चीन में रिकॉर्ड संख्या में तिब्बतियों का विस्थापन

बीते कुछ वर्षों के दौरान रिकार्ड संख्या में तिब्बती चरवाहों को अपने मूल स्थान से विस्थापित होना पड़ा है. तिब्बती अधिकारियों का कहना है कि विस्थापन से ख़ाली हुए स्थानों पर अंधाधुंध खनन किया जा रहा है और इससे नदियों को काफ़ी नुक़सान पहुंचा है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक़ तिब्बती नेताओं और शोधकर्ताओं का दावा है कि चीन में प्राकृतिक संरक्षण नीति के नाम पर पिछले कुछ वर्षों से यह विस्थापन जारी है.

यह बयान ऐसे समय में आया है जब शरणार्थियों के रूप में दूसरे देशों में जाने वाले तिब्बतियों की संख्या में कमी आ रही है.

इस बारे में टिप्पणी के लिए जब बीबीसी ने चीनी अधिकारियों से संपर्क किया तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

हालांकि, इससे पहले चीन सरकार ज़ोरदार ढंग से इस बात का खंडन कर चुकी है कि तिब्बती चरवाहों को दूसरे स्थानों पर भेजने के लिए बल का प्रयोग किया गया.

भारत के धर्मशाला में तिब्बती अधिकारियों ने कहा है कि क़रीब 15 से 20 लाख तिब्बतियों को बलपूर्वक उनके गांव से विस्थापित कर दिया गया है और विस्थापन से ख़ाली हुए इलाक़ों में सोने और तांबे के अयस्कों का खनन बढ़ा है.

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सख़्ती का आरोप

धर्मशाला में ही तिब्बत के निर्वासित धर्मगुरू दलाई लामा का कार्यालय है.

तिब्बती अधिकारियों का कहना है कि लोग इस विस्थापन से ख़ुश नहीं हैं और 2008 से अब तक क़रीब 130 तिब्बतियों की इस संघर्ष में मौत हो चुकी है.

धर्मशाला स्थित केन्द्रीय तिब्बती प्रशासन के पर्यावरण विभाग के प्रमुख तेंजिन नोरबू ने बताया, "इस क्षेत्र से विस्थापित होकर आने वाले तिब्बतियों ने हमें बताया कि किस तरह उनके गांव की ज़मीन को ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से हड़पा जा रहा है और ऐसा खनिज संपदा के लिए किया जा रहा है."

नोरबू का कहना था बताया, "उन्होंने हमें बताया कि चीनी अधिकारी ने चेतावनी दी कि अगर कोई भी खनन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करेगा तो माना जाएगा कि वो राज्य के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहा है क्योंकि चीन को विकास से लिए प्राकृतिक संसाधनों की ज़रूरत है."

उन्होंने बताया, "ये लोग जो तिब्बत से निकलने में कामयाब रहे उनका कहना था कि चीनी अधिकारी प्रत्येक घर में गए और उनसे एक कागज़ में दस्तख़त कराया कि किसी तरह की खनन गतिविधि होने पर वो प्रदर्शन नहीं करेंगे."

केन्द्रीय तिब्बती प्रशासन में तिब्बतियों की ख़ानाबदोश जीवनशैली पर अध्ययन कर रहे शोधकर्ता जिग्मे नोरबू ने बताया कि 2012 में दलाई लामा के कार्यालय में क़रीब 40 तिब्बती शरणार्थी आए थे और उनमें से ज्यादातर ख़ानाबदोश थे.

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पर्यावरण की चिंता

2008 तक नेपाल के रास्ते तिब्बत से हर साल क़रीब 1,000 लोग भारत आते थे, हालांकि बाद में आवाजाही पर सख्ती बढ़ने पर यह संख्या घटी है.

उन्होंने बताया, "चीन सरकार कहती है कि ख़ानाबदोश लोगों को चारागाहों के संरक्षण के लिए दूसरो स्थानों पर भेजा जा रहा है... लेकिन सच्चाई ये है कि इन ख़ानाबदोश तिब्बतियों को उनके मूल स्थान से इसलिए हटाया जा रहा है ताकि वहां खनन किया जा सकते और वास्तव में इससे पर्यावरण को काफ़ी क्षति होगी."

तिब्बती नेताओं और विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े स्तर पर खनन और नदियों को नुक़सान पहुंचाने से समस्या बढ़ेगी.

जिग्मे नोरबू ने बताया, "ऐसे इलाक़ों में जब हाइड्रोपॉवर संयंत्र तैयार किया जाता है तो वहां से आने वाले तिब्बती हमें बताते हैं कि कई निजी निवेशक सोना, चांदी और तांबा जैसे अयस्कों के खनन में अधिक दिलचस्पी लेते हैं."

विकीलीक्स ने जिन केबलों को जारी किया था उनमें से एक के मुताबिक़ दलाई लामा ने 2009 में भारत में अमरीका के राजदूत से कहा था कि अगले पांच से 10 वर्षों के दौरान अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान तिब्बत राजनीतिक हालात के बजाए वहां के पर्यावरण पर होना चाहिए.

तिब्बत पोस्ट इंटरनेशनल की सितंबर में आई एक रिपोर्ट के पूर्वी तिब्बत में स्थित युलशुन में सोने के खनन का विरोध कर रहे तिब्बती प्रदर्शनकारियों के खिलाफ चीनी सेना ने बल प्रयोग किया.

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विस्थापन पर चिंता

हालांकि इस घटना का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, लेकिन केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के शोधकर्ताओं का कहना है कि करीब 240 स्थानों पर खनन चल रहा है और उनमें से ज्यादातर स्थान तिब्बती ख़ानाबदोशों के मूल स्थान हैं.

इस स्तर पर खनन से नदियों के प्रदूषण का ख़तरा भी काफ़ी बढ़ गया है. एक अनुमान के मुताबिक़ क़रीब आधी तिब्बती आबादी ख़ानाबदोश है.

विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी अधिकारियों ने चरवाहों को उनके स्थान से हटाने के लिए यह तरीक़ा साल 2000 में ही अपनाया था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दौरान खनन और विस्थापन में काफ़ी तेज़ी आई है.

कुछ चीनी शिक्षाविदों ने भी चारवाहों को उनके मूल स्थान से विस्थापित करने को लेकर चिंता जताई है.

पीकिंग विश्वविद्यालय के पर्यावरण प्रबंधन विभाग की वेनजुन ली ने एक शोध पत्र में लिखा है, "पारंपरिक चरवाहों के अनूठेपन और उनके संस्थागत प्रबंधन को फिर से मान्यता देने की ज़रूरत है."

वह लिखती हैं, "पारंपरिक चरवाहों की संस्कृति स्थानीय गतिशील पारिस्थितिकी और सामाजिक संस्थाओं के साथ एक लंबे संवाद का परिणाम है." हालांकि उनके इस शोध पत्र में खनन का कहीं जिक्र नहीं किया गया है.

इस बारे में चीन के तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र कार्यालय और उसके राष्ट्रीय विकास और सुधार आयोग की टिप्पणी भी नहीं मिल सकी.

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