पायलिन तूफ़ान ज़िंदगी का अनोखा अनुभव

  • 28 दिसंबर 2013
पायलिन तूफ़ान

दक्षिण भारत के तटवर्ती इलाक़ों में रहकर पिछला साल आते भी देखा और जाते भी. कोंकण इलाक़े से होता हुआ मालाबार के तट पर और फिर बंगलुरु. साल के शुरुआती दिन काफी व्यस्त रहे.

मालाबार के तटवर्ती इलाक़ों में मुझे विधवाओं की तरह रहने को मजबूर कम उम्र की ब्याहता युवतियों का दर्द समझने का मौक़ा मिला. ये युवतियां समाज की एक ऐसी रीत की शिकार हैं, जहाँ वयस्क होते ही इन्हें परिवार के बंधन में बांध दिया जाता है. मुझे उन लड़कों पर भी तरस आता है, जो शादी के हफ़्ते भर के भीतर खाड़ी देशों में अपनी नौकरी करने चले जाते हैं और लौटते हैं दो-तीन साल बाद और वो भी दस-पंद्रह दिनों के लिए.

दक्षिण भारत से मध्य भारत लौटा, तो शहंशाह अकबर के नवरत्नों में एक बीरबल के गाँव जाने का मौक़ा मिला. यहाँ आकर पता चला कि बीरबल का असली नाम महेशदास दुबे था और वह मध्य प्रदेश के सिधी ज़िले के घोघरा में पैदा हुए थे.

कहा जाता है कि घोघरा गांव में ही बीरबल के पिता गंगादास का घर हुआ करता था और यहीं उनकी माता अनाभा देवी ने सन 1528 में रघुबर और महेश नाम के जुड़वां बच्चों को जन्म दिया. घोघरा गांव सालों उपेक्षित रहा और इसके साथ-साथ उपेक्षित रहे बीरबल की पीढ़ी के लोग. बीरबल की 37वीं पीढ़ी भी इसी गांव में रहती है और ये लोग मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं.

मध्य प्रदेश में ही विदेशी महिला के साथ 'गैंगरेप' की ख़बर अंतर्राष्ट्रीय सुर्ख़ी बनी. स्विस दंपत्ति मध्य प्रदेश के ओरछा से आगरा तक साइकिल से भ्रमण पर थे. इसी दौरान रात में उन्होंने दतिया के झाडिया गांव के पास कैंप लगाया. यह वारदात तब हुई, जब भारत सरकार बलात्कार पर लगाम कसने के लिए नए क़ानून पर बात कर रही थी. और दतिया ज़िले में सात लोगों द्वारा एक स्विस महिला से कथित तौर पर दुष्कर्म का मामला सामने आया. राज्य पुलिस ने सात लोगों को गिरफ्तार किया.

मध्य भारत के छत्तीसगढ़ के दुर्ग ज़िले के रहने वाले प्रीतम साहू के परिवार के लिए नया साल खुशियां लेकर आया. एक साल तक सोमाली समुद्री डाकुओं के चंगुल में रहने के बाद आख़िर वह रिहा हुए. उनकी घर वापसी न सिर्फ़ उनके परिवार बल्कि पूरे राज्य के लिए खुशियां लाई. जब मैं प्रीतम से मिलने पहुंचा, तो उन्होंने बताया कि प्रताड़ना के बाद भी उनके पाकिस्तानी साथी ने लुटेरों को नहीं बताया कि उनके पास थोड़ा डीज़ल बचा हुआ है. इस उम्मीद में कि वे कभी रिहा होंगे और डीज़ल काम आएगा. प्रीतम का कहना था कि समुद्री डाकू बेहद क्रूर थे और प्रीतम के एक साथी को इतना मारा गया कि दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई.

येदियुरप्पा की भारतीय जनता पार्टी से बग़ावत के बाद कर्नाटक में विधानसभा चुनाव बड़े रोचक हो गए थे. चुनाव कवर करने मैं एक बार फिर कर्नाटक पहुंचा. ये साफ़ नज़र आ रहा था कि येदियुरप्पा की बग़ावत कांग्रेस को काफ़ी महंगी पड़ने वाली है. हुआ भी यही और विधानसभा चुनाव में भाजपा की करारी हार हुई. ऐसा नहीं है कि येदियुरप्पा को कोई फ़ायदा हुआ. दरअसल उनको भी भारी नुक़सान का सामना करना पड़ा और, इन दोनों के झगड़े में कांग्रेस ने बाज़ी मार ली.

मई महीने में नक्सली हिंसा के इतिहास में पहली बार बड़ी तादाद में राजनेताओं को माओवादियों ने मौत के घाट उतार दिया. घटना बस्तर के दरभा घाटी इलाक़े की थी, जहाँ माओवादी छापामारों ने घात लगाकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, सलवा जुडूम के जन्मदाता महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल सहित 28 कांग्रेस कर्मियों को मार दिया था. एक बार फिर मध्य भारत की ज़मीन रक्तरंजित हुई. मैं बीस दिन तक इन्हीं जंगली इलाक़ों में घूमता रहा और माओवादियों और सरकार के बीच संघर्ष के बारे में ख़बरें करता रहा. इस बीच माओवादियों ने बीबीसी को मेल भेजकर घटना की ज़िम्मेदारी लेते हुए हमले में निर्दोष लोगों की हत्या पर खेद जताया. बीबीसी को भेजे गए मेल की ख़बर लगभग सभी टीवी चैनलों ने प्रमुखता से प्रसारित की. एपी सहित दूसरी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने भी अपनी ख़बरों में बीबीसी का हवाला दिया.

मध्य भारत में काम कर ही रहा था कि पता चला कि सऊदी अरब में नए श्रम क़ानून की वजह से बड़ी संख्या में वहां काम करने वाले भारतीयों को लौटना पड़ रहा है. मालाबार तट का इलाक़ा सबसे ज़्यादा प्रभावित था क्योंकि यहीं से सबसे ज़्यादा लोग खाड़ी देशों में काम करने गए थे. मालाबार के मल्लापुरम और कालीकट के सुदूर ग्रामीण अंचल में मेरी मुलाक़ात उन लोगों से हुई, जो कई साल से खाड़ी देशों में काम कर रहे थे और अब लौटकर बेरोज़गारी का सामना कर रहे हैं. इनकी वापसी ने केरल सरकार की मुश्किलें भी बढ़ाईं. नए श्रम क़ानून के अनुसार वहां के स्थानीय निवासियों के लिए हर प्रतिष्ठान में 10 प्रतिशत आरक्षण लागू करना अनिवार्य कर दिया गया.

दक्षिण भारत के बाद अब उत्तर भारत की बारी थी. उत्तराखंड में बादल फटने के बाद मची तबाही ने पहाड़ों की ज़िंदगी को अस्त-व्यस्त कर दिया. हिमालयन सूनामी की तबाही से न सिर्फ़ केदारनाथ बल्कि दूसरे इलाक़े भी तहस-नहस हो गए. मंदिर के अलावा और कुछ नहीं बचा. बदल फटने से ग्लेशियर पिघले और भारी बाढ़ ने रास्तों और पहाड़ों को साफ़ कर दिया. मलबे ने मकानों और आबादी को चपेट में ले लिया. बड़ी मुश्किल से गुप्तकाशी और केदारनाथ के क्षतिग्रस्त इलाक़ों तक पहुंचने में कामयाबी मिली. मगर एक बात स्वीकार करना चाहता हूं. मुझे अपने जीवन में पहली बार डर का अहसास तब हुआ, जब मैंने अपनी आँखों के सामने सड़क को सैकड़ों मीटर नीचे धंसता देखा. उत्तराखंड की यह यात्रा मैं अपने जीवन में कभी नहीं भूल सकता.

उत्तरखंड से लौटकर मैं 'लिकर किंग' पॉन्टी चड्ढा के मर्डर केस का आंकलन करने लगा. उनके साम्राज्य को समझने की कोशिश में पता चला कि किस तरह कोई खाकपति से अरबपति बन सकता है. मैंने पता लगाने की कोशिश की कि किस तरह पॉन्टी ने अपना कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया. उत्तराखंड के रामनगर में पॉन्टी चड्ढा के पिता शराब के ठेके के सामने पकौड़े बेचकर अपने परिवार का पेट पालते थे. ऐसे माहौल में रहने वाले पॉन्टी चड्ढ़ा अरबपति कैसे बने. इसका पता लगाने के लिए मैंने उनके पैतृक निवास स्थान मुरादाबाद से नोएडा और फिर कौशांबी में उनके व्यवसाय से जुड़े इलाक़ों का दौरा किया.

इसके बाद एक बार फिर मैं मध्य भारत में था और वजह थी हाथियों से इंसान के टकराव की पड़ताल. पूर्वी और मध्य भारत के बीहड़ों और जंगलों में विकास की कथा का कड़वा सच पता लगाने की कोशिश करता रहा. जहां हर मरा हुआ हाथी सवा लाख का नहीं होता. तब तो और भी नहीं, जब उनका जगंली झुंड आपके घर में घुस जाए और तबाही मचा दे. मुझे अहसास था कि विकास की कहानी का सीधा वास्ता आदमी और जानवर के टकराव से जुड़ा है. इसी दौरान मेरी मुलाक़ात निर्मला टोप्पो से हुई. ओडिशा के वन विभाग ने 14 साल की इस आदिवासी किशोरी को राऊरकेला बुलाया और वह भी उधम मचा रहे हाथियों के झुंड से बात करने के लिए. निर्मला ने झुंड को वापस जंगल में भेज दिया. झारखंड की इस 'लेडी टार्जन' से मिलने मैं राउरकेला के सरकारी अस्पताल पहुंचा, जहां उनके पैरों के ज़ख्मों का इलाज चल रहा था. मगर मुझे दुःख है कि बस एक महीने पहले ही निर्मला के पिता को जंगली हाथियों के एक झुंड ने ही पैरों तले कुचलकर मार डाला.

मध्य भारत के बाद मैं पायलिन का पीछा करने निकल पड़ा. पायलिन जैसा तूफ़ान मैंने ज़िंदगी में कभी नहीं देखा था. यह पहला मौक़ा था, जब मैं किसी बड़े तूफ़ान का सामना कर रहा था. पूर्वी भारत के ओडिशा के गोपालपुर तट पर 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से जब यह तूफ़ान टकराया, तो मैं वहीँ था. तूफ़ान का आंखों देखा हाल बताने के लिए मौजूद बीबीसी की टीम पर जो गुज़री, वो भी हम कभी भूल नहीं पाएंगे. चाहे हमारे हवाई जहाज़ का तूफ़ान में फंसकर हिचकोले खाना हो या तूफ़ान के बाद खाने के लाले पड़ने की बात. यह भी ज़िंदगी का अनोखा अनुभव था, जब सैकड़ों किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रही तेज़ हवाओं और बारिश से हमारा सामना हुआ.

कई राज्यों में विधानसभा चुनाव के दौरान मैं छत्तीसगढ़ गया, मगर उससे भी पहले मैं आंध्र प्रदेश के उन इलाक़ों में पहुंचा, जहाँ छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग से पलायन कर लाखों आदिवासियों ने शरण ले रखी थी. यहां आकर पता चला कि इनका पुरसान-ए-हाल कोई नहीं क्योंकि इनके वोट की किसी राजनीतिक दल को चिंता नहीं. इस दौरान उन इलाक़ों का दौरा भी किया, जहाँ सरकार का अधिकार क्षेत्र ख़त्म होता है और माओवादियों का इलाक़ा शुरू होता है.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में सुरक्षा के लिहाज़ से कई मतदान केंद्रों को दूसरी जगह ले जाया गया था, जिनमें कई केंद्र 40 से 60 किलोमीटर दूर थे. शहरों में प्रचार का ज़ोर था तो ज़रूर मगर पार्टियों के एजेंडे से दूरदराज़ के इलाक़ों के मुद्दे ग़ायब थे. इसी दौरान मुझे राज्य के उत्तरी इलाक़े के सोनहट जाने का मौक़ा मिला, जहां एक मतदान केंद्र पर सिर्फ़ दो मतदाता थे और उनका वोट डलवाने के लिए 20 सरकारी कर्मचारियों को दस किलोमीटर का सफ़र पैदल तय करना पड़ा.

कुल मिलाकर यह साल मेरे लिए गहमागहमी से भरा रहा और इस दौरान मुझे भारत के विभिन्न इलाक़ों में जाकर काम करने का मौक़ा मिला.

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