फ़िल्में जो कविताओं की ज़बान बोलती हैं

  • 14 दिसंबर 2013

'ग्रैंड मदर इस अ क्रैब' नाम की इस फ़िल्म के लिए क्लिक करें

फ़िल्में ज़िंदगी को तस्वीरों में बयां करती हैं और कविताएं ज़िंदगी की तस्वीर को शब्दों में पिरोती हैं, लेकिन क्या हो अगर अभिव्यक्ति के इन दोनों माध्यमों को मिला दिया जाए?

इन दोनों विधाओं से मिलकर जन्म लिया है ‘पोएट्री फ़िल्म्स’ यानी काव्य फ़िल्मों ने जो कोशिश है कविताओं को एक नई सरहद के पार ले जाने की.

दिल से कवि और पेशे से पूर्व पत्रकार रहे जितेन्द्र राम प्रकाश ने 2007 में ‘साधो पोएट्री फ़िल्म फेस्टिवल’ की शुरुआत की. इस साल ये फ़िल्महोत्सव दिल्ली में 11 और 12 दिसंबर को हुआ और इस मौके पर जितेन्द्र से लंबी बातचीत हुई.

'पीछे छूट गई कविताएँ'

जितेन्द्र कहते हैं, ''हमारा देश कविताओं के मामले में अनोखा है. हज़ारों साल से जितना भी चिंतन हुआ है हमारे यहां किसी भी क्षेत्र में वो कविताओं के मीटर में हुआ है..जो कहा हिंदुस्तानी मन ने वो कविताओं के माध्यम से कहा. लेकिन समय के साथ ये कविताएं कहीं पीछे छूट गईं. वो या तो साहित्यक दायरों तक सिमित रह गईं या कवि सम्मेलनों और मुशायरों के ज़रिए ही हम तक पहुंचती हैं.''

Image caption 13 साल के सिद्धार्थ सक्सेना की बनाई फिल्म चैल का एक दृश्य

संत कबीर ने कवि हृदय रखनेवालों को साधो कहकर 'पुकारा' और 'साधो' फ़िल्मोत्सव का मकसद एनिमेशन, ग्राफिक, संगीत, शार्ट फ़िल्म जैसे नए माध्यमों से जुड़े लोगों को कविताओँ से जोड़ना और एक नई तरह की विधा को आगे बढ़ाना है. साधो फ़िल्मोत्सव का नारा है ‘पोएट्री टू पीपुल’ यानी कविताओं को नए दर्शकों और नए सुनने वालों तक पहुंचाना.

काव्य फ़िल्में कई तरह की हो सकती हैं. वो फ़िल्में जिनकी पटकथा सीधे एक कविता हो, वो फ़िल्में जिनका विषय काव्य अनुभूति हो, वो फ़िल्में जो शब्दों के बजाय सांकेतिक भाषा के ज़रिए कविताओं को बयां करें और वो फ़िल्में जो कविताओं पर हो रही बहस से जुड़ी हों.

भारतीय मूल के अमरीकी काव्य फ़िल्मकार राम देवीनेनी की तीन फ़िल्मों को इस महोत्सव में शामिल किया गया. देविनानी कहते हैं, ''काव्य फ़िल्मों की सबसे बड़ी खूबसूरती ये है कि इन फ़िल्मों की पटकथा जो एक कविता है उसे हर कोई अपने हिसाब से पढ़ता और समझता है. इस फ़िल्म में दिखाए गए चलचित्रों के हर किसी के लिए अनगिनत मायने हैं.''

क्यों अलग हैं 'पोएट्री फ़िल्म'?

तो आखिर पोएट्री फ़िल्म आम फ़िल्मों से किस तरह अलग है.

देविनेनी के मुताबिक इन फ़िल्मों के केंद्र में हैं शब्द और वो भाषा जिसका इस्तेमाल कविता कहने के लिए किया गया है. कविता पढ़कर या सुनकर हमारे अवचेतन यानी ‘सबकॉंशियस माइंड’ में कई तरह के बिंब और भावनांए उमड़ती हैं. काव्य फ़िल्में अवचेतन मन के बिंब को आवाज़, तस्वीरों, संगीत, एनिमेशन के ज़रिए बयां करने का काम करती हैं.

इन फ़िल्मों को लेकर तरह-तरह के प्रयोग हो रहे हैं. मसलन रोमानिया की एक ‘द जगंल’ माइम कला और चॉक आर्ट के ज़रिए जंगलों पर हावी होते कंकरीट के जंगलों और आधुनिक मनुष्य की भेंट चढ़ते मूल निवासियों की बात कहती है.

रोज़मैरी नॉरमैन की फ़िल्म ‘ग्रैंड मदर इज़ ए क्रैब’ अपनी तरह की एक प्रयोगात्मक फ़िल्म है जिसमें शुरु से अंत तक मिरर इफ़ैक्ट का इस्तेमाल है. ये फ़िल्म केवल पांच शॉट्स के ज़रिए बनाई गई जिन्हें देखकर दर्शकों के दिलो-दिमाग़ में एक काव्यात्मक लय पैदा होती है.

संकेतों की अपनी भाषा

सांकेतिक भाषा में बनाई गई फ़िल्में भी काव्य फ़िल्मों का एक नया प्रयोग हैं. आमतौर पर जहां कविताओं को गूंगे-बहरे समुदाय के लिए सांकेतिक भाषा में अनूदित किया जाता है वहीं सांकेतिक भाषा में बनाई काव्य फ़िल्मों में पहले फ़िल्म के ज़रिए कविता बयां की जाती है और उसके बाद आम लोगों के लिए उसे शब्दों में ढाला जाता है.

'साधो' ने कविता कहने की परंपरा को आगे ले जाते हुए 'पोएट्री एलबम्स' की भी शुरुआत की है. इस साल फ़िल्मोत्सव की शुरुआत कुंवर नारायण की कविता ''अबकी बार लौटा तो..बृहत्तर लौटूँगा..'' की उनकी आवाज़ में रिकॉर्डेड एल्बम से की गई.

कुलमिलाकर इन फ़िल्मों को देखना और तस्वीरों में झलकती उनकी लय से गुज़रना एक अलग ही अनुभव है. सबसे खूबसूरत बात है कि फ़िल्म देखने के बाद, शब्द और तस्वीर दोनों आयामों में कविता कई घंटे आपके साथ रहती है.

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