क्या पहुँच से बाहर हो जाएगा लक्ज़री कंडोम?

कंडोम

हो सकता है कि भारतीय मर्दों को नए साल में अपने पसंदीदा कंडोम के बिना काम चलाना पड़े.

ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार ने कंडोम की क़ीमतों को नियंत्रित करने का आदेश जारी किया है. ऐसे में लक्ज़री कंडोम भारतीय बाज़ारों से किनारा कर सकते हैं. यह फ़ैसला शुक्रवार से लागू होगा.

भारत में लक्ज़री कंडोम का बाजा़र काफ़ी तेज़ी से बढ़ रहा है और देश में हर साल क़रीब 1.8 अरब कंडोम की बिक्री होती है, लेकिन अब इस रफ़्तार पर लगाम लग सकती है.

दरअसल सरकार ने इस साल तैयार 'अनिवार्य दवाओं' श्रेणी में कंडोम को भी शामिल किया है और नए सरकारी आदेशों को मुताबिक़ एक कंडोम की क़ीमत सभी करों सहित 6.56 रुपए से अधिक नहीं हो सकती है.

हालांकि भारतीय बाज़ारों में आज एक लक्ज़री कंडोम की क़ीमत 25 रुपए से 150 रुपए के बीच है और भारतीय पुरुष अपने पसंदीदा ब्रांड के लिए जेब ढ़ीली करने को तैयार हैं.

अदालत में मामला

इस महीने की शुरुआत में दो लोकप्रिय कंडोम ब्रांड के निर्माताओं ने कंडोम की क़ीमत तय करने के इस फ़ैसले को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय में सरकार के इस निर्णय पर रोक लगाने की अपील की.

Image caption कंडोम की क़ीमय तय करने के सरकार के फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी गई है.

अदालत को इस मसले पर अपना फ़ैसला देना है.

एक प्रमुख दवा कंपनी रेकिट बेंकाइजर (इंडिया) की दलील है कि इतनी कम क़ीमत तय करने से बड़ी कंपनियों को अपना उत्पादन बंद करना पड़ेगा और ऐसे में इसका नकारात्मक असर जनसंख्या नियंत्रण के उपायों पर होगा.

रेकिट बेंकाइजर 'ड्यूरेक्स' ब्रांड नाम से कंडोम बनाती है.

कंपनी का कहना है कि कंडोम 'दवा' नहीं बल्कि 'डिवाइस' की श्रेणी में आता है, इसलिए कंडोम को दवा मूल्य नियंत्रण आदेश के दायरे में लाया ही नहीं जा सकता है.

सरकार का पक्ष

सरकार के वकीलों का हालांकि कहना है कि कंडोम से यौन रोगों की रोकथाम में मदद मिलती है, इसलिए वो जाहिर तौर पर 'दवाओं' की श्रेणी में आते हैं, और इसलिए सरकार उन पर नियंत्रण लागू कर सकती है.

भारत में दवा की क़ीमतों को तय करने वाली संस्था राष्ट्रीय दवा मूल्य प्राधिकरण (एनपीपीए) ने कहा है कि भारत में काफी पहले से कंडोम को दवा की श्रेणी में रखा गया है.

एनपीपीए के निदेशक स्तर के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "ऐसा रातों-रात नहीं हुआ है. भारत का ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 का है और भारत के औषधि महानियंत्रक यह तय करते हैं कि किसे दवा की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है."

उन्होंने कहा कि स्वास्थ और परिवार कल्याण मंत्रालय ने सभी बातों को ध्यान में रखकर कंडोम को आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल किया है.

'आवश्यक' नहीं कंडोम

परिवार नियोजन मामलों के विशेषज्ञ और भारत के पूर्व स्वास्थ्य सचिव प्रसन्ना होटा की राय अलग है.

वह कहते हैं कि, "सभी कंडोम जीवन रक्षक दवा नहीं हैं और सभी कंडोम को 'आवश्यक' की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है. अगर कोई लक्ज़री ब्रांड का कंडोम खरीद सकता है तो सरकार को उसके इस अधिकार को नहीं छीनना चाहिए."

होटा ने बीबीसी को बताया, "अगर सरकार भारत में कंडोम की उपलब्धता बढ़ाना चाहती है तो सरकारी क्षेत्र की कंपनियों के ज़रिए उत्पादन बढ़ा सकती हैं."

ऐसे में यह बहस अभी जारी रहेगी कि कंडोम दवा हैं या डिवाइस. हालांकि इस बहस के बीच भारतीय मर्दों की रातों की नींद उड़ने की वजह थोड़ा अलग हो सकती है.

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