कैसे हटाए जा सकते हैं गांगुली?

  • 13 दिसंबर 2013
महिला प्रदर्शन

महिला प्रशिक्षु वकील के साथ यौन उत्पीड़न के आरोपों में घिरे उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अशोक कुमार गांगुली को पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से बर्ख़ास्त करने की मांग ज़ोर पकड़ती जा रही है.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जस्टिस गांगुली को उनके पद से हटाने का औपचारिक अनुरोध राष्ट्रपति से किया है.

शुक्रवार को संसद में भी इस मामले की गूंज सुनाई दी और दोनों सदनों में जस्टिस गांगुली को बर्ख़ास्त करने की मांग उठी.

लेकिन संविधान विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि पीड़ित महिला की तरफ से कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई गई है, ऐसी स्थिति में जस्टिस गांगुली के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई कहां तक मुमकिन हो सकेगी.

हालांकि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की एक समिति ने जस्टिस गांगुली के ख़िलाफ़ अपनी ही एक इंटर्न के साथ अपमानजनक व्यवहार करने की प्राथमिक स्तर पर पुष्टि की है.

कार्रवाई

चूंकि जिस दिन ये घटना हुई, तब तक जस्टिस गांगुली अपने आख़िरी दिन का काम ख़त्म कर चुके थे. इस हालत में सुप्रीम कोर्ट उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता.

पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग की वेबसाइट के मुताबिक़ मानवाधिकार अधिनियम 1993 के तहत आयोग के अध्यक्ष या किसी सदस्य को उच्चतम न्यायालय की सिफ़ारिश पर केवल राष्ट्रपति ही हटा सकते हैं.

अगर आयोग के अध्यक्ष या किसी सदस्य के ख़िलाफ़ दुर्व्यवहार का आरोप लगता है या वो इसके योग्य नहीं है तो राष्ट्रपति की सिफ़ारिश पर उच्चतम न्यायालय अपनी जाँच करता है और अगर जाँच में आरोप सही पाया जाता है तो उच्चतम न्यायालय राष्ट्रपति से उसे हटाने की सिफ़ारिश करता है.

इसके अलावा राष्ट्रपति निम्न में से किसी भी वजह से आयोग के अध्यक्ष या सदस्य को हटा सकते हैं -

  • अगर वह दीवालिया घोषित हो जाए.
  • अगर अपने कार्यकाल के दौरान अपने कार्यालय के बाहर से आर्थिक लाभ पा रहा हो.
  • मानसिक या शारीरिक अक्षमता के कारण अपना कामकाज करने में सक्षम न हो.
  • अगर उसकी दिमागी स्थिति ठीक न हो और सक्षम अदालत में यह साबित हो.
  • अगर वह दोषी और सज़ायाफ्ता हो और राष्ट्रपति को लगता हो कि उसका ज़ुर्म नैतिक पतन के दायरे में आता है.

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