अब भी रातों को जगा देता है मुज़फ़्फ़रनगर

  • 31 दिसंबर 2013
दिलनवाज़ पाशा

मैं इसी साल जून में बीबीसी हिंदी के साथ जुड़ा. नौकरी के दूसरे दिन ही राजनीतिक पार्टियों के दफ़्तरों के किराए ने चौंकाया.

इसी बीच मौसम विभाग की लगातार सही हो रही भविष्यवाणियाँ चौंका रहीं थी, तो मन में सवाल कौंधा कि इस बार कैसे सही साबित हो रहा है भारत का मौसम विभाग?

जून में ही उत्तराखंड में मौसम और प्रकृति की मार की ऐसी ख़बर आई जो आज़ाद भारत के इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में शामिल हो गई. केदारनाथ मंदिर के पुजारी ने फ़ोन पर हालात ऐसे बयाँ किए कि दिल काँप गया. लेकिन इससे ज़्यादा दुख सत्ताधारी कांग्रेस की विधायक शैला रानी रावत के इस आरोप ने दिया कि उनकी अपनी पार्टी की सरकार झूठ बोल रही थी और आपदा की अनदेखी कर रही थी.

सितंबर के पहले हफ़्ते में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले से लगातार आ रही फ़ोन कॉल ने परेशान किया. पाँच सितंबर को मुज़फ़्फ़रनगर पहुँचा और समझने की कोशिश की कि आख़िर क्यों हैं मुज़फ़्फ़रनगर में तनाव?

दिल्ली लौटते वक़्त मुज़फ़्फ़रनगर में दंगे की आशंका डरा रही थी और सात सितंबर को जाटों की 'बेटी बचाओ पंचायत' में वही हो गया जिसका डर था. मुज़फ़्फ़रनगर दंगों की आग में जलने लगा. इस आशंका को भाँप मैं दिल्ली से तुरंत मुज़फ़्फ़रनगर के लिए निकला. शाम सात बजे के बाद मेरठ से निकलते ही पहली मुलाक़ात सन्नाटे और बदहवासी से हुई.

मुज़फ़्फ़रनगर जाने वाला हाइवे बंद कर दिया गया था. बसों के मुसाफ़िर परेशान थे. मुज़फ़्फ़रनगर में लोगों से ज़्यादा पुलिस थी. पूरे शहर में कर्फ़्यू था. सुबह होने से पहले सेना ने मुज़फ़्फ़रनगर की कमान संभाल ली.

आठ सितंबर की सुबह बुरी ख़बरों के साथ हुई. मगर दंगों के बीच भरोसे का गाँव भी मिला, जहाँ हिंदू-मुसलमान एक दूसरे की रक्षा कर रहे थे.

मुज़फ़्फ़रनगर से लौटा ही था कि 10 सितंबर को निर्भया बलात्कार मामले में दिल्ली की अदालत ने अभियुक्तों को दोषी क़रार दिया. फ़ैसले के वक़्त मैं अभियुक्तों के मोहल्ले में था, जहाँ उनके पड़ोसी का सवाल था- गरीबों को फाँसी, बाबाओं और अमीरों का क्या?

अदालत ने 13 सितंबर को सज़ा का दिन मुक़र्रर किया. निर्भया की माँ ने फ़ोन पर कहा- आज उसकी ख्वाहिश पूरी होने का दिन है.

मुज़फ़्फ़रनगर में दंगे की आग तो शांत हो गई थी लेकिन हज़ारों पीड़ित राहत शिविरों में थे. मैं फिर राहत शिविरों में पहुँचा. वहां एक बुज़ुर्ग की आवाज़ आज भी कानों में गूँजती है. उन्होंने कहा था- हम न हिंदू हैं न मुसलमान हैं, हम तो ग़रीब हैं.

अब दंगों के बाद पछतावे की पंचायत हो रही थी और जाट मुसलमानों से गाँव वापस लौटने की अपील कर रहे थे. एक बुजुर्ग जाट को अपनी पगड़ी मुसलमानों के पैरों में रखने की बात करते देख मैं भावुक हो गया था. तब उम्मीद बंधी कि सियासी फ़ायदे के लिए भी सामाजिक ताना-बाना बर्बाद करना आसान नहीं होगा.

लौटते वक़्त मैं कई गाँवों में रुका और जानने की कोशिश की कि दंगों के बाद कैसे कट रही हैं लोगों की रातें. होटल पहुँचा तो उस बीएसएफ़ जवान की कहानी में मन अटक गया जो किसी तरह अपने परिवार को बचाकर राहत कैंप तक लाया था.

दंगों के दौरान महिलाओं के साथ बलात्कार की आपबीती रिकॉर्ड करना सबसे मुश्किल मौक़ा था. बलात्कार केसों की एफ़आईआर दर्ज़ होने तक मैंने उनकी कहानी लिखने का इंतजार किया.

इसी बीच दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों ने देश को चौंका दिया. अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी 28 सीटें लेकर दूसरे नंबर पर थी. सोशल मीडिया पर 'आप' की कामयाबी का राज़ खोलने की कोशिश की.

इस सबके बीच भी मेरा मन लगातार मुज़फ़्फ़रनगर में था. अब भी शायद बहुत कुछ था जो बताने को बाक़ी था. मौक़ा मिलते ही मैं एक बार फिर पहुँचा तो दंगा पीड़ितों के वीरान मकान और किताबें के साथ राख हुई उम्मीदें मिलीं.

दंगों के तीन महीने बाद भी मुज़फ़्फ़रनगर में डर, दहशत, ख़ौफ़ और सन्नाटा है. खुले आसमान के नीचे ठंड से लड़ते और सिसकते दंगा पीड़ितों के चेहरे आँखों के सामने से जाते ही नहीं.

साल 2013 में बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसे मैं भूलना चाहूंगा, पर मुज़फ़्फ़रनगर दंगा वो घटना है, जिसे कोशिशें करके भी मैं भूल नहीं पाया हूँ.

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