क्या 'आप' सियासी शतरंज के कायदे बदल रहा है?

  • 13 दिसंबर 2013
आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी के गठन को अभी साल भर ही हुए थे कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस राजनीतिक दल ने 28 सीटें जीतकर चुनावी राजनीति में अपनी सियासी पारी शुरू कर ली. कई लोग 'आप' के इस कारनामे से हतप्रभ हैं.

राजनीति पर नजर रखने वाले लोगों को ये उम्मीद तो थी कि आम आदमी पार्टी को बड़ी तादाद में वोट मिलेंगे लेकिन सच कहा जाए तो कम ही लोग ये अंदाज़ा लगा पाए कि राजधानी दिल्ली की जनता इस नई बनी सियासी जमात पर इतना भरोसा दिखलाएगी. कई मायनों में ये जनादेश देश की उम्मीदों, आकांक्षाओं और नाराजगी भरे मिजाज़ की झलक पेश करता है.

दिल्ली के चुनावी मैदान में नंबर एक पर आई भारतीय जनता पार्टी भी है जिसे अपने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के साथ 32 सीटों पर जीत मिली है.

आम आदमी पार्टी ने अपने मतदाताओं की उम्मीदें जगाई हैं. 'आप' के समर्थक सत्ता की लगाम पार्टी हाथ में देखना चाहते हैं लेकिन मालूम पड़ता है कि दिल्ली का साबका एक और चुनाव से हो सकता है.

भाजपा ने दिल्ली में सरकार बनाने से किया इनकार

दिल्ली में त्रिशंकु जनादेश ने भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है. भाजपा और 'आप' जिम्मेदारी लेने से हिचक रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि ऐसा कदम लोकसभा चुनाव में उनकी संभावनाओं पर पानी फेर सकता है.

दोनों ही पार्टियाँ मानती हैं कि सरकार बनाने से लोकसभा चुनावों में उनके वोटरों पर असर होगा.

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गठबंधन न करने की ज़िद

आप लगातार यह कहती रही है कि वह कांग्रेस या भाजपा के साथ किसी भी प्रकार का गठबंधन नहीं करेगी और ऐसा करना दिल्ली के वोटरों के साथ विश्वासघात होगा.

भारतीय जनता पार्टी ने भी सरकार बनाने से साफ इनकार कर दिया है क्योंकि 70 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत हासिल करने के लिए पार्टी को कम से कम पाँच और विधायकों के समर्थन की ज़रूरत है. अकाली दल के एक विधायक और एक निर्दलीय विधायक की मदद से पार्टी 33 तक तो पहुँच सकती है लेकिन फिर भी पार्टी को तीन और विधायकों की ज़रूरत होती. दुर्भाग्यवश इस समय दिल्ली की स्थिति यह है कि सरकार बनाने के लिए आठ विधायकों तक सिमट गई कांग्रेस के समर्थन की ज़रूरत है. भाजपा या 'आप' दोनों ही पार्टियाँ कांग्रेस के समर्थन के बिना सरकार नहीं बना सकते. 'आप' गैर भाजपा और गैर कांग्रेसी तीन विधायकों के समर्थन से भी सरकार नहीं बना सकती. 'आप' ज़ोर देकर कहती रही है कि भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनानी चाहिए क्योंकि पार्टी के पास विधानसभा में सबसे ज़्यादा सीटें हैं. जबकि भाजपा ने साफ़ कर दिया है कि स्पष्ट बहुमत न होने के कारण वे भी विपक्ष में बैठना ज़्यादा पसंद करेगी. दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग ने भारतीय जनता पार्टी के नेता डॉक्टर हर्षवर्धन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था लेकिन उन्होंने भी स्पष्ट इनकार कर दिया है. सरकार बनाने के संवैधानिक मानदंडों के हिसाब से अब आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को सरकार बनाने का न्यौता दिया गया है. 'आप' के नवनिर्वाचित विधायकों ने अरविंद केजरीवाल को अपने विधायक दल का नेता चुना है. आम आदमी पार्टी में इस बात को लेकर भी बहस हो रही है कि क्या पार्टी को मुद्दों के आधार पर भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने के लिए समर्थन देना चाहिए या नहीं.

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अल्पमत सरकारें

'आप' के संस्थापक सदस्यों में से एक प्रशांत भूषण ने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा कि यदि बीजेपी लिखित रूप से यह वादा करती है कि वह 29 दिसंबर तक लोकपाल विधेयक पारित कर देगी और दिल्ली में जनसभाओं का आयोजन करेगी तो आम आदमी पार्टी अपने वादे पर अमल करते हुए बीजेपी को समर्थन देने पर विचार करेगी. प्रशांत भूषण तो अपने बयान से यह कहकर पलट गए कि वह व्यंग्यपूर्वक बातें कर रहे थे. हालाँकि अन्ना हज़ारे के आंदोलन के शुरुआती दिनों में केजरीवाल के समर्थक रहे बाबा रामदेव का कहना है कि आम आदमी पार्टी को कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना लेनी चाहिए. ऐसा नहीं है कि इससे पहले देश में अल्पमत सरकारें नहीं बनी हैं. देश की दोनों ही प्रमुख पार्टियाँ अब तक किसी भी तरह से सरकार बनाने के लिए हाथ पैर मारती रही हैं और इसके लिए वैध या अवैध सभी तरीक़ों का इस्तेमाल भी किया गया है. 1991 में कांग्रेस के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्ह राव की सरकार के पास बहुमत साबित करने के लिए सांसदों की पर्याप्त संख्या नहीं थी लेकिन अल्पमत में होने के बावजूद यह सरकार पूरे पाँच साल चली. उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार और अन्य राज्यों में भी गठबंधन राजनीति के आने के बाद अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाली पार्टियों ने साथ मिलकर और सभी तरह के प्रकट और गुप्त तरीक़ों का इस्तेमाल कर न सिर्फ़ सरकारें बनाई हैं बल्कि सरकारें बचाई भी हैं. अपनी अल्पमत सरकार को बहुमत में लाने के लिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने साल 2008 में ऑपरेशन लोटस किया था जिसके तहत उन्होंने कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के सात विधायकों को न सिर्फ़ इस्तीफ़ा देने के लिए राज़ी किया बल्कि उन्हें दोबारा भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़वाया और जितवाया भी.

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लोकसभा चुनाव पर नज़र

इस तरह के तरीक़ों का इस्तेमाल लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों ने किया है लेकिन नागरिक आंदोलनों की प्रखर भूमिका, दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी की कामयाबी और क़रीब आ रहे लोकसभा चुनाव ने राजनीतिक पार्टियों को सतर्क कर दिया है. इस परिस्थिति में राजनीतिक दल सावधान हैं और दिल्ली में ऐसे ग़लत तरीक़ों का इस्तेमाल कर सरकार बनाने से बच रहे हैं. अगले तीन-चार महीनों में लोकसभा चुनाव के साथ दिल्ली में उपचुनाव की संभावना और यह अस्पष्ट जनादेश आम आदमी पार्टी के लिए फ़ायदेमंद ज़्यादा साबित हो रहा है क्योंकि इससे पार्टी को अपनी क्षमता की परीक्षा देने से पहले कुछ और वक़्त मिल जाएगा. यदि 'आप' को स्पष्ट जनादेश मिल जाता तो पार्टी के सामने सरकार बनाकर अपने वादों को पूरा करने की चुनौती होती और मौज़ूदा अफ़सरशाही और प्रशासन के भीतर ही लोगों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील और ज़िम्मेदार शासन बनाने की ज़िम्मेदारी होती. इस प्रक्रिया में हो सकता है पार्टी के कुछ वोटर निराश हो जाते क्योंकि सरकार चलाना पार्टी बनाकर विपक्ष में बैठने से बिल्कुल भिन्न काम है. सत्ता में बने रहना राजनीतिक विरोधियों को हराने से ज़्यादा मुश्किल काम है. आम आदमी पार्टी ने व्यवस्था परिवर्तन के अपने वादे से लोगों की जनभावनाओं को फिर से उभार दिया है. पार्टी ने व्यवस्था में मौजूद भ्रष्टाचार को मिटाने का भी वादा किया है. पार्टी अब तक ईमानदार लोगों को चुनावी राजनीति में लाने की छवि बनाने में कामयाब हुई है. पार्टी ने ज़रूरी चीज़ों के दाम कम करने और बिजली का बिल पचास फ़ीसदी कम करने का वादा भी किया है. आम आदमी पार्टी ने यह साफ कर दिया है कि आगामी लोकसभा चुनाव में वह अपने उम्मीदवार उतारेगी. अब अगर दिल्ली के वोटर आम आदमी पार्टी को इस बार स्पष्ट बहुमत दे दें तब पार्टी के पास सरकार बनाने से बचने का कोई बहाना नहीं होगा और पार्टी को सत्ता ज्ञान सीखना ही होगा.

आगे की तैयारी

दिल्ली में ज़्यादा संभावना इस बात की है कि उप राज्यपाल के निर्देशन में सरकार का काम चले. इससे भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी दोनों के ही पास कांग्रेस की आलोचना करने के और भी मौक़े उपलब्ध हो जाएंगे. कांग्रेस पार्टी को पहले से सभी भ्रष्टाचार के जड़ और सभी समस्याओं की वजह का प्रतीक बना दिया गया है. लेकिन दूसरी ओर आम आदमी पार्टी के विधायकों को भी अपने क्षेत्र के लोगों की रोज़मर्रा की माँगों को सुनना और पूरा करना होगा जो कि आसान काम नहीं है. अनुभवहीन विधायकों के लिए यह बहुत मुश्किल काम होगा क्योंकि आदर्शवाद से ऊपर उठकर उन्हें भी राजनीतिक दाँवपेंच सीखने होंगे. सिर्फ़ आदर्शवाद से ही काम चलने वाला नहीं है. आम आदमी पार्टी को अगली चुनावी जंग की तैयारी भी करनी है. तीन या चार महीनों की छोटी सी अवधि में ही पार्टी को न सिर्फ़ दिल्ली बल्कि पूरे देश में चुनावी अभियान चलाने के लिए पैसों की ज़रूरत होगी. दूसरे शहरों से दिल्ली आकर चुनाव प्रचार करने वाले स्वयंसेवकों की ऊर्जा की भी पार्टी को ज़रूरत होगी. एक बार फिर से स्वयंसेवकों की इतनी बड़ी तादाद में मुफ़्त सेवा हासिल करना पार्टी के लिए मुश्किल काम ज़रूर होगा लेकिन यह असंभव नहीं दिख रहा है.

चुनौती

पिछले कुछ दशकों में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टियाँ न सिर्फ़ अस्तित्व में आईं बल्कि उन्हें सत्ता भी मिली लेकिन ये पार्टियाँ भी लोगों की उम्मीदों पर खरी उतरने में नाकाम रहीं. ये पार्टियाँ राजनीति के अनुभवी खिलाड़ियों के नेतृत्व में चलीं. इनके शीर्ष नेताओं के पास राजनीति की ज़मीनी हक़ीकत और दाँव-पेंच की समझ थी. राजनीति 'असंभव को संभव' करने की कला है, इस राजनीतिक जीवन के सिद्धांत पर चल रहे इन नेताओं के नेतृत्व में यह पार्टियाँ लंबी पारी खेल रही हैं. अभी तक 'आप' ने यह क़ाबिलियत नहीं दिखाई है. पार्टी के अब तक के बयान और घोषणाएँ रूढ़िवादी और अपने दृष्टिकोण में लचीले नहीं हैं. इनमें पार्टी के वादों को पूरा करने की कोई योजना दिखाई नहीं देती है. गुज़रे ज़माने के लोहियावादियों, भारतीय समाजवादियों, नक्सलवादियों और अराजकतावादियों की तरह ही आम आदमी पार्टी भी धन और संपदा के बराबर बँटवारों पर ज़्यादा जोर दे रही है और धन कैसे जुटाया जाए इसकी चिंता पार्टी को नहीं है. अब तक भ्रष्टाचार और महंगाई ही आम आदमी पार्टी के उत्थान का मुख्य कारण रहे हैं, जो किसी पार्टी के सरकार चलाने के लिए नाकाफ़ी हैं. पार्टी अब दृश्य में तो आ गई है लेकिन ऊपर किए गए विश्लेषण को ग़लत साबित करने के लिए पार्टी को खुद को साबित भी करना होगा. सिर्फ प्रदर्शन ही आम आदमी पार्टी का भविष्य तय करेगा.

क्या पार्टी एक ताक़त बनेगी या फिर एक दबाव समूह बनकर ही रह जाएगी यह तो भविष्य बताएगा लेकिन एक बात तो पक्की है कि आम आदमी पार्टी ने एक नई शुरुआत करते हुए राजनीति के नियम कायद़े बदल दिए हैं जिन्हें स्थापित राजनीतिक दल सिर्फ अपने जोख़िम पर ही नज़र अंदाज़ कर सकते हैं.

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