दिल्ली गैंगरेप: जो बन कर रह गए 'पीड़ित का परिवार'

निर्भया का परिवार

बीते साल दिसंबर में दिल्ली में 23 साल की एक छात्रा के साथ चलती बस में सामूहिक बलात्कार हुआ था. इसके बात विरोध-प्रदर्शनों की एक लहर उठी और भारत सरकार को ज़्यादा सख़्त बलात्कार विरोधी क़ानून बनाने पर मजबूर होना पड़ा.

दिल्ली की एक अदालत ने उस छात्रा पर हमला करने वालों को इसी साल सितंबर में फांसी की सज़ा दी है. बीबीसी के सौतिक बिस्वास ने पीड़ित के परिवार से मुलाकात की और जानने की कोशिश की कि उस छात्रा की मौत के बाद से उनकी ज़िंदगी कैसे बदल गई है.

16 दिसंबर 2012 की उस रात उसके पिता दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से 16 घंटे की शिफ़्ट के बाद थके हुए लौटे थे.

आधी रात से एक घंटा पहले उनके पास एक पुलिस वाले का फ़ोन आया कि उनकी बेटी एक हादसे की शिकार हुई है और उन्हें अस्पताल ले जाया गया है. एक घंटे बाद डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि उनकी बेटी से कुछ लोगों ने चलती बस में बलात्कार किया है.

दो हफ़्ते बाद उनकी बेटी की सिंगापुर के एक अस्पताल में मौत हो गई.

उनकी बेटी की मौत के बाद भारत गुस्से से उबल पड़ा, एक अख़बार ने सुर्ख़िया दीं, 'वेक अप इंडिया, शी इज़ डेड' यानी 'जाग जाओ, वो मर चुकी है'.

एक पल में उस परिवार की ज़िंदगी बदल चुकी थी.

'ग़रीबी ही अच्छी थी'

उस हमले के एक साल बाद उनका परिवार दिल्ली के एक उपनगर में, सरकार के दिए, दो कमरों के एक अपार्टमेंट में आ चुका है. रात हो चुकी है और सीढ़ियों पर लगे बल्ब अक्सर रात में काम नहीं करते लेकिन फिर भी ये ईंटों वाले पड़ोस के उस खस्ताहाल घर से तो बहुत बेहतर है जहां बारिश के दिनों में पानी कमरों में घुस जाता था.

दिल्ली का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा चलाने वाली निजी कंपनी ने पीड़ित के 54 साल के पिता को नया काम दे दिया है. अब वो हवाई अड्डे के एंट्री पास बनाते हैं और हर महीने उन्हें 20,000 रुपए वेतन मिलता है.

ये एयरपोर्ट पर उनकी पहले की कमरतोड़ नौकरी से तो बहुत अलग है: तब वो दो पालियों में काम कर के 6,620 रुपए हर महीने ही कमा पाते थे.

उनके दोनों बेटे, जिनकी उम्र 21 साल और 17 साल है, अब एक अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में और शहर के एक प्रमुख स्कूल में जाते हैं. उनकी फ़ीस सरकार चुकाती है. उनका बड़ा बेटा कम्प्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रहा है और छोटे बेटे की योजना डॉक्टर बनने की है.

फिर ये भी है कि उनका परिवार लगातार लोगों की निगाह में रहता है: पीड़ित छात्रा के माता-पिता न्यूज़ चैनलों पर आ चुके हैं और उनकी बेटी की याद में आयोजित अवॉर्ड समारोहों में शामिल हुए हैं, आस-पड़ोस में सभी जानते हैं कि "पीड़ित का परिवार" यहां रहता है.

इस छोटे से अपार्टमेंट में समृद्धि की कुछ निशानियां भी हैं: एक कमज़ोर सी टेबल पर एक छोटा टीवी रखा हुआ है, एक सस्ती वॉशिंग मशीन रखी है, एक गैस सिलेंडर है और बाथरूम में एक नया वाटर हीटर है.

पीड़ित के पिता मुझसे कहते हैं, "कभी-कभी मुझे लगता है कि ग़रीबी हमारे लिए ठीक थी. हम अच्छे से सोते थे. ख़ुश थे. आज, सब कुछ है लेकिन कुछ नहीं है. बेटी के बिना दुनिया बेरंग हो गई है."

वो आगे कहते हैं, "मैं कहा करता था, मेरी बेटी परिवार का इंजन है. हम सब डिब्बे की तरह थे जो उस इंजन से जुड़े हुए थे."

क्रीम ट्राउज़र और धारियों वाला भूरा स्वेटर पहने पीड़ित के पिता प्लास्टिक की एक कुर्सी पर बैठे हुए हैं, उनका चेहरा झुका हुआ है और नज़रें ज़मीन पर टिकी हैं. उनके हाथ उस व्यक्ति की तरह खुरदरे हैं जिसने कड़ी मेहनत की है: पहले प्रेशर कुकर बनाने वाली एक फ़ैक्ट्री में और फिर हवाई अड्डे पर सामान उठाने वाले के तौर पर.

सबकी निगाहों में

उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए बहुत मेहनत की है, दो पालियों में काम किया, परिवार की ज़मीन का एक टुकड़ा 200,000 रुपए में बेचा ताकि उनकी बेटी एक फ़िज़ियोथेरेपी कोर्स कर सके.

उनके फ़ोन की घंटी लगातार बजती रहती है, ज़्यादातर कॉल उन पत्रकारों के होते हैं जो परिवार से मिलना चाहते हैं. उनकी 46 साल की पत्नी, पीड़ित की मां, ने सुर्ख़ गुलाबी रंग की शिफ़ॉन की साड़ी पहन रखी है, वो दरवाज़े पर मीडिया के जमघट की ओर ताक रही हैं.

उनका छोटा बेटा बरामदे में अपने फ़ोन पर कुछ कर रहा है. इस ठंडे कमरे में सर्दी के सूरज की किरणें मुश्किल से पहुंचती हैं.

वो पीड़ित का कुछ सामान नए घर में लेकर आए हैं.

इस सामान में उसकी पसंद की गुलाबी गुड़िया भी है. पीड़ित की मां एक फ़ोटोग्राफ़र से कहती हैं, "तस्वीर के लिए मेरी बेटी को पलंग पर हमारे साथ रखिए."

न्यूरोलॉजी, न्यूरोसाइंस और मानव शरीर रचना की किताबों की फ़ोटोकॉपी भी इस नए घर में है, क्योंकि परिवार नई किताबों का खर्च नहीं उठा सकता था. लेकिन उसका छोटा भाई कहता है कि ज़्यादातर सामान पुराने घर में ही एक ट्रंक में रखा हुआ है. जहां उनकी बुआ रहती हैं.

वो कहते हैं, "उसके कपड़े, उसके नोट्स और उसके सपने".

इसे समझा जा सकता है. गहरे दु:ख के साथ जीना आसान नहीं होता.

दु:ख का हमला आवेग की तरह होता है जिसकी वजह से पीड़ित की मां पसीने में सराबोर हो जाती हैं जब उन्हें ये ख्याल आता है कि उनकी बेटी के साथ उस रात हमलावरों ने क्या किया होगा.

वो कहती हैं, "कभी-कभी मेरा दम घुटने लगता है."

दु:ख हर रविवार को भी आता है जब वो सिसकने लगती हैं क्योंकि इसी दिन पूरा परिवार सबसे अच्छा वक़्त बिताता था, इसी दिन उनकी बेटी पहली बार एक दोस्त के साथ अंग्रेज़ी फ़िल्म 'लाइफ़ ऑफ़ पाई' देखने गई थीं और कभी नहीं लौटी.

वो कहती हैं, "रविवार सबसे ज़्यादा मुश्किल होता है. मुझे अब भी लगता है कि वो आसपास ही है."

वो कहती हैं कि वो घर से ज़्यादा बाहर नहीं निकलतीं और बेटी की मौत के बाद से उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं ख़रीदा है. नींद न आने से वो बीमार रहने लगी हैं. कान में संक्रमण की वजह से एक मामूली सर्जरी की ज़रूरत है लेकिन उन्होंने ये सर्जरी नहीं करवाई है.

'एक सपना'

अब परिवार के पास सिर्फ़ उसकी यादें बची हैं, अच्छी और बुरी. और एक सपना.

पीड़ित की मां कहती है कि कैसे उनकी बेटी अपने पिता और भाइयों के साथ भविष्य की उम्मीदों पर रात-रात भर बातें करती थी. उन्हें डॉक्टरों के उम्मीद छोड़ देने के बाद आईसीयू में अपनी बेटी का बिताया आख़िरी समय याद है: पीड़ित का भाई कहता है कि परिवार उसके पलंग के पास खड़ा था जब "उसके दिल की धड़कन धीमी होती चली गई, ख़तरे की घंटियां बजने लगीं और आसपास लगे मॉनीटरों की रेखाएं सपाट होती चली गईं."

पीड़ित के पिता कहते हैं कि उन्हें अक्सर एक सपना आता है.

चमकती आंखों से वो कहते हैं, "वो अक्सर एक सपने में आती है, हम एक शहर के होटल में उसे देखने गए हैं. वो हम से मिलने आती है. वो मेरे पास खड़ी होती है और मुझसे पूछती है कि क्या आपको पैसों की ज़रूरत है. मैं कहता हूं कि मुझे पैसे नहीं चाहिए, बस अपने भाइयों का ख्याल रखना. और बस वो ग़ायब हो जाती है."

वो आगे कहते हैं, "वो हमेशा मुझसे कहती थी कि पैसों की फ़िक्र मत करना और कहती थी कि वो परिवार का ध्यान रखेगी."

वो कहते हैं कि ग़रीबी यही हाल कर देती है. हर वक़्त पैसों के बारे में सोचना होता है. ये सोचना होता है कि जेब में उतने पैसे हैं भी कि नहीं कि बेटी का शव घर ले जाया जा सके.

वो कहते हैं, "जब मैं एक दोस्त के साथ 16 दिसंबर की रात अस्पताल गया तो डॉक्टरों ने मुझसे कहा कि मेरी बेटी कुछ घंटों से ज़्यादा ज़िंदा नहीं रह पाएगी. मेरे दिमाग़ में पहली बात यही आई थी कि उसका शव घर कैसे ले जाऊंगा?"

वो आगे बताते हैं, "हम दोनों के पास कुल मिलाकर 1,000 रुपए थे. सवाल था कि क्या इससे दवाई और एंबुलेंस का खर्च निकल जाएगा? वो रात उसने काट ली. अगले दिन एक नेता आए और मुझे 25,000 रुपए दिए. मुझे थोड़ा ठीक महसूस हुआ. कम से कम मेरे पास इतने पैसे तो थे कि मैं उसका शव घर ले जा सकूं. ग़रीबी ये हाल करती है."

पीड़ित की मौत की पहली बरसी पर परिवार एक स्मृति सभा का आयोजन कर रहा है. उनकी योजना दान में मिले पैसों से ग़रीब बच्चों की पढ़ाई और खाने-पीने का इंतज़ाम करने के लिए एक ट्रस्ट बनाने की भी है.

पीड़ित के पिता कहते हैं, "हम बस इतना चाहते हैं कि जब तक हो सके उसकी याद ज़िंदा रह सके. मैं जानता हूं कि एक दिन लोग उसे भूल जाएंगे लेकिन वो याद रखेंगे कि उसकी मौत से बदलाव आया - बलात्कार विरोधी क़ानून में बदलाव आया और समाज में जागरुकता बढ़ी."

"महिलाएं शोषण और हिंसा के ख़िलाफ़ खुलकर बोल रही हैं. क़ानून का थोड़ा डर तो है."

"ये मेरी बेटी का योगदान है, है न?"

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