ये मेरी देह है तुम्हारी मिल्कियत नहीं...

कानपुर, हिंसा, महिला

याद है पिछले साल दिसंबर की 16 तारीख. मैं लंदन में थी. खबरें आ रही थीं दिल्ली की सड़कों पर बढ़ती भीड़ की, हवा में तनती मुट्ठियों की और विरोध की तेज़ और तीखी होती आवाज़ की.

दिल्ली बलात्कार घटना एक ऐसी घटना थी जो भूलने की आसान सी आदत डाले इस समाज पर हथौड़े बरसा रही थी. ये घटना अख़बारों के फुटनोट में आकर गुम होने वाली घटना नहीं रही.

एक साल बाद क्या बदला है इसी का जायज़ा लेने की मंशा से बीबीसी हिंदी अगले एक सप्ताह तक उन कहानियों और मुद्दों को आप तक लाएगा जो औरतों के संघर्ष और उससे इतर उनके सफ़र की कहानी है.

इन्हीं कहानियों की तलाश में मेरी मुलाकात रेशमा से हुई. फोन पर रेशमा की आवाज सुनकर अंदाज़ा नहीं हुआ था कि उनमें 15 सालों से चली आ रही अपनी खामोशी को तोड़ने की हिम्मत होगी.

(महिलाओं के लिए डरावने भारत का नक्शा)

घर का पता पूछने पर वो फोन किसी और को थमा देती हैं. ड्योढ़ी से बाहर की जिंदगी का अंदाज़ा तक नहीं है उन्हें. कानपुर के एक छोटे कमरे के घर में वो अभी अपने मां-बाप और छोटी बहन के साथ हैं.

रेशमा 30 साल की हैं और पांच लड़कियों की मां. छठा बच्चा अभी गर्भ में पल रहा है.

वो जानलेवा हमला

एक कमरे में बिस्तर पर लेटी लंबी सी रेशमा सलवार कमीज में हैं, रुक-रुक कर बोलती हैं. उठकर बैठ नहीं सकतीं देर तक. क्यों पूछने पर जवाबों का सिलसिला शुरू होता है.

पंद्रह साल पहले उनकी शादी हुई. शादी के बाद से ही प्रताड़ना का दौर भी शुरू हो गया. रेशमा कहती हैं कि उनके पति अच्छा कमाते हैं लेकिन उन्हें घर चलाने के लिए कभी उतने पैसे नहीं मिले कि वे अपनी पांच बच्चियों का पेट अच्छी तरह भर सकें. उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए रेशमा ने सिलाई का काम शुरू किया.

हर रोज़ छोटी-मोटी बातों पर पिटना, ज़लील होना उसके लिए रोज़मर्रा की बात हो गई थी.

दुपट्टे के कोर से आंखों को पोंछती रेशमा कहती हैं, "जब छठी बार मैं गर्भवती हुई तो पति ने कहा उन्हें अब और बेटी नहीं चाहिए. इसीलिए अल्ट्रासाउंड करवाओ. अगर लड़की है तो गर्भपात करवाना होगा."

( महिलाओं के लिए कितनी उम्मीद जगी है?)

रेशमा कहती हैं कि उन्हें ये बिल्कुल मंज़ूर नहीं था. जहां पांच पली हैं एक और पल जाएगी.

बहुत सह लिया

पर उनका मना करना उनके पति को गवारा नहीं हुआ.

रेशमा बताती हैं कि झगड़े के बाद उनके पति ने तेज़ाब की बोतल उनकी योनि की तरफ निशाना बनाकर फेंकी. अगले चार दिनों तक उनका इलाज तक नहीं किया गया. वे बेसुध बिस्तर पर पड़ी रहीं. मायके से जब पिता आए तब अस्पताल में भर्ती कराया गया.

अब तक की चार दीवारों में कैद ज़िदंगी और अपने सारे फ़ैसले कभी खुद न लेने के डर ने भी उन्हें पीछे हटने पर मजबूर नहीं किया.

पुलिस में मामला दर्ज हुआ और उनके पति अब जेल में हैं, हालांकि वे इन आरोपों को नहीं मानते.

चुप्पी तोड़ी

रेशमा कहती हैं कि दिल्ली की घटना के बाद वे औरतों के चेहरे ज़्यादा पढ़ने लगी हैं. उन्हें लगता है कि हर चेहरे पर यातना से जुड़ी एक कहानी की लकीर साफ़ दिखती है.

“अब बहुत जुल्म हो गया. अब औरतों को चुप नहीं रहना चाहिए. क्या हम शौहर के लिए केवल सामान हैं कि जब जी चाहा आए इस्तेमाल किया और जब जी चाहा मरने के लिए छोड़ दिया." रेशमा फूलती सांस में अपनी बात पूरी करती हैं.

अपनी पांच बच्चियों के भविष्य के लिए वो चिंतित नहीं हैं. मुझे नहीं मालूम कि इस हिम्मत की क्या वजह हो सकती है. खुद बुरी तरह अस्वस्थ, तेज़ाब का घाव भरा नहीं है, पेट में एक और बच्चा है, मां बाप बेहद ग़रीब हैं और अब इस भार से थोड़ा उकता भी चुके हैं.

(फ़ेसबुक पर उठाया औरतों ने इज़्ज़त का सवाल)

लेकिन रेशमा बस बार-बार यही कहती रही, ''उस नरक से तो कोई भी जगह अच्छी है. हाथ-पांव अच्छे हो जाए तो खुद कमा लूंगी."

मुझे एक मामूली सी दिखने वाली रेशमा की हिम्मत को देखकर अचरज हो रहा था. क्या यह एक बदलाव की बानगी है?

बाक़ी है उम्मीद

आख़िर महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की रिपोर्ट करवाने के लिए महिलाएं आगे नहीं आती हैं. यह एक आम राय है लेकिन पिछले एक साल के आंकड़ों को देखें तो तस्वीर बदली हुई नज़र आती है.

दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के हिसाब से इस साल के अगस्त महीने तक पिछले साल से दोगुना बलात्कार के मामले दर्ज हुए हैं. झारखंड जैसे राज्य में भी इस साल में ऐसी ही बढ़त दिखी है.

महिला अधिकारों के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं का मानना है कि यौन हिंसा के आसपास सधी चुप्पी की टूटने की ख़बर आती सी दिखती है. यही तो बदलाव की पहली शर्त है. आगे रास्ता तो तय हो ही जाएगा.

कानपुर से लौटते हुए रेशमा की बात मेरे मन में कौंधती रही.

उन्होंने कहा था, "बोलना ज़रूरी है. कई बच्चियों की जान इससे बच सकती है. मरना तो एक दिन है ही फिर तिल-तिल कर क्यों मरें?"

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