मैसूर: वॉडेयार के साथ ही एक 'राजघराने' का अंत

  • 11 दिसंबर 2013
श्रीकांतदत्ता वॉडेयार, मैसूर, राजा

मैसूर के पूर्व राजघराने के वंशज श्रीकांतदत्ता नरसिंहराज वॉडेयार का मंगलवार को निधन हो गया. उनके निधन के साथ ही ये राजघराना भी ख़त्म हो गया है.

बैंगलोर को तकनीकी कंपनियों का केंद्र बनाने का श्रेय इसी राजघराने को दिया जाता है.

60 साल के वॉडेयार को उनके पिता जयचामराजेंद्र वॉडेयार के निधन के बाद अनाधिकारिक रूप से महाराजा बनाया गया था. उनके पिता ने भारत की आज़ादी के वक़्त मैसूर रियासत के भारत में विलय को मंज़ूरी दी थी.

मैसूर विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफ़ेर डॉक्टर पीवी नंजराज उर्स कहते हैं, ''आधिकारिक रूप से वह राजकुमार थे लेकिन मैसूर की जनता उन्हें व्यावहारिक तौर पर महाराजा मानती थी. दिल से तो वह एक आम आदमी थे. एक साधारण इंसान.’’

मैसूर विश्वविद्यालय के ही एक और रिटायर्ड प्रोफ़ेसर डॉक्टर रफ़ीक अहमद कहते हैं, ''वह राजनीति विज्ञान के अच्छे छात्र थे. उन्होंने कभी राजपरिवार के सदस्य जैसा बर्ताव नहीं किया. न तो तब जब कि वह छात्र थे और न तब जब वह यूनिवर्सिटी में लेक्चरर बने.’’

क्रिकेट के शौकीन

उनके शिक्षक उन्हें एक छात्र और मैसूर विश्वविद्यालय की क्रिकेट टीम के सदस्य के तौर पर याद करते हैं.

उर्स कहते हैं, ''रोज़ प्रैक्टिस के बाद बाकी खिलाड़ियों के साथ सड़क किनारे की दुकान में चाय पीने में भी उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती थी. बाकी छात्रों से सिर्फ़ यहीं वह अलग थे कि वह कार से आते-जाते थे.’’

उर्स बताते हैं, ''वह अकसर अपने निजी सचिव से छिपकर दोस्तों के साथ स्कूटर पर बैठकर निकल जाते थे.’’

वॉडेयार हाल ही में कर्नाटक राज्य क्रिकेट संघ के अध्यक्ष चुने गए थे.

भारत के पूर्व टेस्ट कप्तान अनिल कुंबले कहते हैं, ''10 दिन पहले हुए चुनाव के दौरान उनकी तबीयत ठीक नहीं थी. मुझे हैरानी हुई थी जब वह रविवार को आए और पूरे दिन बैठे रहे. मुझे लगता है इसी से असर पड़ा. मुझे उनकी मौत का बहुत दुख है.’’

मंगलवार दोपहर को वॉडेयार बैंगलोर में अपने महल में अचानक गिर गए थे और दोपहर 3.30 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. उनके परिवार में सिर्फ़ उनकी पत्नी प्रमोदा देवी अवारू हैं. वॉडेयार की कोई संतान नहीं थी.

2004 में लोकसभा चुनाव के लिए पर्चा भरते हुए उन्होंने अपनी संपत्ति 1522 करोड़ रुपए बताई थी. इससे पहले वह कांग्रेस के टिकट पर तीन बार और भाजपा के टिकट पर एक बार चुनाव लड़ चुके थे.

उर्स कहते हैं, ''इसके साथ ही उस राजघराने का अंत हो गया है जिसने मैसूर पर 1377 से 1947 तक राज किया.’’

उच्च शिक्षा को बढ़ावा

उर्स याद करते हैं, ''इस राजघराने, ख़ासतौर पर श्रीकांतदत्ता के दादा महाराजा कृष्णराजा वॉडेयार, का योगदान बहुत बड़ा रहा है. उनके ही राज में उच्च शिक्षा को बढ़ावा मिला. 1905 में पूरे देश में सबसे पहले मैसूर में ही बिजली आई थी.’’

कृष्णराजा वॉडेयार के ही राज के दौरान जेएन टाटा को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस बनाने के लिए 371 एकड़ ज़मीन दी गई थी. इस संस्थान के एक पूर्व डायरेक्टर सीएनआर राव को पिछले महीने भारत रत्न देने का ऐलान हुआ है.

कृष्णराजा वॉडेयार ने जो कदम उठाए उन्हीं के आधार पर उच्च शिक्षा का निजीकरण हुआ. कर्नाटक ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य था. इसे साल 1972 से 1980 के बीच देवराज उर्स के मुख्यमंत्री रहते ज़बरदस्त बढ़ावा मिला.

कर्नाटक सरकार ने श्रीकांतदत्ता नरसिंहराज वॉडेयार के निधन के बाद दो दिन के शोक का ऐलान किया है.

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