पाक उर्दू अखबार: भारत का पाक पर पोलियो प्रतिबंध, ख़तरे की घंटी

नरेंद्र मोदी, लाल कृष्ण आडवाणी

पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों में जहां महंगाई और भारत पाक रिश्तों के साथ बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी अब्दुल कादिर मुल्ला के नेता को फांसी देने की चर्चा रही तो भारत में विधानसभा चुनावों के नतीजों का विश्लेषण जारी है.

दिल्ली के चुनावी नतीजों पर राष्ट्रीय सहारा ने लिखा है कि कांग्रेस समझ रही थी कि मुसलमान वोट उससे दूर नहीं जाएगा लेकिन ये वो ये भूल गई कि मुसलमानों के मुद्दे भी आम लोगों की तरह हैं. अगर उन्हें कांग्रेस के अलावा कोई दूसरा विकल्प मिलता है तो वो उसकी तरफ जा सकते हैं.

(ताश खेल रहे थे ओबामा...)

अख़बार के अनुसार भ्रष्टाचार में डूबी हुई मौजूदा राजनीति से ऊब चुके लोगों ने आम आदमी पार्टी को मौका देने से गुरेज़ नहीं किया.

दैनिक सहाफ़त का संपादकीय है 'आडवाणी और मोदी.' अख़बार लिखता है कि चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में कामयाबी का श्रेय भाजपा कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी को दे रहे हैं लेकिन आडवाणी ने इसे मोदी लहर मानने से इनकार कर दिया.

अख़बार लिखता है कि आरएसएस के दवाब में आडवाणी ने अपनी ज़ुबान बंद कर ली थी लेकिन मोदी के उभार से जो चोट आडवाणी को लगी है, उसकी कसक उन्हें अकसर ज़ुबान खोलने पर मजबूर कर देती है. हालांकि वो अब जो कुछ कहते हैं, उसमें मोदी का नाम नहीं लेते लेकिन दिल का दर्द ज़ुबान पर आ जाता है.

मुल्ला को फांसी

हिंदोस्तान एक्सप्रेस के संपादकीय में इलाहाबाद हाई कोर्ट के हालिया फ़ैसले का ज़िक्र है जिसमें कहा गया है कि केंद्र की अनुमति के बिना यूपी सरकार आतंकवाद के आरोपों में चल रहे मुकदमे वापस नहीं ले सकती है.

अख़बार कहता है कि जांच एजेंसियां कुछ लोगों को गिरफ़्तार कर लेती हैं, कुछ दिन सनसनीखेज ख़बरें आती हैं और मीडिया की तरफ़ से ट्रायल शुरू हो जाता है लेकिन बरसों तक चार्जशीट भी दाख़िल नहीं होती. अगर मुकदमा चलता है तो कई साल बाद अमूमन ज़्यादातर युवा बरी हो जाते हैं. क्योंकि ये तो बेकसूर होते हैं या जांच एजेंसियों के पास सबूत नही होते हैं.

(निशाने पर होगा पाक)

अख़बार कहता है कि ऐसे में मुसमलानों में ये राय बनती है कि आतंकवाद के आरोपों में पकड़े जाने वाले ज्यादातर लोग बेकसूर होते हैं जो बहुत हद तक सही है.

रुख पाकिस्तानी अख़बारों की ओर करें तो बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी के नेता अब्दुल कादिर मुल्ला को फांसी दिए जाने पर नवाए वक्त ने लिखा कि युद्ध अपराधों के लिए सज़ा देना इंसाफ़ का तकाज़ा है लेकिन जहां अपराध के साथ किसी व्यक्ति की राजनीतिक प्रतिबद्धता को अपराध घोषित किया जाए तो यह सभ्य समाज की निशानी नहीं.

अख़बार के मुताबिक बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी पार्टी ने चुनाव प्रचार के दौरान बांग्लादेश के गठन का विरोध करने वालों के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई का वादा किया था लेकिन बांग्लादेश में पाकिस्तान दोस्ती को एक अपराध करार देना दोनों देशों के लिए चिंता की बात है.

कप्तान रिटायर

Image caption जस्टिस चौधरी पाकिस्तानी के अदालती इतिहास में दर्ज हो गए.

नवाए वक्त का कहना है कि निश्चित रूप से इससे भारतीय नेतृत्व ख़ुश होगी लेकिन पाकिस्तानी नेतृत्व का इस पर क्या रुख है, ये किसी को पता नहीं.

बीते हफ़्ते रिटायर होने वाले पाकिस्तान के चीफ जस्टिस इफ़्तिख़ार चौधरी के बारे में जंग ने लिखा है कि साल 2005 में जब उन्होंने अपना पद संभाला था तो उनकी पहचान एक मेहनती जज के रूप में थी. उनके आठ साल पांच महीने और दस दिन के कार्यकाल को दुनिया ऐतिहासिक और साहसी मानती है.

(खुफिया एजेंसियों का अड्डा)

अख़बार कहता है कि एक तानाशाह से टकराव, निलंबन और फिर दो बार बहाली और इसके अलावा न्यायपालिका की आज़ादी के लिए संघर्ष और कई ऐतिहासिक फ़ैसले, यही सब बातें हैं जिन्होंने जस्टिस चौधरी को न सिर्फ अदालती बल्कि देश के इतिहास का भी एक अहम किरदार बना दिया.

अख़बार ने लिखा है कि उन्हीं के रहते युसूफ रज़ा गिलानी को प्रधानमंत्री का पद गंवाना पड़ा था. दैनिक पाकिस्तान ने अपने पहले पन्ने पर जस्टिस चौधरी की तस्वीर के साथ इस ख़बर को सुर्ख़ी दी कि कप्तान इफ़्तिख़ार चौधरी चौके छक्के लगाकर रिटायर हुए.

दैनिक औसाफ़ ने लिखा है कि महंगाई के तूफ़ान कहाँ जाकर रुकेगा? अख़बार के मुताबिक़ जो प्याज पिछले हफ़्ते 70 से 80 रुपये किलो था वो अब सौ रुपये को छू रहा है. टमाटर इनसे भी चार हाथ आगे डेढ़ सौ रुपये प्रति किलो बिक रहा है. औसाफ़ कहता है कि अभी खाद्य पदार्थों के दामों को लेकर मातम ख़त्म नहीं हुआ था कि दवाओं की क़ीमतें बढ़ने की ख़बर आ गई.

क्षेत्रीय व्यापार

अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान शायद ऐसा मुल्क है जहाँ क़ीमतें बढ़ तो जाती हैं लेकिन कम नहीं होती हैं.

दैनिक आजकल का कार्टून भी कुछ ऐसा ही है जिस में पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज़ शरीफ के इस बयान को आधार बनाया गया है कि जमा खोरों के खिलाफ कार्रवाई होगी. लेकिन कार्टून में चिकन से भरी पूरी दुकान के सामने से पुलिस और सरकारी अफ़सर को नज़र बचाते दबे कदम खिसकते दिखाया गया है.

(जरदारी पर लग रही है शर्तें)

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की तरफ से एक बार फिर भारत के बेहतर रिश्तों की इच्छा जताए जाने पर दैनिक दुनिया लिखता है कि नवाज़ शरीफ़ जानते हैं कि दुनिया एक वैश्विक गाँव में तब्दील हो रही है लेकिन वक़्त गुजरने से साथ साथ वैश्विक व्यापार के मौके कम होते जा रहे हैं, इसलिए समस्या का हल क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देना है.

अख़बार के अनुसार प्रधानमंत्री शरीफ़ ये भी जानते हैं कि पड़ोसी देश के साथ अगर रिश्ते अच्छे हों तो क्षेत्रीय व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ाई जा सकती है. यही वजह है कि भारत की लगातार बेरुखी के बावजूद नवाज़ शरीफ़ अपने हाथों में ज़ैतून कि शाख थामे अमन का पैग़ाम दे रहे हैं.

भारतीय प्रतिबंध

रोज़नामा नवाए वक़्त का सम्पादकीय है कि 'भारत जाने वाले पाकिस्तानियों के लिए पोलियो का टीका लगवाना ज़रूरी.' अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान उन तीन देशों में शामिल है जहां पोलियो की महामारी का अब तक पूरी तरह से सफ़ाया नहीं पाया है.

अख़बार के मुताबिक अधिकांश विकसित देश पाकिस्तान को पहले ही चेतावनी दे चुके हैं लेकिन भारत वह पहला देश है जिसने पाकिस्तानी नागरिकों के लिए भारत जाने से 6 सप्ताह पहले पोलियो टीकाकरण प्रमाणपत्र देने प्रतिबंध लगाया है.

अख़बार के अनुसार भारत तो पाकिस्तानियों को वीजा देने के लिए पहले से ही बहाने बनाता रहा है और अब उसने नियमित वीज़ा के लिए एक और शर्त लगा दी है. अगर पोलियो पर वक्त रहते काबू न पाया गया तो अन्य देश भी पाकिस्तानी नागरिकों पर इसी तरह के यात्रा प्रतिबंध लगा सकते हैं. सरकार भारतीय प्रतिबंध को खतरे की घण्टी समझे.

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