जाति के किले उत्तर प्रदेश में 'झाड़ू' चलेगी कि टूटेगी?

  • 22 दिसंबर 2013
अरविंद केजरीवाल का कार्टून

दिल्ली विधान सभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता ने आम आदमी पार्टी की महत्वाकांक्षाओं को पंख लगा दिए हैं.

भारतीय राजनीति को एक नया आयाम देने वाली आम आदमी पार्टी अब साल 2014 के लोक सभा चुनावों में उतरने की तैयारी में है, विशेषकर उत्तर प्रदेश में जहाँ कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी सहित समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के राजनीतिक दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर होगी.

वैसे भी माना जाता है कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता लखनऊ होकर निकलता है. तो क्या आम आदमी पार्टी दिल्ली में मिली सफलता को उत्तर प्रदेश की जातिवाद, साम्प्रदायिक, आपराधिक और भ्रष्ट राजनीति में दोहरा पाएगी?

लखनऊ में अन्ना हज़ारे टीम के सदस्य सत्येन्द्र कुमार साहू के अनुसार अभी प्रदेश में आम आदमी पार्टी का कोई संगठन नहीं है. यद्यपि उन्हें 'आप' के 'मेहनती' और 'सच्चे' सदस्यों के प्रति पूरी सहानभूति है, वे कहते हैं कि लोगों की बुनियादी ज़रूरतों को दिलवा पाना 'इनके बस की बात नहीं है'.

आम आदमी पार्टी के लखनऊ के प्रभारी अनमोल, जिन्होनें आईआईटी-रूड़की से बी.टेक की शिक्षा प्राप्त की है, कहते हैं, "प्रदेश के लगभग सभी ज़िलों में पार्टी का संगठन मौजूद है. संगठन की दृष्टि से प्रदेश को पांच ज़ोन में बांटा गया है- अवध, जिसमें मध्य उत्तर प्रदेश का क्षेत्र आता है, बुंदेलखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा रुहेलखंड."

अनमोल बताते हैं कि इन पांच ज़ोनों को मिलाकर एक संगठन बनाने की संभावना है लेकिन ऐसा कब तक होगा यह नहीं पता है.

लेकिन वे यह भी कहते हैं कि कुछ स्थानों पर संगठन अर्ध-कार्यात्मक (सेमी-फ़ंक्शनल) अवस्था में हैं और कुछ स्थानों पर निष्क्रिय (डिस्फ़ंक्शनल) हैं. उनके अनुसार, दिल्ली के चुनावी नतीजों के बाद लोगों में आम आदमी पार्टी का सदस्य बनने के लिए उतावलापन आ गया है.

अनमोल कहते हैं कि उनकी पार्टी को जैसे नतीजे दिल्ली में मिले हैं, उत्तर प्रदेश में उस तरह के परिणाम के लिए तीन-चार साल लग सकते हैं.

इसके बावजूद अनमोल कहते हैं कि उनका दल प्रदेश से लोक सभा चुनाव लड़ेगा. वे कहते हैं, "अभी यह तय नहीं है कि कितनी और किन सीटों पर पार्टी अपने प्रत्याशी खड़े करेगी. यह निर्णय योगेन्द्र यादव और पार्टी के अन्य शीर्ष नेता लेंगे."

'बदलाव की तीव्र भावना'

आम आदमी पार्टी के लखनऊ के प्रभारी अनमोल का मानना है कि परिवर्तन की भावना प्रदेश में भी उतनी ही तीव्र है जितनी दिल्ली में थी.

साथ ही अनमोल इस बात पर ज़ोर देते हैं कि उत्तर प्रदेश में चतुष्कोणीय चुनावी-स्पर्धा में 20 से 25 प्रतिशत तक सीमित वोट है. वे कहते हैं, "5-6 प्रतिशत वोट लेकर हम यहाँ की राजनीतिक व्याकरण दोबारा लिखेंगे."

यह पूछने पर कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय से कितना सहयोग अपेक्षित है, 'आप' के एक अन्य सदस्य विशाल जवाब देते हैं कि कुछ कह पाना मुश्किल है.

उनके लिए प्रदेश की धर्म, जाति और भ्रष्ट राजनीति के व्यूह को तोड़ना ही एक बड़ी चुनौती है. विसाल का कहना है "लोकसभा चुनाव के परिपेक्ष्य में पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए दूसरी चुनौती है प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा नरेंद्र मोदी को लेकर फैलाए जा रहे उन्माद के बीच लोगों को समझाना."

दिल्ली के मुस्लिम मतदाताओं ने 'आप' के सदस्यों के रहते हुए भी अपने समुदाय के कांग्रेसी प्रत्याशियों के पक्ष में मत दिया.

उस परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाता को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि प्रदेश की लगभग 24 सीटों पर 20 प्रतिशत या अधिक मुस्लिम वोट हैं. साल 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में मुस्लिम मतदाता ने बहुजन समाज पार्टी और फिर समाजवादी पार्टी को बहुमत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

धर्म की राजनीति का सहारा

माना जा रहा है कि इस बार भी सपा और भाजपा दोनों ही धर्म की राजनीति का सहारा ले सकती है.

भारतीय प्रबंधन संस्थान, लखनऊ के प्रोफेसर भरत भास्कर के अनुसार, ''आम आदमी पार्टी एक शहरी फ़ेनोमेनन (घटना) है. दिल्ली में शिक्षित वर्ग और इंटरनेट-यूज़र ने उनकी जीत में अहम भूमिका निभाई थी जबकि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्रों में उस तरह की स्थिति पैदा करना काफी मुश्किल होगा.''

प्रोफेसर भास्कर कहते हैं, "आप एक बड़े शहर की पार्टी है और उसे तय करना होगा कि प्रदेश की किन लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ना चाहिए. कुछ शहरी क्षेत्रों से हो सकता है यह दल कुछ सीटें जीत ले."

लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र के सेवानिवृत्त प्रोफेसर रमेश दीक्षित का भी लगभग यही विचार है. उनका मानना है कि उत्तर प्रदेश न केवल ग्रामीण-प्रधान प्रदेश है बल्कि यहाँ के मध्यम वर्ग की भी कई परते हैं. शहरी और ग्रामीण युवा भी अलग सोच से वोट देते हैं. वे भी मानते हैं कि बड़े शहरों में आम आदमी पार्टी का असर हो सकता है.

'यूपी बहुत बड़ा है'

उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति के प्रवक्ता वी मदान के अनुसार, "ऐसा नहीं लगता कि आम आदमी पार्टी यूपी में दिल्ली जैसा प्रदर्शन कर पाएगी, पर हमको (कांग्रेस) और बीजेपी को कुछ शहरी सीटों पर नुक़सान पहुंचा सकती है."

वहीं समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं, "यूपी बहुत बड़ा है, यहाँ 'आप' का कुछ असर नहीं होने वाला.''

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक मानते हैं कि दिल्ली की सफलता के बाद आम आदमी पार्टी को नकारा नहीं जा सकता लेकिन "हमारी पार्टी जिन बड़े मुद्दों पर केंद्र का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है, हमें नहीं लगता कि आप एक विकल्प के रूप में उभर भी पायेगी.''

किन्तु आज़मगढ़ के एक युवा रंगकर्मी राजकुमार शाह आम आदमी पार्टी से पूरी तरह प्रभावित हैं. वे कहते हैं कि "यदि आजमगढ़ से आप किसी योग्य सदस्य को टिकट देती है तो मैं उसी को वोट दूंगा."

सवाल फिर वही, कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी को मिली जीत की धमक सीमाओं को पार तो कर ही रही है पर क्या वो दूसरे राज्यों में सीटों की जीत में तब्दील हो पाएगी?

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