क्या मुसलमानों को बनानी चाहिए अपनी पार्टी?

  • 16 दिसंबर 2013
भारतीय मुसलमान

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में इंजीनियरिंग के छात्र अमीन अहमद, देवबंद में किताबों के एक बड़े प्रकाशक और विक्रेता नदीमुल वाजिदी, राज्यसभा में निर्दलीय सांसद मोहम्मद अदीब, इन तीनों में एक बात कॉमन है और वो ये कि ये तीनों भारत में मुसलमानों की मौजूदा आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक स्थिति के लिए सरकार के अलावा मुस्लिम नेतृत्व को भी ज़िम्मेदार मानते हैं.

अमीन अहमद कहते हैं, ''प्रजातंत्र की शर्त है कि जो संगठित होता है, उसी के पास राजनीतिक सौदेबाज़ी करने की ताक़त होती है. बदक़िस्मती से मुसलमानों की न आवाज़ है, न हमारे पास कोई राष्ट्रीय नेता है, न क्षेत्रीय नेता है.''

पढ़िए श्रृंखला की पहली कड़ी

कुछ इसी तरह की भावना व्यक्त करते हुए देवबंद के नदीमुल वाजिदी कहते हैं, ''मुसलमानों को मुन्तशिर (अलग-अलग) करने में हमारी लीडरशिप (नेतृत्व) का बहुत बड़ा किरदार है. जब तक ये लोग एक साथ मिलकर कोई फ़ैसला नहीं करेंगे उस वक़्त तक मुसलमानों का भला होने वाला नहीं है. सभी राजनीतिक पार्टियां ये अच्छी तरह जानती हैं, इसीलिए वो मुसलमानों का कोई काम करने को तैयार नहीं हैं.''

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राज्य सभा सांसद मोहम्मद अदीब कहते हैं, ''मुस्लिम क़यादत (नेतृत्व) में इतनी ताक़त नहीं है कि वो हुकूमत से ये कहें कि तुमने मुसलमानों से जो वादे किए हैं, उन्हें पूरा करो.''

आख़िर ऐसा क्यों हैं और क्या ये आरोप सहीं हैं?

इसका जवाब देते हुए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर असमर बेग कहते हैं कि भारतीय प्रजातंत्र में पार्टी सिस्टम है जिसमें व्यक्ति की नहीं, पार्टी की अहमियत होती है.

'मुस्लिम नेता या मुसलमानों के नेता'

प्रोफ़ेसर बेग के अनुसार, ''मुसलमानों का जो भी नेता होगा वो किसी पार्टी में होगा और हर पार्टी किसी न किसी सामाजिक समूह के हाथों में हैं. मुसलमान नेता उसमें अपनी बात ज़्यादा नहीं कह सकता है और अगर ज़्यादा कहेगा तो फिर वो बाहर हो जाएगा. उसके यहां कोई दूसरा मुस्लिम लीडर हो जाएगा.''

प्रोफ़ेसर बेग कहते हैं कि ''हर पार्टी में जो मुस्लिम हैं, वो इत्तेफ़ाक़ से मुसलमान हैं, वे मुसलमानों के नेता नहीं हैं. वो पार्टी मुसलमानों को ये दिखाने के लिए उनका इस्तेमाल करती है कि आपके लोग भी हमारी पार्टी में हैं.''

पढ़िए श्रृंखला की दूसरी कड़ी

इसका एक उदाहरण देते हुए प्रोफ़ेसर बेग कहते हैं, ''इसकी सबसे बड़ी मिसाल आज़म ख़ान (समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और अखिलेश सरकार में मंत्री) हैं. जो अभी हाल में मुज़फ़्फ़रनगर में दंगे हुए उसमें उनकी (आज़म ख़ान) आज़ाद सोच और मुसलमानों के लिए उनके दिल में जो राजनीतिक दर्द था वो सब खुलकर सामने आ गया. वो कुछ नहीं बोल पाए क्योंकि उन्हें पता है कि अगर वो ज़्यादा बोलेंगे तो उन्हें या तो पार्टी में हाशिए पर डाल दिया जाएगा या पार्टी से निकाल दिया जाएगा, दूसरा मुसलमान लीडर उसकी जगह आ जाएगा.''

Image caption देवबंद के नदीमुल वाजिदी के अनुसार मुस्लिम नेता ही समस्या की बड़ी वजह हैं.

लेकिन सवाल ये है कि क्या एक प्रजातंत्र में ये ज़रूरी है कि किसी जाति या धर्म का नेता उसी जाति या धर्म का हो?

सांसद मोहम्मद अदीब कहते हैं कि 1947 में बंटवारे के समय भारतीय मुसलमानों ने तो जिन्ना को ठुकरा कर गांधी और नेहरू को अपना नेता माना था, लेकिन अफ़सोस की बात है कि आज कांग्रेस अपनी ही विचारधारा को भूल गई है.

विभिन्न पार्टियों में शामिल मुसलमान नेता अगर मुसलमानों की उम्मीदों के अनुरूप खरे नहीं उतरे को क्या मुसलमानों को अपनी पार्टी बनानी चाहिए?

पढ़िए श्रृंखला की चौथी कड़ी

पिछले कुछ वर्षो में इस पर ख़ूब बहस भी हो रही है. असम में बदरूद्दीन अजमल ने साल 2006 में असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट (एयूडीएफ़) नाम से एक पार्टी बनाई और साल 2011 के विधान सभा चुनाव में उनकी पार्टी ने कुल 126 सीटों वाली विधानसभा में 18 सीटें जीतीं और कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी. अजमल ख़ुद भी असम के धुबरी से लोकसभा सांसद हैं.

ग़ौरतलब है कि असम में इस समय कांग्रेस की सरकार है, लेकिन अजमल की पार्टी ने राज्य में दो बार सत्ता में रह चुकी असम गण परिषद और एक समय में प्रदेश में अपनी मज़बूत पकड़ बना चुकी भारतीय जनता पार्टी को पीछे छोड़ दिया है.

एयूडीएफ़ की सफलता के बाद उत्तर प्रदेश में भी पीस पार्टी जैसी कुछ छोटी पार्टियों का गठन हुआ जिनको मोटे तौर पर मुसलमानों की पार्टी कहा जा सकता है.

Image caption प्रोफ़ेसर बेग के अनुसार धर्म के आधार पर पार्टी बनाने से मुसलमानों को नुक़सान होगा.

पीस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 2012 में हुए विधान सभा चुनाव में चार सीटें जीतीं थीं. ग़ौरतलब है कि केरल में मुस्लिम लीग और आंध्र प्रदेश में ऑल इंडिया इत्तेहादुल मुस्लिमीन जैसी पार्टियां 50 के दशक से सक्रिय हैं लेकिन उनका आधार प्रदेश के कुछ ही इलाक़ों में है.

एयूडीएफ़ और पीस पार्टी के बाद ये बहस तेज़ हो गई है कि क्या मुसलमानों को अपनी पार्टी बनानी चाहिए और क्या ये संभव है.

दारूल उलूम देवबंद के एक अध्यापक शाह आलम कहते हैं कि इस तरह की कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है.

मुस्लिम पार्टी?

असम का ज़िक्र करते हुए शाह आलम कहते हैं, ''असम में मुसलमानों का शोषण किया जा रहा था इसलिए वहां की ख़ास ज़़रूरत को पूरा करने के लिए बदरूद्दीन अजमल उठे और वो वहां काम कर रहे हैं. अब दूसरी तंज़ीमों को इससे सबक़ हासिल करना चाहिए.''

पढ़िए श्रृंखला की पांचवी और अंतिम कड़ी

लेकिन सच्चर कमेटी में ऑफ़िसर ऑन स्पेशल ड्यूटी रहे सेवानिवृत्त आयकर आयुक्त ज़फ़र महमूद इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते.

Image caption ज़फ़र महमूद भी मानते हैं कि मुसलमानों को अपनी पार्टी के बारे में नहीं सोचना चाहिए.

वो कहते हैं, ''भारत में मुसलमानों का जो भौगोलिक फैलाव है, उसको ज़ेहन में रखते हुए और यहां के संवैधानिक ढ़ांचे से जोड़ने के बाद मेरे ख़्याल में ये एक सफल मॉडल नहीं होगा कि मुसलमान अपनी पार्टी बनाएं.''

वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती की राय भी इससे मिलती जुलती है. वो कहती है, ''मुस्लिम लीग केरल तक सीमित हैं और वो भी कुछ ख़ास इलाक़ो में. इस तरह की पार्टियां राज्य स्तर पर विधान सभा चुनाव में रोल अदा करती हैं. राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की कोई पार्टी वोट ले पाएगी, ये बहुत बड़ा सवालिया निशान है.''

मुसलमानों की अलग पार्टी की संभावना से इनकार करते हुए एएमयू के प्रोफ़ेसर असमर बेग भी मानते हैं कि असम की तुलना देश के दूसरे राज्यों से नहीं की जा सकती है.

उत्तर प्रदेश की मिसाल देते हुए प्रोफ़ेसर बेग कहते हैं, ''यूपी में मुसलमान 18.5 फ़ीसदी ज़रूर हैं लेकिन एक-दो सीटों को छोड़कर कोई ऐसी सीट नहीं है जहां पर आप सिर्फ़ मुसलमानों के वोट से जीत सकते हैं. इसके अलावा जैसे ही आप मुस्लिम पार्टी बनाने की कोशिश करेंगे वैसे ही इसके ख़िलाफ़ साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण होगा.''

अपनी बातों को और स्पष्ट करने के लिए प्रोफ़ेसर बेग आज़मगढ़ लोकसभा सीट की मिसाल देते हैं. 1952 से 2004 तक आज़मगढ़ सीट पर कभी भी जन संघ या भाजपा का क़ब्ज़ा नहीं हो पाया था, लेकिन 2009 में पहली बार भाजपा ने यहां से जीत हासिल की.

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण

Image caption देवबंद के अध्यापक शाह आलम(दाएं) मानते हैं कि ऐसी पहल में कोई हर्ज नहीं.

इसका कारण बताते हुए प्रोफ़ेसर बेग कहते हैं, ''बटला हाउस मुठभेड़ (2008) के बाद एक पार्टी बनी राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल. इसके उम्मीदवार ने 2009 के लोकसभा चुनाव में आज़मगढ़ सीट पर चुनाव लड़ा और 60 हज़ार वोट हासिल किए जो कि सारे मुसलमानों के थे. इसके नतीजे में वहां से भाजपा जीत गई. इसलिए इससे फ़ायदा कम और नुक़सान ज़्यादा होता है.''

लेकिन ये कोई ज़रूरी तो नहीं कि किसी पार्टी को शुरूआती दौर में ही चुनावी सफलता मिल जाए. इसकी सबसे बड़ी मिसाल बहुजन समाज पार्टी है. बसपा का गठन 1984 में हुआ था और 2007 के चुनाव में पहली बार बसपा ने अपने दम पर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी.

इस सिलसिले में बसपा के संस्थापक कांशी राम का मशहूर वक्तव्य भी याद है. वो कहते थे, ''ये किसने कहा कि हर चुनाव जीतने के लिए लड़ा जाता है.''

बसपा को सफलता मिल सकती है तो एयूडीएफ़ या पीस पार्टी को वो सफलता क्यों नहीं मिल सकती, इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर बेग कहते हैं, ''भारत में सांप्रदायिकता एक सच्चाई है और इसकी एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है. इस कारण धर्म पर और ख़ासकर अल्पसंख्यक समुदाय पर आधारित राजनीतिक पार्टी बनते ही बहुसंख्यक समाज पर आधारित भाजपा जैसी पार्टी एक डर पैदा कर देंगी.''

प्रोफ़ेसर बेग के अनुसार, ''भाजपा जैसी पार्टी मुसलमानों के लिए कुछ किए बग़ैर तो इतना डर पैदा कर देती हैं कि मुसलमानों का तुष्टिकरण हो रहा है जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. अब अगर मुसलमानों की कोई पार्टी बन जाए तब पता नहीं क्या हाल होगा. इस चक्कर में जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होगा वो ज़्यादा ख़तरनाक होगा.''

मुसलमानों की अपनी पार्टी अगर कोई बेहतर विकल्प नहीं है तो फिर सवाल उठता है कि भारत की मौजूदा राजनीतिक स्थिति में मुसलमानों के लिए सबसे अच्छा अमल क्या है?

बेहतर रणनीति

इसके जवाब में प्रोफ़ेसर बेग कहते हैं, ''मुसलमानों के लिए सबसे बेहतर रणनीति ये है कि वो ख़ुद इसमें सीधे तौर पर शामिल होने के बजाए एक बैलेंसर (पासंग) का काम करें. अमरीका में रह रहे यहूदी कभी सोचते ही नहीं कि वो ख़ुद चुनाव लड़ें. भारत में भी मुसलमानों को सत्ता समीकरण को अपने पक्ष में झुकाने की कोशिश करनी चाहिए. जो मुसलमानों के साथ रहे या उनका काम करे मुसलमानों को उसी पार्टी के साथ रहना चाहिए.''

प्रोफ़ेसर बेग कहते हैं कि इसके लिए सबसे अहम ये है कि राजनीतिक मामलों में कम से कम मुसलमानों में एकता हो.

भारतीय मुसलमान 2014 के चुनाव से पहले कोई राजनीतिक पार्टी बनाएंगे या फिर रणनीति के तहत वोट डालेंगे इसका फ़ैसला तो उन्हें ही करना है लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में उनके क्या हैं सबसे बड़े मुद्दे जिनके आधार पर वे अपना राजनीतिक फ़ैसला करेंगे. इस पर चर्चा इस ऋंखला की अगली कड़ी में.

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