सही और ग़लत के बीच की कशमकश

केन्या

भारत की ज़िंदगी में गुज़रे पिछले 365 दिन, और हर दिन के साथ सांस लेता मैं.

कुछ सालों की पत्रकारिता के बाद एक वक़्त आपको लगने लगता है कि शायद आप हर परिस्थिति से निपटने लायक हो गए हैं. मगर नहीं, क्योंकि हर दिन जैसे संशय से भरा होता है, और वह पल आपसे दूर नहीं होता, जब आप सही औऱ ग़लत के बीच कशमकश में फंसे होते हैं.

गुज़रा एक साल मेरे लिए भी कुछ ऐसे ही बीता. चाहे उत्तराखंड में बाढ़ की विभीषिका के बाद के हालात हों, अफ्रीका में भारतीयों की पहचान स्थापित करने का संघर्ष देखना हो, तहलका पत्रिका में तरुण तेजपाल पर लगे आरोपों के बाद साथी पत्रकारों की मनोदशा समझने की कोशिश हो या फिर आरुषि तलवार केस के फ़ैसले को लेकर वाकयुद्ध.

एक पत्रकार के लिए शायद ये मात्र कहानियाँ हों, लेकिन तेज़ी से बदलते भारत के गुज़रे 365 दिन मेरी लिए नई चुनौतियां लाए.

उत्तराखंड में बाढ़ के बाद लोगों का खौफ़ भूलना नामुमकिन है. अपनों को तलाशते लोग. हज़ारों लोग बेहद सीमित साधनों के साथ हरिद्वार पहुंचे थे. न रहने का ठिकाना, न खाने का पता. उस दौरान देहरादून के कॉल सेंटर में काम करने वाले लोगों को भी समझने का क़रीब से मौका मिला. कई ऐसे लोग थे, जिनके अपने भी लापता थे लेकिन उनके पास आंसू बहाने का भी वक़्त नहीं था.

भक्तों से पटे रहने वाले हरिद्वार के मानवरहित घाटों को देखना जैसे अविश्वसनीय था, लेकिन सबसे न भूलने वाले पल थे श्मशान घाट में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए जवानों के अंतिम संस्कार के दौरान मौजूदगी. घाट के भीतर घुसते ही जैसे ज़िंदगी देखने का नज़रिया तुरंत बदल जाता है. सभी भेद मिट जाते हैं.

आरुषि तलवार हत्या पर फ़ैसला एक और मामला था, जिस पर देशभर की निगाहें टिकी हुई थीं. फ़ैसले से ठीक पहले तलवार दंपत्ति से मुलाक़ात का अवसर मिला.

दिल्ली के हौज़ खास में तलवार दंपत्ति से अकेले में क़रीब घंटे भर उनके भावों को समझने का मौक़ा ऐसा अवसर था जिसने मुझे मामले की विभिन्न परतों को एक बार फिर समझने का मौक़ा दिया और वो भी ऐसे वक़्त जब फ़ैसला आने में चंद घंटे शेष थे. परिवार के सदस्यों का ग़ुस्सा मीडिया पर केंद्रित था. जब तलवार मामले पर सालों से रिपोर्टिंग कर रहे एक पत्रकार से बात की, तो उसने कहा, समझ के बात करना, और उनकी बातों में बह मत जाना क्योंकि वो आपको प्रभावित करने की कोशिश करेंगे ख़ासकर नूपुर. तलवार मामले को जिस तरह मीडिया ने कवर किया है, उस पर बहस जारी है, लेकिन क्या ऐसे संवेदनशील मामले में ज़िम्मेदारी की और आवश्यकता नहीं थी?

तहलका संपादक तरुण तेजपाल पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप के बाद वहां काम कर रहे पत्रकारों से बातचीत में पता चला कि वहां इसे लेकर कितना घोर आश्चर्य है और भविष्य की अनिश्चितता को लेकर कितनी चिंता है. एक पत्रकार ने कहा कि वो अगले अंक में तरुण तेजपाल पर ही कहानी करने का प्रस्ताव देंगे, और अगर उनकी बात नहीं सुनी जाती तो वो इस्तीफ़ा दे देंगे. उन्होंने मुझसे कहा, हम अपने पाठकों के पास क्या मुंह लेकर जाएंगे अगर हम इस मामले को अपने अंक में नहीं उठाते?

मोज़ांबिक, इथियोपिया और कीनिया की अपनी यात्रा के दौरान लगा कि मैं भारत के ही किसी हिस्से में घूम रहा हूं. मोज़ांबिक में सड़क किनारे पेशाब करते देख मेरे एक स्थानीय साथी को इतनी शर्म आई कि उन्होंने माफ़ी मांगी. इस पर मुझे तेज़ हंसी आई और मैंने उन्हें भारत आने का न्योता दिया. मगर सबसे मज़ेदार बात मोज़ांबिक में दिखी, जहां छह बजे तक काम बंद हो जाता था. लोग अपने घरों को वापस लौट जाते थे. किसी सामान को खरीदने के लिए आपको बाज़ारों के चक्कर लगाने पड़ते हैं क्योंकि छह बजे तक सब बंद हो जाता है. लोग वहां ऐसे ही काम करते हैं.

चलते-चलते दिल्ली बलात्कार मामले के एक साल का ज़िक्र भी. एक साल पहले पीड़िता के गांव जाना, फिर उनके पुरुष मित्र के घर जाना और फिर देशभर में चले आंदोलन को नज़दीक से देखना. सभी यादों ने एक बार फिर दस्तक दी जब उनके दोस्त से इस दिसंबर बीबीसी स्टूडियो में मुलाक़ात हुई. उस घटना का ख़ौफ़ उनकी आंखों में अभी भी साफ़ था. ऐसे हालात में सवाल पूछना सामने वाले व्यक्ति के साथ ज़्यादती करना लगा.

हर दिन की यही तो कश्मकश है.

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