समलैंगिकों को वापस अंधेरे में नहीं धकेल सकते :विक्रम सेठ

विक्रम सेठ

विक्रम सेठ एक गुस्सैल आदमी हैं. ये विख्यात उपन्यासकार इन दिनों अपने मशहूर बेस्टसेलर उपन्यास 'अ सूटेबल ब्वॉय' का सीक्वल लिख रहे हैं.

वह समलैंगिक संबंधों पर रोक लगाने वाले कानून को बरक़रार रखने के लिए देश की सुप्रीम कोर्ट से ख़फ़ा हैं.

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को समलैंगिक अधिकारों के लिए एक बड़े धक्के के तौर पर देखा जा रहा है.

(समलैंगिकों पर किसी को एतराज क्यों?)

अमूमन सौम्य और शांत दिखने वाले विक्रम इंडिया टुडे पत्रिका के कवर पेज पर दाढ़ी बढ़ाए, अस्त-व्यस्त और स्पष्टतः गुस्से में एक चॉकबोर्ड पर 'अपराधी नहीं' लिखकर नज़र आ रहे हैं.

उन्होंने पत्रिका में समलैंगिकों के हक़ में एक लेख लिखा है.

इसमें अचरज की बात नहीं कि यह दमदार कवर पेज चर्चा का विषय बन गया है. आपको कोई भी भारतीय लेखक याद नहीं आएगा जिसने आज तक ऐसा किया हो.

'कर्तव्य में चूक'

Image caption एलजीबीटी पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर अपना ग़ुस्सा व्यक्त करने के लिए विक्रम सेठ ने यह अनूठा तरीक़ा अपनाया.

ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र में डिग्री हासिल करने वाले सेठ को एक बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने 'विनम्र व्यंग्य' करने वाला व्यक्ति कहा था.

आज सुबह जब उस हलचल मचा रहे कवर पेज पर बात करने के लिए मैंने उन्हें फ़ोन किया तो मुझे महसूस हुआ कि वह व्यंग्य अब भी कायम है. आप इतने नाराज़ क्यों हैं?

वो कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले (आईपीसी की धारा 377 पर) से मैं स्तंभित हूं. यह फ़ैसला बौद्धिक रूप से छिछला और नैतिक रूप से खोखला है. इसके तर्क लापरवाही भरे हैं और मौलिक अधिकारों की रक्षा के संदर्भ में यह डरा हुआ लगता है."

('कानून में बदलाव समाज और सरकार का काम')

"साफ़ तौर पर इस मामले पर फ़ैसला लेना सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में था लेकिन अमूमन सक्रिय रहने वाली अदालत ने फ़ुटबॉल को एक अनुदार संसद के पाले में फेंक दिया. संविधान भारतीय नागरिकों के अधिकारों और आज़ादी की रक्षा करता है. जजों को यह अधिकार नहीं है कि उन पर चर्चा करे या फिर उन्हें छीन ले."

"मेरे गुस्सा होने के लिए ये पर्याप्त है और ऐसा फ़ैसला जो भारत के कम से कम पाँच करोड़ लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) की आज़ादी छीन ले, निंदनीय है, संवेदनहीनता की निशानी है, आप चाहें तो इसे अमानवीय भी कह सकते हैं."

आत्मविश्वास की कमी

लेकिन जिस तरह से आपने अपना विरोध दर्ज किया है, पत्रिका के कवर पेज के लिए फ़ोटो खिंचवाकर, ये अभूतपूर्व है.

इस पर विक्रम का जवाब था, "जो मैंने किया उसमें कोई कमाल नहीं है. वे लोग (गे) भारत के कस्बों और गांवों में बेहद निराश ज़िंदगी बिता रहे हैं. उनके परिवार और रिश्तेदार उन्हें दबाकर रखते हैं. यह ज़रूरी है कि उनकी तकलीफ़ और मायूसी के लिए लोग आवाज़ उठाएं और ये वे लोग करें जो खुद को आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं."

(एक समलैंगिक का सफ़रनामा)

"ऐसे लोग जो अमूमन अल्पभाषी या संकोची हों, खुद को आदर्श के रूप में पेश कर रहे हैं. बहुत से प्रमुख भारतीय कारोबारी (जो समलैंगिक है) शानदार आदर्श हो सकते हैं. उनका सामने न आना उनके जैसे लेकिन बहुत शक्तिहीन, अकेले और एकांत में जी रहे लोगों के प्रति कर्तव्य में चूक है."

"आप कल्पना कर सकते हैं कि चार या पांच विभिन्न क्षेत्रों के प्रशंसित लोग सामने आते हैं और कहते हैं, 'इसमें क्या बड़ी बात है या मैं एक बाइसेक्सुअल हूं.' चार साल पहले हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद जो लोग खुलकर सामने आए थे उन्हें वापस अंधेरे कोने में नहीं धकेला जा सकता."

"लेकिन यहां मैं उनकी बात नहीं कर रहा, मैं तो उन लोगों की बात कर रहा हूं, जिनमें आत्मविश्वास की कमी हो या फिर जिनके परिवार वाले उन्हें दबा रहे हैं और जिन्हें इस बात की सख़्त ज़रूरत है कि लोग उनकी तरफ़ इशारा करें और कहें, 'वह भी मेरी तरह ही हैं'."

'दाढ़ी वाला गुंडा'

तो यह कवर पेज कैसे बना?

विक्रम कहते हैं, "फ़ोटोग्राफ़र रोहित चावला इस विचार के साथ आए थे. उन्होंने मेरे घर में दो सत्रों में फ़ोटो खींचे. वैसे एक सेट उन तस्वीरों का भी है जिनमें मैंने दाढ़ी बनाई हुई है. जिस रात फ़ोटो खींची गई उससे पहले मैं बेहद व्यस्त था और देर से सोया था सुबह जब रोहित आए तो उन्होंने मुझे इस हालत में देखा और कहा दाढ़ी मत बनाओ."

(किस मोड़ पर आ गए हैं समलैंगिक)

"वह दो सहायकों के साथ लाइटिंग के उपकरण लेकर आए थे लेकिन ये बेहद आराम से हुआ. हमने एक गिलास रम पी फिर उन्होंने कहा कि वह शाम को आएंगे और एक और सत्र में फ़ोटो खींचेंगे, दाढ़ी बनाए हुए. रोहित को यह तस्वीर बहुत ज़्यादा पसंद थी. हालांकि अंतिम रूप से चयन की आज़ादी मुझे देने की उदारता उन्होंने दिखाई."

"हालांकि मैं अपने माता-पिता की राय से थोड़ा डरा हुआ था कि इस तस्वीर में मैं एक दाढ़ी वाले गुंडे की तरह लग रहा हूं. दरअसल इसी वक्त, जब हम बात कर रहे हैं, मैं दाढ़ी बना रहा हूं ताकि मुझे खाना मिल सके. अंततः मैं रोहित की पसंद से सहमत हो गया क्योंकि उसने कहा कि इससे पत्रिका में लिखे गए मेरे लेख की ओर ध्यान जाएगा और इससे लेख के उद्देश्य को फ़ायदा ही होगा."

तस्वीर में आप बेहद गुस्से में लग रहे हैं. अमूमन ऐसा होता नहीं है.

इसके पीछे का वाक़या बयान करते हुए विक्रम ने बताया, "ये भाव बहुत आसानी से आए. मैंने उसी समय उस अतार्किक फ़ैसले के कुछ अंश पढ़े थे. उसी वजह से मेरे माथे पर तनाव की रेखाएं आईं. मैं दाढ़ी भी नहीं बनाई थी और फिर मेरे पास एक कल्पनाशील फ़ोटोग्राफ़र था."

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