विश्वसनीयता पैदा करने में कामयाब रही. लेकिन दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी का संचार सबसे प्रभावी साबित हुआ.

दिल्ली का लक्षित मतदाता तो तीनों दल के लिए एकसमान था. लेकिन बीते एक साल में आम आदमी पार्टी ने भ्रष्टाचार को सबसे अहम मुद्दा बना दिया. यह मुद्दा मतदाताओं को छूने में कामयाब हुआ.

(भारतीय जनता पार्टी की जीत, मोदी भी जीते)

आम आदमी पार्टी ने राहुल गांधी की तरह समस्या की चर्चा करके उसे छोड़ नहीं दिया बल्कि समस्या को सुलझाने का रास्ता भी बतलाया. पार्टी के अंदर कई नेता थे, लेकिन पार्टी ने अरविंद केजरीवाल को अपना चेहरा बनाया.

इसके अलावा आम आदमी पार्टी ने चुनाव के प्रत्याशी चुनते वक्त समर्पित लोगों का चुना. अरविंद केजरीवाल ने मीडिया के माध्यम से अपनी बात कहने का कोई अवसर नहीं गंवाया. उन्होंने मतदाता से निरंतर संपर्क बनाए रखा.

आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार उन्मूलन के संदेश को प्रभावी ढंग से पेश करने में कामयाब रही, लेकिन क्या वह लोकसभा चुनाव में बृहत्तर स्तर पर भी संचार को इतना प्रभावी रख पाएगी, यह ध्यान देने की बात होगी.

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