बांग्लादेशः हिंसा जारी, दो और की मौत

Border Guard Bangladesh (BGB), बॉर्डर गॉर्ड बांग्लादेश, बीजीबी

बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी नेता अब्दुल क़ादर मुल्ला को फांसी दिए जाने के बाद हो रही हिंसा में कम से कम दो और लोगों की मौत हो गई है. मरने वाले जमात-ए-इस्लामी के समर्थक हैं.

क़ादर मुल्ला को फांसी देने के बाद हो रही हिंसक घटनाएँ अभी भी जारी हैं. उन्हें गुरुवार को फाँसी दी गई थी.

इसके ख़िलाफ़ जमात-ए-इस्लामी पार्टी के ने रविवार को बांग्लादेश में देशव्यापी बंद का आह्वान किया था.

बांग्लादेश के लालमोनीरहत इलाक़े में जमात-ए-इस्लामी समर्थकों के साथ पुलिस और सुरक्षा बलों की झड़प में जमात-ए-इस्लामी के दो समर्थकों की मौत हो गई.

पुलिस के अनुसार यह झड़प तब हुई जब पुलिस जमात समर्थकों को वाहनों में आग लगाने से रोकने की कोशिश कर रही थी. पुलिस के अनुसार जमात-ए-इस्लामी समर्थक रविवार को देशव्यापी बंद लागू कराने के लिए वाहनों में आग लगा रहे थे.

क़ादर मुल्ला की फाँसी के बाद हुए प्रदर्शन

इन प्रदर्शनों के दौरान सरकारी इमारतों और पुलिस थानों में आगजनी की गई.

क़ादर मुल्ला को बांग्लादेश के 1971 में पाकिस्तान से स्वतंत्रत होने के लिए हुए युद्ध के दौरान मानवता के विरुद्ध किए गए युद्ध अपराधों के लिए फांसी की सजा दी गई थी.

बांग्लादेश में मौजूद बीबीसी संवाददाता के अनुसार बांग्लादेश के स्वतंत्रता युद्ध में ज़्यादतियों के मामलों में न्याय के लिए व्यापक समर्थन है लेकिन अतंरराष्ट्रीय मानवाधिकार रक्षक समूहों ने इन कार्रवाइयों पर सवाल उठाया है.

गोलीबारी

स्थानीय पत्रकारों के अनुसार पुलिस और जमात-ए-इस्लामी के समर्थकों के बीच गोलीबारी भी हुई.

क़ादर मु्ल्ला को फांसी दिए जाने के शुरू हुई हिंसा में बाद कम से कम से 12 लोगों की मौत हो चुकी है. मरने वालों में ज़्यादातर जमात-ए-इस्लामी के समर्थक हैं.

क़ादर मुल्ला का अंतिम संस्कार शुक्रवार को उनके पैतृक शहर फरीदपुर में किया गया जिसमें उनके सैकड़ों समर्थक शामिल हुए.

मुल्ला उन पांच नेताओं में से हैं जिन्हें बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने फ़ांसी की सज़ा दी है.

इस न्यायाधिकरण की स्थापना 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान हुए अत्याचारों की जांच के लिए साल 2010 में की गई थी. कुछ अनुमानों के मुताबिक 1971 के अत्याचारों में 30 लाख लोगों की मौत हुई थी.

क़ादर मुल्ला को शुरुआत में आजीवन कारावास की सज़ा दी गई थी लेकिन बाद में उन्हें ढाका के उपनगर मीरपुर में निहत्थे नागरिकों और बुद्धिजीवियों की हत्या का दोषी पाया गया था.

इसके बाद हज़ारों प्रदर्शनकारियों ने मांग की थी कि उन्हें फांसी दी जाए. बांग्लादेश की संसद ने इसके बाद क़ानून में बदलाव किया ताकि सरकार इस न्यायाधिकरण के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील कर सके.

इसी साल सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला की सज़ा को फाँसी में बदल दिया था.

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