निर्भया मामला: 'मैं वहां था, क्या करता तो बच जाते?'

दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड के बाद हुए विरोध प्रदर्शन

आज से ठीक एक साल पहले की वो काली रात जब दिल्ली की एक चलती बस में 22 साल की लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार ने पूरे भारत को हिला दिया था.

देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये बहस का मुद्दा बना, भारत सरकार हरकत में आई, कानून सख़्त हुए और कुछ लोगों की माने तो इस जागृति का ही असर है कि अब बड़ी तादाद में महिलाएं अपने साथ घटी हिंसक घटनाओं के बारे में बताने के लिए खुलकर सामने आ रही हैं.

(क्या बच सकती हैं जिंदगियाँ)

दिल्ली गैंगरेप मामले में चार को फांसी की सज़ा हुई थी. एक अभियुक्त राम सिंह जेल में मृत पाया गया जबकि छठे नाबालिग़ अभियुक्त को जूवेनाइल बोर्ड ने तीन साल के लिए सुधार गृह भेज दिया था. लेकिन इस वीभत्स हिंसा के गवाह रहे निर्भया के दोस्त पर जैसे उस घटना का साया आज भी मंडरा रहा है.

उनके ही शहर में एक साल पहले मेरी मुलाकात घर पर हुई थी. सिर पर चोट के निशान, पैर में बंधा प्लास्टर दरिंदगी की कहानी कह रहा था. चेहरे पर सदमे के भाव साफ़ थे. उसी हालत में वो मकान के पहले माले से सीढ़ियों से नीचे उतरे.

कुर्सी पर बैठकर, अपने पांवों को एक स्टूल पर संभालते हुए रखकर साक्षात्कार देना आसान नहीं था क्योंकि शरीर के कई हिस्सों में अभी भी भीषण दर्द मौजूद था. एक साल पुराने उस साक्षात्कार की याद करते हुए वो कहते हैं, "ये रेडिया का शौक ही था जिसके कारण बीबीसी से बात हुई नहीं तो शायद मैं आपसे भी बात नहीं करता."

परिवार का दुख

लेकिन एक साल बाद भी उनसे बातचीत के लिए भेंट करना आसान नहीं था. हर कदम पर उनकी कोशिश थी अपने बारे में कम से कम जानकारी सरेआम करना. चाहे वो अपने काम करने की जगह हो या फिर दिल्ली में किराए के मकान का इलाका. वो इन बातों को गुप्त रखना चाहते थे.

जब उन्होंने बीबीसी स्टूडियो आने में असमर्थता जताई तो मैंने उनसे टेलीफ़ोन पर बातचीत करने की कोशिश की लेकिन दो बार कुछ शब्दों से बातचीत की शुरुआत के बाद जैसे तार-तम्य टूट गया और फिर आमने-सामने बैठकर बात करने पर रज़ामंदी हुई.

(सभी दोषियों को मौत की सजा)

बीते 365 दिनों में हर गुजरते दिन ने उन्हें उस रात की दरिंदगी का एहसास कराया है जो निर्भया ने महसूस किया होगा. वो कहते हैं, "जो मेरी दोस्त के साथ हुआ वो एक बुरे सपने की तरह था. घटना के बाद पुलिस स्टेशन जाना, अभियुक्तों की पहचान करना, अदालत जाना, परिवार का दुख बांटना, मेरे साथ जो कुछ हुआ वो बहुत चुनौतीपूर्ण था."

करीब एक घंटे चली इस बातचीत के दौरान कई बार ऐसा महसूस हुआ कि उनकी आंखें आँसुओं से भरी हैं और कभी भी वो रो पड़ेंगे. बात करते-करते उनका चेहरा लाल हो जाता था लेकिन उनके मुंह से शब्द बेहद संभलकर निकलते थे.

समाज में बदलाव

वो कहते हैं, "मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि मैं कुछ ऐसा नहीं करूं कि मैं कमज़ोर कहा जाऊं. दूसरों को कुछ कहने का मौका नहीं दूं. मैं कुछ ऐसा करके दिखाऊं कि लोगों का मेरे बारे में एक अलग नज़रिया बने." लेकिन खुद को मज़बूत दिखाने की कोशिश करने वाले इस व्यक्ति के लिए उस रात की घटनाओं को दिमाग से निकाल देना जैसे असंभव है.

(...बलात्कार की बात मानी)

वो कहते हैं, "उस रात की बातें हमेशा मेरे दिमाग में घूमती रहती हैं. 16 दिसंबर की रात के बाद जब भी मैं ऐसी किसी घटना के बारे में सुनता हूं तो मैं खुद को अपनी दोस्त से जुड़ा हुआ महसूस करता हूं. मुझे ऐसा लगता है कि जो निर्भया के परिवार के साथ हुआ, वो मेरे परिवार के साथ ही हुआ. इससे मुझे बहुत दुख होता है."

उनसे बात करते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि वो कहना बहुत कुछ चाह रहे हैं लेकिन मुंह से कुछ और निकल रहा हो. "मैंने कभी सोचा नहीं था कि इंसानो के बीच ऐसे लोग छिपे हैं जो इस हद तक जाएंगे, हमारे साथ अपराध कर सकते हैं, हैवानियत कर सकते हैं."

और शायद यही कारण है कि एमबीए और इंजीनियरिंग की डिग्री लिए हुए निर्भया के इस दोस्त ने अपना ध्यान काम पर बढ़ा दिया है. वो एक ग़ैर-सरकारी संगठन के माध्यम से समाज में बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं.

श्रद्धांजलि

लेकिन क्या वो मानते हैं कि गुज़रे एक साल में सही मायने में उनकी दोस्त की स्मृति के साथ न्याय हो पाया?

वो कहते हैं, "हम ऐसा कभी नहीं कह सकते कि निर्भया के साथ न्याय हुआ. व्यवस्था की गलतियों में हम सभी शामिल थे. उसमें हमारा भी उतना ही योगदान है. जब पहले गलतियां हुईं तो हम जगे नहीं और उसके बाद इतना बड़ा हादसा हो गया. सारी असफलताएं उस रात हुईं. आखिरकार उनकी मौत हो गई. लेकिन अगर हम ऐसी घटनाओं को दोबारा होने से रोक पाएं तो ये उनको श्रद्धांजलि होगी."

(...लेकिन मौत से हारी जंग)

दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद लिए गए सरकारी कार्रवाइयों और नेताओं के वायदों को लेकर वो आशावान नहीं हैं.

उनका कहना है, "मैं बदलाव को लेकर आशावान नहीं हूं, जैसा कि राजनेता मीडिया में जाकर वायदे करते हैं. निजी ज़िंदगी में बातें अलग होती हैं. इन्होंने जो बदलाव का आश्वासन दिया है वो नहीं होगा. वो ऐसे अनेकों मामलों के घटित होने का इंतज़ार करते रहेंगे औऱ वो हमारे साथ मज़ाक होगा तो मैं खुद अपनी मदद करने की कोशिश करता हूं और मैं समाज में दूसरों की मदद करने की कोशिश करता हूं."

सावधानी

निर्भया के इस दोस्त का मानना है कि जितनी प्रगति उनके मामले में हुई, उतनी दूसरी मामलों में नहीं हुई और ये दुख का विषय है.

घटना के बाद वो निजी तौर पर तो बहुत सावधानियाँ नहीं बरतते, चाहे वो रात में बस पकड़ने की बात हो या फिर घर से बाहर निकलना हो लेकिन वो अपने महिला दोस्तों को सावधानी बरतने के लिए ज़रूर कहते हैं.

लेकिन गुज़रे एक साल में जो बात उनके दिमाग को बार बार कुरेदती है कि क्या उस घटना को रोका जा सकता था?

वो कहते हैं, "अगर आपके साथ कोई दोस्त हो तो आप कभी नहीं चाहोगे कि उसके साथ कुछ हो जाए? एक बात जो हमेशा मेरे साथ रहती है कि मैं वहां था, शायद हम ये करते, हम वो करते, तमाम बातें दिमाग में आती हैं. दिमाग सोचता ही रहता है."

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