अब किसानों को रुला रहा है प्याज़

Image caption नासिक के लासलगांव प्याज मंडी में प्याज की कीमत औंधे मुंह गिर गई है.

पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों से पहले प्याज़ ने आम लोगों को ख़ून के आंसू रुलाया था. यहां तक कि इसके फुटकर दाम 100 रुपए प्रति किलो तक चढ़ गए थे.

लेकिन चुनाव बीतने के महज एक सप्ताह बाद ही प्याज़ के दाम औंधे मुंह गिर पड़े हैं.

महाराष्ट्र की मंडी में प्याज़ के दाम सात से 12 रुपए प्रति किलो तक आ गए हैं और रोने पर मजबूर हैं किसान. गुरुवार को यहां प्याज़ के भाव 700 से 1200 रुपये प्रति क्विंटल खुले.

हालांकि एशिया की सबसे बड़ी प्याज़ मंडी में बैठे व्यापारियों और किसानों का मानना है कि प्याज़ की आपूर्ति इस वर्ष भी कम है और क़ीमतें ऊंची ही रहने की संभावना ज़्यादा है.

पिछले साल महाराष्ट्र में बारिश कम होने के कारण उपज कम हुई और इस कारण नासिक ज़िले के लासलगांव आने वाले उत्पादकों के पास पर्याप्त प्याज़ नहीं है.

मगर सरकार द्वारा निर्यात के लिए न्यूनतम आधार क़ीमत बढ़ाने के कारण यहां के किसानों को उनके माल का दाम कम मिल रहा है.

वे चाहते हैं कि यह आधार क़ीमत कम हो, लेकिन हालात चाहे जो करवट ले, ग्राहकों को भविष्य में सस्ता प्याज़ मिलने की संभावना कम ही है.

बिक्री बंद की

पिछले सप्ताह महाराष्ट्र में खलबली मच गई, जब प्याज़ की कीमतें हद से ज़्यादा कम होने के कारण किसानों ने लासलगांव कृषि उत्पादन बाज़ार समिति में प्याज़ की बिक्री बंद कर दी.

उस समय बाज़ार में प्याज़ की कीमत 9500 रुपये प्रति क्विंटल हो गई थी.

प्याज़ के व्यापारी यहीं से थोक में प्याज़ खरीदते हैं और देश के अधिकांश हिस्सों में यहीं से प्याज़ जाता है. लेकिन इतना कम दाम मिलने पर किसानों ने बिक्री करने से मना कर दिया.

चांदवड तालुका में वाटवे गांव के निवासी किसान वसंत पवार कहते हैं, "किसान एकजुट नहीं हैं और फिर उनकी मजबूरी भी है. इसलिए कुछ भी करके प्याज़ तो बेचना ही पड़ता है, क्योंकि पूरे तालुके का अर्थतंत्र इसी पर निर्भर है."

पवार और उनके गांववासी बुधवार दोपहर से ही यहां रुके हुए हैं और दोपहर तक अपना नंबर आने की उम्मीद कर रहे हैं. जब गुरुवार को मंडी खुली तो तो प्याज़ का भाव 700 से 1200 रुपये प्रति क्विंटल था.

निर्यात बना कारण

Image caption प्याज की पैदावार कम होने के बावजूद सही कीमत न मिलने से किसान निराश हैं.

हालांकि प्याज़ उत्पादकों के अनुसार यह क़ीमत कम से कम 1800-2000 रुपये प्रति क्विंटल होनी चाहिए.

ऐसा नहीं है कि प्याज़ की ज़्यादा आवक होने से यह गिरावट आई हो, जैसा कि अर्थशास्त्र में कहा जाता है.

व्यापारियों का कहना है कि सरकार ने जो निर्यात के लिए न्यूनतम आधार दर बढ़ा रखी है, उसके चलते निर्यात बंद है और इस वजह से देश में प्याज़ का भंडार ज़्यादा हो चुका है. इसलिए वो प्याज़ खरीदना नहीं चाहते और क़ीमत घट गई हैं.

हालांकि, राजनीतिक दबाव के चलते आधार क़ीमत कम करने के प्रयास जारी हैं और लासलगांव समिति के अध्यक्ष नानासाहेब पाटील के अनुसार, सरकार ने यह क़ीमत घटाकर 850 डॉलर कर दी है.

इसी अटकल के आधार पर समिति में प्याज़ की खरीदी और बिक्री फिर से शुरू हुई, लेकिन इस बारे में अधिकृत घोषणा अभी तक नहीं की गई है.

एक तिहाई तक गिरावट

अगर सरकार घोषणा करती भी है तो भंडार में से प्याज़ निर्यात हो जाएगा और इस साल तो उपज ही कम है.

एक अन्य प्याज़ उत्पादक अशोक वाकचौरे कहते हैं, "पानी की किल्लत के कारण प्याज़ की पैदावार कम है. हर साल इस समय इतनी गाड़ियां होती हैं कि यहां पैर रखने के लिए जगह नहीं होती. लेकिन पिछले एक हफ़्ते में हर रोज़ लगभग 1000 गाड़ियां ही यहां आ रही हैं.''

''औसतन आवक की तुलना में यह तादाद आधा से लेकर एक तिहाई तक कम है. सरकार को चाहिए कि जल्द से जल्द आधार क़ीमत कम करे, जिससे प्याज़ का निर्यात शुरू हो और उत्पादकों को वाज़िब दाम मिले."

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