जो 'डेथ सर्टिफ़िकेट' ले कर इलाज को तरस रहा है

एड्सपीड़ित

गंडक नदी के तटबंध के किनारे बसा है मेहां गांव. बिहार के इसी गांव में हम बीमार बलराम कुमार (बदला हुआ नाम) से मिलने पहुंचे. पहुंचने पर पाया कि वह अपने कच्चे मकान के सामने आंगन में धूप में लेटे हुए थे. पत्नी सुनीता देवी उनकी देख-भाल करने में लगी थीं.

बलराम कुमार देश के उन लाखों एचआईवी संक्रमित मरीजों में से एक हैं जिन्हें इलाज के दौरान गंभीर भेदभाव का शिकार होना पड़ता है.

लेकिन इन दिनों वह कुछ और वजहों से चर्चा में हैं.

पिछले महीने के अंत में सरकारी अस्पताल ने जीवित होने के बावजूद उन्हें मृत करार दिया था.

मेंहा बिहार के बेगूसराय शहर से लगभग चालीस किलोमीटर की दूरी पर बसा है. मूल रूप से इसी गांव के रहने वाले बलराम गुवाहाटी में मजदूरी करते थे. लगभग पांच महीने पहले जब वह बीमार पड़े और जल्द ठीक नहीं हो पाए तो घर वापस आ गए.

यहां अक्टूबर में पता चला कि वह एचआईवी संक्रमित हैं. इसके बाद 11 नवंबर को इलाज के लिए वह फिर से बेगूसराय के ज़िला अस्पताल में भर्ती हुए. उनके परिजनों के मुताबिक वहां उनका इलाज अनमने ढंग से चलता रहा.

उनकी पत्नी सुनीता देवी ने बताया, "कोई डॉक्टर उनके पति को छूकर जाँच नहीं करता था. पूछने पर कहा जाता था कि दिल्ली से डाक्टर आएँगे तभी जाँच होगी."

इलाज की जगह मृत्यु प्रमाण पत्र

इसी दौरान पिछले महीने 26 नवंबर को बलराम की तबीयत जब बहुत बिगड़ी तो अस्पताल में मौजूद उनके भाई सुनील कुमार राम ने ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर गोपाल मिश्रा से संपर्क किया.

मगर सुनील के अनुसार जाँच और इलाज करने की जगह डॉक्टर गोपाल ने उनके भाई के शिथिल पड़े शरीर को दूर से ही देखकर कहा कि उनकी मौत हो गई है और कुछ ही देर बाद मृत्यु प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया.

हालांकि इस दौरान बकौल सुनील वह बार-बार डॉक्टर को यह बताने की कोशिश करते रहे कि उनके भाई की सांसें चल रही हैं.

मृत्यु प्रमाण पत्र दे दिए जाने के बाद उनके पास घर लौटने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था. वे बलराम की ‘लाश’ लेकर गांव लौटे.

अस्पताल से घर लौटने के बीच के दर्दनाक लम्हों को याद करते हुए सुनीता ने बताया कि उनके पति जिंदा थे लेकिन डाक्टर द्वारा सर्टिफिकेट दे दिए जाने के कारण उनके लिए यकीन करना मुश्किल हो रहा था.

घर पहुंचने पर बलराम ने न सिर्फ आंखें ही खोलीं बल्कि उन्होंने तरल भोजन भी लिया. इसके बाद सबको उनके जीवित होने को लेकर तसल्ली हुई.

हजारों का कर्ज

बलराम जीवित तो हैं लेकिन उनका परिवार अब दूसरी परेशानियों से जूझ रहा है. सरकारी अस्पताल पर यक़ीन खत्म होने के बाद परिजन अब उनका इलाज बेगूसराय में एक निजी डॉक्टर से करा रहे हैं. ऐसे में वह अब हज़ारों रुपए के कर्ज के बोझ तले दब गए हैं.

साथ ही बलराम की स्थिति को देखते हुए ऐसा नहीं लगा कि उनकी हालत में कोई बहुत सुधार हुआ हो. वह बोल नहीं पा रहे थे और बहुत ही कमजोर दिखाई दे रहे थे.

मीडिया में मामला उछलने पर ज़िला चिकित्सा पदाधिकारी डॉक्टर सोना लाल ‘अकेला’ ने अपने नेतृत्व में मामले की जांच के लिए एक चार सदस्यीय समिति का गठन किया था. इस समिति ने डॉक्टर गोपाल मिश्रा को गलत मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का दोषी पाया है.

इस संबध में डॉक्टर सोना लाल ‘अकेला’ ने बताया, ''हमने जांच से सामने आये तथ्यों के आधार पर स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को उचित कार्रवाई के लिए पत्र लिखा है."

वहीं दोषी चिकित्सक डॉक्टर गोपाल मिश्रा की प्रतिक्रया दूसरी थी.

उन्होंने चिकित्सा विज्ञान की बारीकियों के सहारे अपना पक्ष रखते हुए कहा कि एड्स जैसी कभी ठीक नहीं होने वाली बीमारियों में शरीर की स्थिति बहुत जीर्ण-शीर्ण हो जाती है और ऐसे में कई बार शरीर प्रसुप्त अवस्था (सस्पेंडेड एनिमेशन) में चला जाता है.

प्रमाण पत्र

अपनी सफ़ाई में उन्होंने कहा, "ऐसे में मरीज़ की धड़कनों को सुनने और शारीरिक स्थिति की जांच करने पर भी कई बार ऐसा लगता है कि मरीज की मौत हो चुकी है. बलराम की शारीरिक स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी और ऐसे में मैंने मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किया."

उन्होंने इस आरोप से इनकार किया कि प्रमाण पत्र जारी करने के पहले उन्होंने मरीज की जांच नहीं की थी.

वहीं इस पूरे मामले में एक और पेंच भी सामने आया है. पिछले दिनों डॉक्टर गोपाल ने एक अज्ञात नंबर से धमकियां मिलने का मामला बेगूसराय सदर थाने में दर्ज कराया है. बकौल डॉक्टर गोपाल उन्हें बाद में यह जानकारी मिली कि यह ‘अज्ञात नंबर’ बलराम के साले मंटुल कुमार का है.

इस संबंध में मंटुल कुमार की सफ़ाई यह थी कि उन्होंने अपने फ़ोन से कभी कोई धमकी डॉक्टर गोपाल को नहीं दी है और फ़ोन कॉल-रिकॉर्ड की जांच से यह बात सामने आ जाएगी.

इस बीच स्थानीय पत्रकार शशिरंजन कुमार के अनुसार गलत मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का मामला सामने आने के बाद पूरे इलाके में लोग न सिर्फ हैरान हैं बल्कि उनमें डाक्टरों के प्रति गुस्सा भी है.

इलाके के लोगों का मानना है कि भगवान माने जाने डाक्टरों में से एक ने ऐसा कर बहुत ही घृणित कार्य किया है.

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