'अच्छा काम सिद्धांतों से होता है व्यस्तता से नहीं'

आशीष धवन, रेखांकन- अनीता बालचंद्रन

आशीष धवन सार्वजनिक कल्याण कोष सेन्ट्रल स्क्वेयर फ़ाउंडेशन के संस्थापक और सीईओ हैं. यह संस्था शिक्षा के क्षेत्र में काम करती है. वे क्रिस कैपिटल नामक एक निजी इक्विटी फ़र्म के सह-संस्थापक भी हैं. आज पढ़िए आशीष की कहानी जैसी कि उन्होंने मुझे बताई.

ख़ुद पर भरोसे ने बनाया तक़दीर का शहंशाह

मेरे नाना, नानी, दादा, दादी सभी लोग बंटवारे के दौरान लाहौर से दिल्ली आए थे.

मेरी माँ अपने छह भाई बहनों में सबसे बड़ी थीं और सबसे बड़ी होने के कारण उनका अनुशासित होना स्वाभाविक था. उनके मुकाबले मेरे पिता अपने आठ भाई बहनों में सबसे छोटे थे और एकदम आरामतलब और मस्त.

मुझे वो दिन याद है जब मैं सेंट जेवियर्स की प्रवेश परीक्षा में बैठा था. मेरे पसीने छूट रहे थे.

मेरी माँ एक लंबे अरसे से मुझे इस दिन के लिए तैयार कर रही थी. किस्मत से मैं वो परीक्षा पास कर गया. मेरी माँ के लिए इस रिपोर्ट कार्ड के नतीजे बहुत मायने रखते थे.

मेरे हिसाब से स्कूल में बच्चों के प्रदर्शन संबंधी जानकारी उनके माता-पिता को भेजना और इस बारे में बातचीत करना अच्छी बात है लेकिन हर हफ़्ते ऐसा करना बच्चों पर बहुत ज्यादा दबाव बना देता है. इन स्थापित मान्यताओं पर खरे उतरने का दबाव बच्चों को औसत बना देता है.

व्यवस्था का दबाव

इसका व्यवस्था का दबाव मैं इसलिए भी झेल पाया क्योंकि मेरी माँ ने मेरा बहुत साथ दिया.

मुझे क्विज में शामिल होने का भी शौक था. मैं वाद विवाद प्रतियोगिताओं में भी काफी समय बिताता था.

स्कूल के चुनावों में हाउस कैप्टन चुना गया. मेरा लक्ष्य था कि मेरा हाउस हर चीज़ में अव्वल आए.

हम लोग सामाजिक कार्यों में भी हिस्सा लेते थे और कई बार पुराने रद्दी पेपर और कपडे ज़रूरतमंद लोगों के लिए इकठ्ठा किया करते थे.

मैंने स्कूल की एक सौ पचीसवीं सालगिरह का आयोजन भी किया.

इस पूरे काम में एक आकर्षण और था और वो था हम जैसे ब्यॉज़ स्कूल के नौवीं क्लास के लड़कों के लिए कॉलेज के लड़कियों को निहारने का मौका.

इससे ज्यादा इस मामले में हमारी कोई और मंशा नहीं थी.

अमरीका में पढ़ाई

हमारे स्कूल में से एक लड़के का चयन येल यूनिवेर्सिटी में हो गया और मैंने तय किया (मेरे बाकी दोस्तों ने भी )कि मैं भी अमरीका पढ़ने जाऊँगा. मैंने अपने पूरे स्कूल में टॉप किया और मुझे येल में छात्रवृति के साथ दाखिला मिल गया.

येल यूनिवेर्सिटी के शुरुआती कुछ महीने मेरे लिए कठिन थे. मैं जिन हालात में था उनमें आप ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकते थे सिवाय फटी-फटी आँखों से हिन्दुस्तान और अमरीका के बीच के फ़र्क को ताकने के.

येल में पढ़ाई का अनुभव अद्भुत था. साहित्य कभी भी मेरा पसंदीदा विषय नहीं रहा था लेकिन वहाँ मुझे साहित्य की दुनिया में धकेला गया. मुझे इतिहास विषय से दिल से प्यार था. मैंने अपनी माँ से फोन पर कहा, 'मुझे इतिहास मेजर विषय के तौर पर पढ़ना है.'

वो बोलीं, ' नहीं, इतिहास पढ़ कर तुम क्या करोगे?' आखिरकार हम दोनों ने गणित और अर्थशास्त्र में डबल मेजर और इतिहास में माइनर मेजर पर समझौता कर लिया.

मैंने एक तो जॉन गिएनाकोप्लोस द्वारा पढ़ाया जाने वाला माइक्रो-इकोनोमिक्स कोर्स चुना. अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता जेम्स टोबिन भी मेरे अध्यापक रहे हैं.

अमरीकी बहुत समझदारी से धन का प्रबंधन करते हैं. बुद्धिमता में अमरीकी बाकी दुनिया से बहुत आगे हैं. यहाँ तक कि यदि मुझे आज भी अपनी सोच की धार तेज़ करनी होती है तो मैं कुछ दिनों के लिए न्यूयॉर्क का रुख कर लेता हूँ.

बैंक का कामकाज

वॉल स्ट्रीट मेरा लक्ष्य था. बतौर सलाहकार काम करना बड़ा सैद्धांतिक और उबाऊ था, बैंकिंग के काम में रोमांच था.

अपनी पहली नौकरी के दौरान मैं वॉल स्ट्रीट की बड़ी बड़ी हस्तियों से बेहद आकर्षित था. मैं उनसे वित्त बाज़ार की बारीकियां सीख रहा था इसलिए हफ़्ते में अस्सी-अस्सी घंटों का काम मुझे चुभता नहीं था.

हालांकि साल भर में जैसे-जैसे मैं अपने उन सीनियरों को करीब से जानने लगा वैस-वैसे उनके प्रति मेरा सम्मान कम होने लगा. उनमें से कुछ तो बहुत ही मूर्ख थे.

वो अपने सहकर्मियों के साथ बदतमीजी से पेश आते थे. वो लोग बहुत ही घमंडी और मतलबी थे. यह उनके दफ़्तर के छोटे पदों के लोगों के प्रति रवैये से ज़ाहिर होता था. वो अपनी पत्नियों के प्रति वफ़ादार नहीं थे.

उनके पारिवारिक सिद्धांत और संस्कार ज़मीन पर धूल चाट रहे थे. मुझे तीस साल बाद का अपना भविष्य उनमें दिख रहा था और मैंने तय किया की मैं ऐसी ज़िन्दगी नहीं जीना चाहता.

मैंने उस नौकरी से दो साल पूरे होने से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया.

हालाँकि मैं मानता हूँ कि किसी भी नए पेशेवर को सबसे बढ़िया प्रशिक्षण अमरीका में ही मिल सकता है. वहाँ हिन्दुस्तान के मुकाबले नए लोगों को ज्यादा महतवपूर्ण काम सौंपे जाते हैं.

बिज़नेस स्कूल का सबक

जब मैंने हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में जाना शुरू किया तो मेरा नज़रिया बदलना शुरू हुआ. मेरी नज़र में हिन्दुस्तान की तस्वीर भी बदलनी शुरू हो गयी.

मैं धीरे-धीरे और ज्यादा महत्वाकांक्षी और जोखिम उठाने वाला होता जा रहा था. उससे पहले तक मेरा ख़्वाब सिर्फ वित्त क्षेत्र में एक अच्छी नौकरी पा लेना था.

हार्वर्ड में मुझे अपने प्रोफ़ेसरों से कहीं ज्यादा अपने साथियों से सीखने को मिला. मैं हफ़्ते में छह रातें अपने साथियों के साथ बाहर बीयर पीता था.

इस दौरान मैं उनको करीब से देखता समझता था. मैं उनसे कहीं ज़्यादा स्वछंद और दिलेर होना चाहता था. उसी दौरान मन में एक ख़्याल घर कर गया कि मैं किसी दूसरे के लिए काम क्यों करूँ ? मैं अपना मालिक खुद क्यों नहीं बन सकता?

जब मेरी मुलाकात मेरी भावी पत्नी मनीषा से हुई तब मैं दिल्ली छुट्टियों पर आया हुआ था और दो हफ़्तों में वापस न्यूयॉर्क लौटने की तैयारी में था.

मैं एक ऐसा इंसान हूँ जो कभी दुविधा में नहीं रहता. यह विचारों की स्पष्टता मुझे एक बढ़िया निवेशक भी बनाती है.

कुछ ही दिनों बाद मेरे माता-पिता ने मुझे मनीषा के मामले में निर्णय लेने के लिए कहा और मैंने जवाब हां में दिया. मैं मानता हूँ कि माँ-बाप द्वारा तय की गयी शादियाँ सफल होती है.

शादी ने मुझे हिन्दुस्तान वापस लौटने और एक उद्यमी बनने के लक्ष्य का पीछा करने के लिए और ज्यादा विश्वास से भर दिया. धीरे-धीरे हमारी घर गृहस्थी जम गयी थी और मनीषा हमारी बड़ी बेटी के लालन-पालन में व्यस्त थी.

हमारा घर जम चुका था और हमारी जीवन शैली सीधी-सरल थी. ऐसे में ख़्याल आया कि क्यों न काम को लेकर जोखिम उठाया जाए?

भारत में कारोबार

भारत लौटने के समय मैंने अपने आप से कहा, ' मैं अपने देश वापस जा रहा हूँ. मैं वहाँ की गंदगी या भ्रष्टाचार को लेकर कुंठित नहीं होऊंगा.' साल 2001 में जब क्रिस कैपिटल अपने शुरुआती अट्ठारह महीनो में समस्याओं से गुज़र रही थी तब भी एक बार को भी मेरे मन में अमरीका वापस लौटने का ख़याल नहीं आया.

मैं इस बात को लेकर भी खुशकिस्मत हूँ कि मैंने अपने आप को भ्रष्टाचार की भेंट नहीं चढ़ने दिया. मैंने एक ऐसा व्यवसाय यानी निजी इक्विटी का काम चुना जिसमें लाइसेंस राज के सामने घुटने टेकने की ज़रूरत नहीं थी.

मैं काम में डूबा हुआ रहता था और और मुझे घर पर रहना पसंद था. मुझे दिल्ली शहर और उसमें ढली मेरी ज़िन्दगी की धीमी रफ़्तार भी पसंद थी.

मैं इस बात को लेकर शर्त लगा सकता हूँ की यदि यह तय कर लिया जाए की शाम को पांच बजे दफ्तर से निकलना है तो किसी न किसी तरह शाम पांच बजे तक काम ख़त्म करने का तरीका भी मिल ही जाएगा.

आप ऐसा किसी व्यापार को जमाने के शुरुआती सालों में नहीं कर सकते है लेकिन क्रिस कैपिटल में भी मैं कभी भी दफ्तर से निकलने वाला आखिरी व्यक्ति नहीं रहा.

मुझे अपने घर पर पर शाम 6 से शाम 9 के बीच परिवार के साथ बिताया वक़्त बहुत प्यारा है.

मैं दिन में एक घंटा कसरत करना पसंद करता हूँ. मैं पाने माता-पिता के साथ वक़्त बिताना चाहता हूँ.

मैं अपने बच्चों के साथ होना चाहता हूँ. अमरीकी संस्कृति की व्यस्तता मेरे लिए नहीं है. अच्छा काम सिद्धांतो से होता है व्यस्तता से नहीं.

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