जब लगा मेरे बाद बीवी-बच्ची का क्या होगा!

नितिन श्रीवास्तव, उत्तराखंड

2013 की यादें और वो भी प्रोफ़ेशनल काम की. आप तक पहुंचाने का जितना उत्साह है उतनी ही मन में हिचक भी.

हालांकि कुछ बड़ी से बड़ी खबरें आप तक पहुंचाने का मौका मिला लेकिन अफ़सोस इस बात का रहा कि उनमें से ज़्यादातर बेहद भयावह और तबाही से भरी थीं.

शुरुआत उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ और तबाही से. 16 जून को जब ये हादसा हुआ तब ये अंदाजा कतई नहीं था कि तबाही का मंज़र इतना बुरा होगा.

दो दिन के भीतर जब ऋषिकेश पहुंचे तो एक अजीब सी ख़ामोशी भी दिखी और उफ़ान भी.

सड़कें वीरान थी, होटल खाली पड़े थे और कमरे के सामने बहने वाली गंगा नदी में पानी समंदर की लहरों की तरह उछाल पर था.

जब इसी बहती नदी में गैस के सिलेंडर और डबल बेड बहते दिखे तभी एहसास हो गया था कि ऊपर पहाड़ों में बहुत कम ही जीवन शेष रहा होगा.

अगले दिन बाहर निकल ही रहे थे कि नदी के किनारे लोगों को जमा देखा. पता चला तीन लाशें बहकर किनारे लग गई हैं.

हज़ारों तीर्थ यात्रियों की मौत की खबरें आ रहीं थीं, दिल डूब भी रहा था और उत्साहित भी हो रहा था इस बात से कि जल्दी से जल्दी दुनिया भर में इस बात की ख़बर कैसे पहुंचाई जाए.

जान बची

मगर इसके बीच एक ऐसा क्षण भी आया जब लगा कि मौत खुद के गले लगने वाली है.

वायु सेना के एक हेलिकॉप्टर में, मैं और मेरे साथ कैमरा सँभाल रही नेहा शर्मा, केदारनाथ घाटी में उतरने वाले थे.

ऊपर से मात्र कुछ ज़िंदा बचे हुए लोग दिख रहे थे जो भूखे-प्यासे टकटकी लगाए हमारे उतरने का इंतज़ार कर रहे थे.

लेकिन पायलट घाटी के चक्कर पर चक्कर लगाए चला जा रहा था.

कौतूहल इस कदर बढ़ा कि सह-पायलट से पूछा मामला क्या है?

जवाब मिला, "पायलट लैंड करने की जगह तलाश रहा है क्योंकि कल एक हेलकॉप्टर यहीं पर लैंड करते वक़्त घाटी में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था".

सुनकर अगले तीन मिनटों में आँखों के सामने बीवी-बच्ची और माँ-बाप की तस्वीर घूम रही थी.

यही ख्याल था कि बीवी नौकरी करती है तो बच्ची की देख-रेख हो ही जाएगी.

माँ-बाप और भाई-भाभी भी उनकी सुध लेने को हैं!

बहराल जान भी बची, लैंड भी किए और लोगों तक ख़बर पहुँचाने के अलावा राहत कार्य में थोड़ी मदद भी की.

फिर भी, रिपोर्टिंग का ये अनुभव ज़िन्दगी भर ज़ेहन में क़ैद रहेगा.

इसी वर्ष सिर्फ एक महीने के अन्तराल में ही बिहार में दो ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने दुनिया की निगाहें छपरा और खगड़िया ज़िलों पर लाकर टिका दीं.

मैं इनका गवाह तो बन सका लेकिन एक कसक के साथ.

बिहार में दुर्घटनाएँ

ऐसा प्रायः क्यों होता है कि निर्दोष लोगों की जानें अनजाने में ही एक साथ चली जातीं हैं.

छपरा में विषाक्त भोजन खाने से 20 से अधिक बच्चों ने दम तोड़ दिया.

जब एक दिन बाद स्कूल वाले गाँव पहुंचा तो शायद ही कोई ऐसा घर बचा था जिसके बच्चे इसकी चपेट में नहीं आए थे.

अपनी नौकरी तो ख़बर करने की है और वो भी मानवता के मापदंडों का पालन करते हुए.

हर उस माँ-बाप से बिना पूछे उसके दिल का दर्द समझना और उसे तस्वीर/ रिकॉर्डर में क़ैद करना आज भी मेरे रोंगटे खड़े कर देता है.

इस बात का अंदाज़ा ही नहीं था कि बीस दिनों के भीतर फिर से, छपरा से थोड़ी दूर खगड़िया ज़िले के एक गाँव तक पहुँचने के लिए तीन किलोमीटर पैदल चलकर पहुंचना होगा.

एक पैसेंजेर ट्रेन से उतरकर पटरियों को पार कर रहे करीब 28 लोग, जिसमें अधिकाँश बच्चे और महिलाएं थीं, दूसरी दिशा से आने वाली एक ट्रेन की चपेट में आ गए थे.

ज़िन्दगी में मौत को कई बार देखा और सुना है. लेकिन दो दिन बाद तक पटरियों पर पड़े हुए लोगों के शव के टुकड़े और आसमान में मंडराने वाली चीलों को देखकर एक बार को लगा कि क्या एक पत्रकार के करियर में अच्छे से ज्यादा बुरी खबरें ही करनी बदी होती हैं?

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