मेरा पक्ष नहीं सुना गया: जस्टिस गांगुली

जस्टिस (रिटायर्ड)  एके गांगुली

एक महिला इंटर्न के कथित यौन उत्पीड़न के आरोपों में घिरे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एके गांगुली का कहना है कि इस मामले में उनका पक्ष नहीं सुना गया है.

ये बात जस्टिस गांगुली ने भारत के मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम को लिखी एक चिट्ठी में कही है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक इस चिट्ठी में जस्टिस गांगुली ने लिखा है, "हाल में हुई कुछ घटनाओं से मैं व्यथित हूं. मैं दुखी हूं कि सुप्रीम कोर्ट ने मुझसे ठीक से बात नहीं की."

जस्टिस गांगुली ने लिखा है, "मैं ये स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैंने न तो कभी किसी महिला इंटर्न का उत्पीड़न किया और न ही किसी की तरफ़ कोई ग़लत कदम उठाया."

जस्टिस गांगुली के ख़िलाफ़ एक महिला इंटर्न के यौन उत्पीड़न के आरोप की पड़ताल के लिए मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की एक समिति का गठन किया था.

समिति ने 28 नवंबर को अपनी रिपोर्ट में लिखा था, "बयानों के आधार पर पहली नज़र में पता चलता है कि जस्टिस गांगुली ने महिला इंटर्न की मर्ज़ी के खिलाफ़ यौन व्यवहार किया."

लेकिन रिपोर्ट में ये भी कहा गया चूंकि जिस दिन ये घटना हुई, तब तक जस्टिस गांगुली अपने आख़िरी दिन का काम ख़त्म कर चुके थे. इस हालत में सुप्रीम कोर्ट उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकेगा.

आपत्ति

आरोपों की जांच कर रही सुप्रीम कोर्ट की समिति के सामने दिए पीड़िता के हलफ़नामे के मीडिया को लीक होने पर भी जस्टिस गांगुली ने आपत्ति जताई है.

जस्टिस गांगुली ने लिखा है, "मामले में मेरे पक्ष की ठीक से सुनवाई नहीं हुई है."

उनका कहना है कि उन्हें हलफ़नामा देखने नहीं दिया गया जिसमें उनके खिलाफ़ आरोप हैं.

उन्होंने कहा, "मैंने सुप्रीम कोर्ट की समिति के सामने हुई सुनवाई की प्रतिलिपि मांगी थी लेकिन उसे गोपनीयता के आधार पर मना कर दिया गया. क़ानूनन जिस व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर सवाल उठ रहे हों, उसे प्रतिक्रिया देने के लिए हलफ़नामा मिलना चाहिए. मैंने हलफ़नामा मांगा था लेकिन मुझे नहीं दिया गया."

यही बात कुछ दिन पहले जस्टिस गांगुली ने बीबीसी के साथ बातचीत में भी कही थी.

मीडिया पर आरोप

बीबीसी के साथ बात करते हुए जस्टिस गांगुली ने अपने अगले कदम के बारे में बताने से इनकार किया था. लेकिन उन्होंने बार-बार ये बात दोहराई थी कि सुप्रीम कोर्ट से मांगने के बावजूद उन्हें पीड़िता का हलफ़नामा नहीं दिया गया.

जस्टिस गांगुली ने मीडिया पर उन्हें तंग करने की बात कही. उन्होंने कहा, "मीडिया मुझे ऐसे परेशान कर रहा है जैसे मैं एक सज़ायाफ़्ता अपराधी हूं. मैं अपनी गाड़ी में नहीं बैठ सकता, अपने घर से नहीं निकल सकता. मीडिया ने मेरा घर और ऑफ़िस घेर रखा है. ये सब क्या है?"

दरअसल कुछ समय पहले भारत की एडिशनल सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह ने पीड़ित लड़की की उस लिखित गवाही को सार्वजनिक किया था जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की समिति के सामने दिया था.

सुप्रीम कोर्ट की समिति की रिपोर्ट आने के बाद भी कोई कार्रवाई ना होने के संदर्भ में 'इंडियन एक्सप्रेस' के लिए लिखे लेख में इंदिरा जयसिंह ने कहा था, "आरोप की पूरी जानकारी सबके सामने ना होने की वजह से जस्टिस गांगुली क़ानून और न्यायपालिका से जुड़े ताकतवर लोगों के पीछे छिप रहे हैं और इसी वजह से मुझे महिला इंटर्न के बयान को सार्वजनिक करना पड़ रहा है."

इस मामले में क़ानून मंत्री कपिल सिब्बल सेवानिवृत्त जस्टिस गांगुली से पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से हट जाने की मांग कर चुके हैं.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी उन्हें राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से हटाने का औपचारिक अनुरोध किया है.

लेकिन जस्टिस गांगुली इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं.

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