गैंगरेपः छात्रों का ठंड, आंसू गैस झेलना क्यों असामान्य था?

दिल्ली बलात्कार, दिसंबर, निर्भया

वह आँसू गैस से खांस रही थी, वॉटर टैंक से फेंके गए पानी में बुरी तरह से भींगने के कारण कँपकँपा रही थी, रायसीना हिल्स की पहाड़ियों पर हो रहे प्रदर्शन से लड़खड़ाकर बाहर गिर रही उस लड़की ने कहा, "वो समझते ही नहीं हैं."

पिछले साल दिसंबर में दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद हुए प्रदर्शनों का पहला दिन था. उसमें हज़ारों लोग शामिल हुए थे, जिनमें छात्रों की बड़ी संख्या थी. ये सभी अपनी सरकार से पीड़ित लड़की के लिए न्याय की मांग कर रहे थे.

जिस लड़की ने इस विरोध प्रदर्शन को चिंगारी दी थी उसकी मृत्यु हो चुकी थी. घटना से पहले वह लड़की 'द लाइफ़ ऑफ पाई' फ़िल्म देखने गई थी. अपने पुरुष मित्र के साथ घर वापस आने के लिए उसने बस तो पकड़ी लेकिन वह कभी उस मंज़िल तक नहीं पहुँच सकी.

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प्रदर्शन में शामिल वह लड़की एक बार फिर से ज़ोर से खांसी और दिल्ली में सरकारी सत्ता के प्रतीक नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक की इमारतों की तरफ इशारा करते हुए कहा, "वो समझते ही नहीं हैं. उनके बच्चे बस में नहीं चढ़ते. वे नहीं समझते कि हम क्या चाह रहे हैं."

वह दिल्ली के बाहरी इलाके के एक कॉलेज में पढ़ती थी. उसे अपनी पीढ़ी के उन लोगों के बारे में कुछ जानकारी थी जो प्रभावशाली वर्ग को मिलने वाली सुविधाओं से वंचित है. उन्हें इतना जेब खर्च नहीं मिलता है कि वे कहीं आने जाने के लिए टैक्सी का इंतजाम कर सकें.

रक्षा और सम्मान

दिल्ली में हुए प्रदर्शन असामान्य नहीं थे क्योंकि दैनिक जीवन में होने वाली रोज़मर्रा की छेड़छाड़ के ख़िलाफ़ इस बार महिलाएँ सड़क पर आ गईं थीं. ऐसी छेड़छाड़ भारत के किसी भी हिस्से के लिए आम बात है. (उसी साल अक्तूबर में दिल्ली के पड़ोसी राज्य हरियाणा में महिलाओं ने पुलिस के ख़िलाफ़ अपना ग़ुस्सा खुलकर जाहिर किया और राज्य में बढ़ती बलात्कार की घटनाओं और उनके प्रति सरकार की बेरुख़ी का विरोध किया.)

ये असामान्य इसलिए थे क्योंकि ठिठुरन भरे मौसम में सड़क पर जो छात्र इकट्ठा थे वे उस शहर की आवाज़ बन रहे थे जो अब तक एक उदासीन और महिलाओं के उत्पीड़न तथा हिंसा वाले शहर के रूप जाना जाता था. ये सब यह कहने के लिए सड़कों पर आए थे कि 'अब बस'. कइयों ने अपने हाथ में 'अब बस' की तख्ती भी ले रखी थी. ये लोग सुरक्षा की नहीं, स्वतंत्रता की मांग कर रहे थे.

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यह मांग वे अगले कई महीनों तक सड़कों, कॉलेज कैंपसों और साकेत से होकर जाने वाले रास्ते पर एक पुराने नारे के रूप में करते रहे, 'हम क्या चाहते, आज़ादी.'

दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी रहीं कविता कृष्णन कहती हैं, "हम मानते हैं कि चाहे घर हो या बाहर, चाहे दिन हो या रात, उसने चाहे जिस तरह के भी कपड़े पहने हों, महिलाओं के पास आज़ादी से रहने का अधिकार है और हमें इसी अधिकार की रक्षा और सम्मान करना है."

अगले कई महीनों तक यह नारा हमें अक्सर सुनने को मिला. ''दुनिया से चाहते- आज़ादी, घरों में चाहते आज़ादी, गलियों में चाहते आज़ादी. बेडरूम में चाहते आज़ादी. हर जगह हम चाहें आज़ादी."

तीखी प्रतिक्रिया

इस विरोध प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ तीखी प्रतिक्रिया हुई. राजनेता और धार्मिक गुरू यहाँ तक कि पुलिस अफ़सर एक सुर में प्रतिकूल टिप्पणी कर रहे थे.

इन सबके अनुसार बलात्कार की घटनाएं इसलिए बढ़ रही थीं क्योंकि औरतें ज़्यादा आज़ादी चाहती हैं, क्योंकि इस नए, पश्चिमी चाल-चलन के कारण और पुराने परंपरागत मूल्यों के बीच टकराहट बढ़ी है, क्योंकि महिलाएँ ग़लत ढंग के कपड़े पहनती हैं, डेंटेंड-पेटेंड होकर घर से निकलती हैं, सीमाओं का सम्मान नहीं करतीं.

इस साल की शुरुआत में जस्टिस वर्मा कमीशन ने महिला सुरक्षा पर एक रिपोर्ट दी. यह रिपोर्ट बहुप्रतीक्षित महिला समानता की मांग के मुखर घोषणा पत्र सरीखी थी.

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बलात्कार का सम्मान से कोई लेना-देना नहीं. न्याय-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार संस्थानों ने अक्सर यौन हिंसा करने वालों की ही रक्षा की. भारतीय दंड संहिता कमोबेश पितृसत्तावादी है जो महिलाओं, लेस्बियन, गे और बाइसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) को कमतर समझती है.

इस कमीशन के सुझाव ठोस थे और अमली कार्रवाई का विस्तृत ब्यौरा था. जब पत्रकार नमिता भंडारे ने जस्टिस वर्मा कमीशन का समर्थन करने के लिए 'स्टाप रेप नाओ! याचिका पर हस्ताक्षर अभियान शुरू किया तो उन्हें 3,19,000 हस्ताक्षर मिले.'

इस रिपोर्ट को उसी तरह दफ़न कर दिया गया जैसे कि अगले एक साल के अंदर संस्थानिक सुधारों की अन्य मांगों को ठुकराया या दरकिनार किया जाता रहेगा. वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने की मांग को संसद ने इस आधार पर ठुकरा दिया कि इससे भारतीय परिवार और घर अस्थिर हो जाएंगे. बलात्कार और यौन हिंसा करने वाले राजनेताओं पर कार्रवाई का प्रयास विफल रहा.

सत्ता के शीशमहल

सत्ता प्रतिष्ठानों ने वही किया जो उन्होंने पिछले साल दिसंबर में किया था. उन्होंने बाहर हो रही उथल-पथल से बेपरवाह होकर अपने आप को शीशमहल में बंद कर लिया.

लेकिन पिछले साल दिसंबर में कुछ और भी बदल रहा था और उसका राज्य या क़ानून से ज़्यादा लेना-देना नहीं था. धरने-प्रदर्शन धीरे-धीरे सुस्त पड़ गए लेकिन प्रतिरोध करने वालों की आवाज़ ज़्यादा मज़बूत हो गई.

दिल्ली समेत पूरे देश में महिलाओं, प्रगतिशील पुरुषों और एलजीबीटी समुदाय के बीच एक नए तरह की एकता विकसित होनी शुरू हुई. एक नया जैविक एकता सूत्र बनना शुरू हुआ.

'इस बार यौन हमले की पीड़िता शर्मसार नहीं'

पुराने, रूढ़ पितृसत्तात्मक मूल्यों पर सवाल उठाना, सुरक्षा और बचाव की बजाय स्वतंत्रता और समानता की मांग ने सभी वर्गों की महिलाओं और पुरुषों को एक-दूसरे से जोड़ा.

इस घटना से पहले जहाँ कुछेक नारीवादी ही मुख्यधारा में मुखर थीं अब ढेरों महिलाएं, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता, गृहणियां केवल एक विश्वास के आधार पर एक साथ आ रहे थे कि अब वो समय आ गया है कि हम अपने जीने के तरीके को बदलें.

जब 11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अप्राकृतिक यौन संबंधों, जिसमें समलैंगिक संबंध भी शामिल हैं, को फिर से आपराधिक घोषित करने वाला निराशाजनक फ़ैसला दिया तो एलजीबीटी समुदाय में उपजा क्षोभ और ग़ुस्सा केवल उन्हीं तक सीमित नहीं रहा. जैसा कि इतने सालों से असमानता और हिंसा को रोकने की मांगों के साथ जो होता आया है वही एक बार फिर हुआ. एक अन्य प्रमुख भारतीय संस्था ने हमें निराश किया.

शहर की नई हवा

लेकिन शहरी भारत में हवा में एक बदलाव ज़रूर था, ख़ासकर दिल्ली में.

फ़ैसले के कुछ देर बाद ही विरोध और परिवर्तन के लिए आह्वान होने लगे. जैसा कि दिसंबर, 2012 में दिल्ली में हुआ था, देश के सभी नागरिकों, महिलाओं, एलजीबीटी समुदाय के सदस्यों के बिना भय के ससम्मान जीने के अधिकार, न्याय और समानता की मांग होने लगी.

बॉलीवुड ने 'बलात्कार' को सस्ता बना दिया?

बलात्कार की समस्या आंकड़े नहीं हैं. संख्या के लिहाज़ से देखें तो भारत में 'बलात्कार की समस्या' अमरीका समेत तमाम पश्चिमी देशों से ज़्यादा नहीं है लेकिन भारत में 'अधिकारों की समस्या' है. वर्मा ने इसे समझते हुए ही कहा था कि भारत में दूसरे स्वतंत्रता आंदोलन की ज़रूरत है, औरतों के लिए.

एक साल बाद भी उस नारे की गूंज भारतीय संस्थाओं की असुविधाजनक प्रतिक्रियाओं, नेताओं और अधिकारियों के विरोध से दबी नहीं है.

निजी जीवन में अपनी यौन पसंद, कार्यस्थलों पर सम्मान पाने के अपने अधिकार, गलियों में बिना भय के घूमने की आज़ादी ही वह आज़ादी है जिसकी मांग भारत की नई पीढ़ी कर रही थी.

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